मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : सोमनाथ से अयोध्या ...सत्य क्या है?

संपादकीय : सोमनाथ से अयोध्या …सत्य क्या है?

राम मंदिर उद्घाटन समारोह के मौके पर देश में काफी कुछ हो रहा है। यदि राम मंदिर एक गैर-राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होता तो उचित होता। यह मानकर कि हिंदुत्व का ठेका उनके ही पास है, भाजपा ने देश में २२ जनवरी को दिवाली मनाने का फरमान जारी किया और उनके अंधभक्त प्रचारक काम में लग गए। अयोध्या में राम मंदिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बना। लालकृष्ण आडवाणी और उनके सहयोगी अयोध्या की लड़ाई में थे। क्या आज के भाजपाई उसमें थे? यह शोध का विषय है। ये मंडली पहले ही एलान कर चुकी है कि अयोध्या तो झांकी है और काशी-मथुरा बाकी है। इस निमित्त के चलते हमें जप, होम-हवन, पूजन-अर्चन, यज्ञ, अंगार, धूप, भस्म भभूति के प्राचीन युग में धकेल दिया गया है। यह हिंदुत्व का आविष्कार नहीं है। भाजपा के लोग जो कहते हैं कि भारत देश में हिंदुत्व का ठेका सिर्फ हमारे पास है, वह पूरी तरह से गलत है। कांग्रेस ने भी देश में हिंदू संस्कृति के विकास और संरक्षण में समान रूप से योगदान दिया है। कांग्रेस की आत्मा हिंदू ही है। इसमें छिपाने लायक कुछ भी नहीं है। कांग्रेस के राज में मुसलमानों को उनका हक नहीं मिलेगा इसलिए बै. जिन्ना ने पाकिस्तान बनाया। गांधी जी के मुख पर तो राम नाम था ही। बिड़ला की मदद से महात्मा गांधी ने कई स्थानों पर भव्य मंदिर बनवाए। ‘रामराज्य’ की अवधारणा भी महात्मा गांधी ने ही प्रस्तावित की थी। तब भाजपा के वंशजों का पैदा होना बाकी था। लोकमान्य तिलक एक कर्मठ कांग्रेसी थे। लेकिन तिलक ने सार्वजनिक गणेशोत्सव, शिव जयंती की शुरुआत की। यह हिंदू संस्कृति पर ही आधारित था। यह आजादी से पहले का दौर था और आजादी से पहले के उस दौर में भाजपा का अस्तित्व नहीं था। हर कोई अपनी-अपनी कुव्वत के अनुसार, हिंदुत्व की रक्षा की जिम्मेदारी निभाता था। मुगल आक्रमण से हिंदू धर्म ने स्वयं ही अपनी रक्षा की। जब हिंदू मुसीबत में आया तब वह उभरकर अधिक मजबूत होकर सामने आया। सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कांग्रेस शासनकाल में ही हुआ, लेकिन मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा कौन करे, इस पर विवाद हो गया। सोमनाथ मंदिर गजनी ने कई बार लूटा था। मंदिर की पिंडी (शिवलिंग) को नष्ट कर दिया गया। यह मंदिर जूनागढ़ प्रांत के अंतर्गत था। वहां मुस्लिम शासन होने के कारण मंदिर का जीर्णोद्धार संभव नहीं था। देश की आजादी और प्रांतों के विलय होने के बाद सोमनाथ मंदिर का मुद्दा उठा। तब सरदार पटेल, राजाजी और के. एम. मुंशी ने पहल की और सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करने का निर्णय लिया। यह प्राण-प्रतिष्ठा सरदार पटेल के हाथों होनी थी, लेकिन उनके निधन के बाद सभी ने यह जिम्मेदारी डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को सौंप दी। राष्ट्रपति प्रसाद ने इसे मंजूरी दे दी। यहीं पर प्रधानमंत्री नेहरू और राष्ट्रपति के बीच मतभेद हुआ। नेहरू ने भारतीय संविधान का हवाला दिया। भारत में एक धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना हो चुकी है। ऐसी स्थिति में हमारे देश के राष्ट्रपति द्वारा सोमनाथ मंदिर में शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करना संविधान के विरुद्ध जाने के समान है। हम पाकिस्तान की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। दुनिया में हमारी धर्मनिरपेक्षता की हंसी उड़वाना ठीक नहीं है। नेहरू ने कहा कि हमें भारतीय संविधान का सम्मान करना चाहिए, लेकिन नेहरू की धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या से डॉ. प्रसाद सहमत नहीं थे। उनके अनुसार सोरटी सोमनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा भारत की अस्मिता की पुनर्स्थापना है। इसे लेकर नेहरू और प्रसाद के बीच काफी बहस हुई, लेकिन अंत में राष्ट्रपति प्रसाद सोमनाथ मंदिर की पुन: प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए। सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा कांग्रेस के ही राज्य में कांग्रेस के ही हाथों हुई थी। नेहरू, पटेल, प्रसाद, मुंशी ये कांग्रेस के ही लोग थे। यह स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव था और इसे करने वाले सभी नेकजात कांग्रेसी ही थे। हमारे देश में ४० हजार से ज्यादा मंदिर तोड़े गए। हिंदू समाज ने कभी नहीं कहा कि उन सभी स्थानों पर मंदिर बनाया जाना चाहिए, लेकिन तीन मंदिरों पर कोई समझौता नहीं हो सकता। अयोध्या की राम जन्मभूमि, मथुरा का कृष्ण मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर। इनमें से राम मंदिर का विषय पूरा हो चुका है। भले ही कांग्रेस की भूमिका संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष रही, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि कांग्रेस ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विरोध किया हो। प्रधानमंत्री राजीव गांधी की राय थी कि अयोध्या में राम मंदिर बनना ही चाहिए। पार्टी के एक धड़े के विरोध के बावजूद उन्होंने बाबरी मस्जिद के दरवाजे खुलवाए, राम के गर्भगृह में पूजा-अर्चना शुरू की। १९८९ में प्रचार के दौरान वे कहा करते थे कि देश में ‘रामराज्य’ आएगा। नवंबर १९८९ में राजीव गांधी ने ही विश्व हिंदू परिषद को राम मंदिर की आधारशिला रखने की अनुमति दी थी और तत्कालीन गृहमंत्री बूटासिंह को शिलान्यास समारोह में भाग लेने के लिए भेजा था। प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के शासनकाल में बाबरी मस्जिद जमींदोज हो गई। यदि केंद्र में भाजपा का प्रधानमंत्री होता तो वह बाबरी को कभी गिरने नहीं देता। १९९३ में ही नरसिम्हा राव सरकार अयोध्या की विवादास्पद भूमि अधिग्रहण के लिए एक अध्यादेश लेकर संसद में आई थी। ७ जनवरी १९९३ को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उस अध्यादेश को मंजूरी दे दी। राव की सरकार ने २.७७ एकड़ विवादित जमीन के साथ आस-पास की ६०.७० एकड़ जमीन पर कब्जा लिया। उस योजना में अयोध्या में एक राम मंदिर, एक मस्जिद, एक पुस्तकालय, एक म्यूजियम व अन्य सुविधाएं बनाई जानी थीं, लेकिन भाजपा ने तब राव की योजना का विरोध किया था। आज अयोध्या में जो बहुत कुछ हो रहा है, वह १९९३ की योजना में शामिल था। खास बात यह है कि कांग्रेस ने राम मंदिर का राजनीतिकरण नहीं किया। साल १९८५ में राजीव गांधी के सुझाव पर ही रामानंद सागर का लोकप्रिय धारावाहिक ‘रामायण’ दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया था। कहने का तात्पर्य यह है कि सोमनाथ मंदिर से लेकर अयोध्या के राम मंदिर तक हर चरण में धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस का सहभाग है। क्योंकि श्री राम देश के नायक हैं। डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने कहा है, राम सबके हैं, सबके रहेंगे। भगवान कृष्ण, प्रभु श्रीराम हमारी अस्मिता के शिखर हैं। ‘रामराज्य’ की संकल्पना ही महात्मा गांधी की थी। शिवसेना के जितना ही कांग्रेस का भी राम से नाता है। अगर राम मंदिर समारोह के उद्घाटन के लिए कांग्रेस को विशेष निमंत्रण है तो राजनीतिक मतभेदों को किनारे रखकर कांग्रेस को भी अयोध्या में जाना चाहिए। उसमें गलत क्या है?

अन्य समाचार