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संपादकीय : ‘भारत जोड़ो’ का भय!

कांग्रेस पार्टी द्वारा ‘भारत जोड़ो’ यात्रा की घोषणा करते ही भारतीय जनता पार्टी के नेता व प्रवक्ता आलोचना करने लगे। इसका सीधा अर्थ है कि भाजपा को आज भी कांग्रेस से भय लगता है। ऐसा नहीं होता तो हताश, निराश और कमजोर हुई कांग्रेस की यात्रा की दखल लेने की जरूरत नहीं थी। राहुल गांधी के नेतृत्व में आज से कन्याकुमारी से यह यात्रा शुरू होगी और ३,५७० किमी की राष्ट्रीय यात्रा करके यह कश्मीर में समाप्त होगी। यात्रा का संदेश जनता के मन को छू रहा है। ‘मिले कदम, जुड़े वतन’ इस यात्रा का नारा है। इस पर टिप्पणी करने, खिल्ली उड़ाने जैसा क्या है? लेकिन भाजपा प्रवक्ता ने कहा, ‘भारत जोड़ो की बजाय कांग्रेस जोड़ो यात्रा अधिक प्रासंगिक होगी। क्योंकि हर जगह कांग्रेस के टुकड़े बिखर रहे हैं। पहले कांग्रेस बचाओ, फिर देश जोड़ने की सोचो। यह यात्रा बहन-भाई की है। इसमें दूसरा कोई शामिल नहीं होगा।’ गांधी परिवार को बचाने के लिए यह यात्रा है, ऐसा सुर भाजपा ने अलापा है। यह सब भाजपा का मनोरंजन है। कांग्रेस फिर से उठ गई तो भाजपा के सामने दिक्कतें खड़ी हो जाएंगी। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी जन समर्थन प्राप्त करने में सफल हो गए तो? इस डर से ‘भारत जोड़ो’ पर व्यक्तिगत टिप्पणी की जा रही है। देश की सबसे बड़ी पार्टी को यह शोभा नहीं देता। कांग्रेस या अन्य किसी पार्टी ने राष्ट्रीय एकता के लिए कोई कार्यक्रम निश्चित किया है तो उस पर कोई अपशकुन न करे। ऐसे कार्यक्रम वर्तमान में राष्ट्रीय एकता के लिए होने ही चाहिए। जब विदेशी ट्रंप जैसे लोगों के लिए हमारे देश में चुनाव प्रचार के कार्यक्रम होते हैं और उस क्रार्यक्रम में हमारे प्रधानमंत्री तथा उनकी राजनीतिक पार्टी घर का कार्य होने जैसा व्यवहार करती हो तो फिर कांग्रेस की राष्ट्रीय यात्रा पर टिप्पणी करने का कोई औचित्य नहीं है। राहुल गांधी क्या करें? यह उनका मसला है। राहुल गांधी पर इतना हमला करने के बाद भी उनका मनोबल नहीं टूटा और वे ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का नेतृत्व करनेवाले हैं, यह भाजपा को हजम नहीं हो रहा है। यही असली पेट दर्द है। रविवार को कड़कती धूप में कांग्रेस ने रामलीला मैदान पर महंगाई के विरोध में बड़ी रैली निकाली। देशभर के कांग्रेसी जमा हुए। कुल मिलाकर ‘शो’ अच्छा रहा। आज भी दिल्ली में इस तरह के आंदोलन करने का नैतिक बल कांग्रेस पार्टी में है। पार्टी भले ही कमजोर हो गई है फिर भी देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी वही है। स्वतंत्रता संग्राम की महान विरासत इस पार्टी को मिली है। भारतीय जनता पार्टी के पास ऐसी कोई विरासत हो तो बताए। कांग्रेस ने ७० वर्ष में क्या किया, जैसे सवाल पूछनेवालों को अपनी जन्मतारीख की एक बार जांच करनी चाहिए। हमारे कांग्रेस के साथ मतभेद हैं और रहेंगे। कांग्रेस के फाजिल सेक्युलरवाद पर हमारे जितना प्रहार किसी ने नहीं किया। लेकिन क्या भाजपा को ऐसा नहीं लगता कि कश्मीर की अलगाववादी महबूबा मुफ्ती की पार्टी से कांग्रेस अच्छी है? भाजपा का आज का बचपना नवहिंदुत्ववादियों का गुबार है। सभी मामलों में ‘हिंदू विरुद्ध मुसलमान’ यही उपाय उनके पास है और लोग उसमें पंâस रहे हैं। पाकिस्तान का हौवा खड़ा करके वोटों का ध्रुवीकरण करना हमेशा का है। लेकिन हमारी हजारों हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण, लगातार घुसपैठ और सीमा पर अनबन करनेवाले चीन के विरोध में कभी पाकिस्तान की तरह ललकारते हुए भाजपावाले दिखाई नहीं देते। चीन ने आधे लद्दाख को निगल लिया है। फिर भी ‘भारत जोड़ो’ पर कीचड़ उछालनेवाले चुप हैं। उनका राष्ट्रवाद, हिंदुत्व यहां ठंडा क्यों पड़ जाता है? भारतीय जनता पार्टी के पास कोई विचार नहीं है। विपक्ष की सरकारें गिराना और पार्टी तोड़ना, इसके आगे उनकी अक्ल आगे नहीं बढ़ती। कश्मीर में गुलाम नबी आजाद और महाराष्ट्र में शिंदे ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बिहार में नीतिश कुमार ने अलग भूमिका अपनाई तो उनकी पार्टी के मणिपुर के पांच विधायकों को भाजपा ने तोड़ लिया। केंद्रीय जांच एजेंसियां हाथ में न हों तो आज की भाजपा ताश के पत्तों के बंगले की तरह ढह जाएगी और कल को सत्ता चली गई तो हममें से कइयों को भ्रष्टाचार, देशद्रोह, देश बेचने जैसे मुकदमों का सामना करना पड़ेगा, यह भय भाजपा को सता रहा है। ‘भारत जोड़ो’ पर हमला करने का ये एक मुख्य कारण दिखाई देता है। आज की कांग्रेस कमजोर है। लेकिन कांग्रेस के टुकड़े करके आज भाजपा मजबूत हुई है। ‘कांग्रेस तोड़ो, भाजपा जोड़ो’ की नीति उन्होंने अन्य पार्टियों के मामले में भी लागू की। कांग्रेस ने अपना दलित, मुसलमान, ओबीसी जनाधार गवां दिया है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सफाया हो गया। हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण यहां हुआ। महाराष्ट्र में भाजपा ने हिंदू वोटों में फूट डाल दी। हमारे विरोध में एक भी राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय पार्टी खड़ी न रहे, यही भाजपा की स्वतंत्रता या लोकतंत्र की व्याख्या दिखाई देती है। उन्हें देश अथवा हिंदुत्व से लेना-देना नहीं है। हिंदू विरुद्ध मुसलमान यही उनकी राष्ट्रीय एकता की भावना है। भारत एक विविधता से भरा देश है। कई धर्म, संप्रदाय, रीति-रिवाज यहां निहित हैं और उन्हें एक साथ रखकर देश को एक संघ बनाए रखना होगा। इन विचारों का नष्ट होना यानी देश में फूट के बीज बोना। देश में महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या बढ़ रही है लेकिन ये सभी मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर उठनेवाली एक भी आवाज नहीं है। ममता बंगाल में, नीतिश कुमार बिहार में, केसीआर तेलंगाना में, विजयन केरल में, तो शिवसेना महाराष्ट्र में आवाज उठा रही है। लेकिन बाकी के सभी मौन बने हैं। ऐसी स्थिति में राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा फलदायी साबित होगी, यह देखना होगा। मदद नहीं कर सकते तो कम-से-कम अपशकुनी बिल्ली की तरह रास्ता न काटो। कांग्रेस पार्टी अंदरूनी कलह के कारण जर्जर हुई है, यह सत्य है। फिर भी राहुल गांधी एक जिद से भारत जोड़ने की मुहिम पर निकले हैं। भाजपा ने आलोचना करके राहुल की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा की सफलता का नारियल ही बढ़ा दिया है। श्री आडवाणी ने रथयात्रा निकाली और उसके फल आज भी भाजपा चख रही है। राजीव गांधी, चंद्रशेखर ने यात्रा निकाली। आंध्र के पूर्व मुख्यमंत्री वाई. एस. आर. रेड्डी और उनके पुत्र व मौजूदा मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने भी पदयात्रा निकाली। अखिलेश यादव ने भी एक समय उत्तर प्रदेश में साइकिल यात्रा निकालकर जनमत हासिल किया था। अब महाराष्ट्र में आदित्य ठाकरे की ‘निष्ठा यात्रा’ को प्रचंड प्रतिसाद मिल रहा है। उद्धव ठाकरे भी महाप्रबोधन यात्रा के लिए निकलनेवाले हैं। फिलहाल यात्राओं का दौर चल रहा है। हालांकि राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा ने भाजपा को काम पर लगा दिया है। उन्हें ‘भारत जोड़ो’ का डर लग रहा है, यही वास्तविकता है। राजनीतिक मतभेद दूर करके ‘भारत जोड़ो’ की ओर देखा जाना चाहिए।

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