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संपादकीय: लाल किले से…

देश का ७७वां स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से राष्ट्र को संबोधित किया, इसमें नया क्या था? वही, सब पुराना। मोदी के प्रधानमंत्री पद के कार्यकाल को दस वर्ष होने को आए और लाल किले पर यह उनका नौवां भाषण था। मोदी और शाह ने यदि चाहा तो देश आम चुनाव का सामना कर सकता है। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव ने स्वतंत्रता दिवस के समारोह के दौरान कहा कि ‘मोदी का लाल किले से यह आखिरी भाषण है।’ श्री लालू यादव ने जो कहा वह सच साबित हो, लालू यादव के मुंह में घी शक्कर, ऐसी भावना देश के गांव-गांव में है। लाल किले पर २०२४ का तिरंगा मोदी नहीं फहराएंगे, ऐसा कुल मिलाकर माहौल है। लालू यादव ने अपनी बात बड़ी स्पष्टता से रखी इसलिए अब नए सिरे से उनके घर पर ‘ईडी’ का छापा पड़ सकता है और किसी झूठे मामले में फंसाकर यादव परिवार को प्रताड़ित किया जाएगा। पिछले दस वर्षों से हमारे देश में इससे अलग कुछ भी नहीं हुआ है। इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर लोकतंत्र की पिपीहरी बजाना, तिरंगा फहराकर भाषण देना यह एक इलाज बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में १४० करोड़ जनसंख्या का उल्लेख किया। हमारा देश जनसंख्या के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर पहुंचने की बात प्रधानमंत्री ने बड़े गर्व से बताई। देश जब स्वतंत्र हुआ था तब जनसंख्या ४० करोड़ थी। इसके ७७ साल में हम १४० करोड़ तक पहुंच गए, लेकिन १४० करोड़ जनता स्वतंत्रता मिलने का सुख सही मायने में भोग रही है क्या? मोदी ने जनता को यह आश्वासन दिया कि ‘मुझे फिर एक मौका दीजिए। मैं आपके हर सपने को पूरा करूंगा।’ लेकिन इससे पहले २०१४ और २०१९ में दिए गए आश्वासन और जनता को दिखाए गए सपनों का क्या हुआ? पहले यह बताइए। प्रधानमंत्री मोदी ९० करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रहे हैं। इस मुफ्त राशन के लिए जनता भीख का कटोरा लेकर लंबी कतार में रेंगती रहती है। क्या इसी को विकास और प्रगति के लक्षण माना जाए? लोगों को ऐसे पंगु बना देना यह स्वतंत्रता नहीं है। प्रधानमंत्री आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन मोदी को जो दस साल मिले उसे विपक्ष की निंदा, प्रताड़ित करने की नई-नई तरकीबें ईजाद करने और लागू करने में ही बीत गए। पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी, लालबहादुर शास्त्री, राजीव गांधी, नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी अपनी छाप छोड़ गए। कई नेताओं को मोदी की तुलना में कम समय मिला, लेकिन इन सभी नेताओं का राजनैतिक कार्य बेहतरीन रहा। मोदी को लगभग दस वर्षों का लंबा कार्यकाल मिला, लेकिन उनके हाथ से कोई महान कार्य वास्तव में हुआ क्या इसकी खोज करनी पड़ेगी। राजनैतिक विरोधियों का मजाक उड़ाने में ही उन्होंने अपना समय गवां दिया। इस बार मोदी ने लाल किले से दिए गए भाषण में मणिपुर हिंसा का उल्लेख किया। मणिपुर में जल्द ही शांति स्थापित होगी, ऐसा विश्वास उन्होंने व्यक्त किया, लेकिन जब मणिपुर के मुद्दे पर संसद में विपक्ष सवाल कर रहा था तब मणिपुर पर भूमिका स्पष्ट करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी संसद के आसपास नजर ही नहीं आए। मोदी को मणिपुर पर बोलने को मजबूर करने के लिए संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश करना पड़ा। आखिरकार, मोदी ने लाल किले से मणिपुर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बात की। यदि वह नहीं बोलते तो उन पर दोबारा हमले होते। मोदी लोकतंत्र और संसदीय परंपरा को मानने को तैयार नहीं हैं, लेकिन स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर पहुंचकर तिरंगा फहराते हैं। क्योंकि उनके लिए यह एक ‘इवेंट’ होता है। मंगलवार को लाल किले से दिए भाषण के माध्यम से ‘मैं फिर आऊंगा और २०२४ को मैं ही तिरंगा फहराऊंगा’ ऐसी घोषणा की। यह उनका अहंकार है। ‘फिर आऊंगा’ कहने वालों की हालत बाद में क्या होती है इसकी सीख उन्हें महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस को देखकर लेनी चाहिए। मोदी ने आगे कहा कि आज परिवारवाद और चाटुकारिता ने अपना देश बरबाद कर दिया है। किसी राजनैतिक दल की बागडोर सिर्फ एक ही परिवार के पास वैâसे रह सकती है? मोदी ने अपने स्वभावानुसार यह हमला कांग्रेस और गांधी परिवार पर किया है। दस साल सत्ता का उपयोग करने के बाद भी मोदी कांग्रेस और गांधी परिवार की गुत्थी में उलझे हुए हैं। उनके मन से गांधी व कांग्रेस नहीं निकल रहे हैं और लाल किले के इतिहास से नेहरू की अमिट छाप उन्हें चैन से रहने नहीं दे रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष आज गांधी परिवार के बाहर के हैं। सोनिया गांधी ने लगभग राजनीति से संन्यास ले लिया है। राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रधानमंत्री बनने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। संपूर्ण देश यही मेरा परिवार है। ‘मैं आपको भारत माता की रक्षा करते हुए मिलूंगा, जहां भी भारत माता पर आक्रमण होगा, मैं वहां आपको खड़ा मिलूंगा।’ ऐसा श्री राहुल गांधी कहते हैं, इसमें परिवारवाद कहां है? प्रियंका गांधी संपूर्ण देश में दौरा कर लोगों को तानाशाही के खिलाफ जगा रही हैं। परिवारवाद का उदय भारतीय जनता पार्टी में हो गया है और यह परिवारवाद भाजपा ने कांग्रेस से ही लिया है। एकनाथ शिंदे यह मुख्यमंत्री तो पुत्र सांसद, नारायण राणे केंद्रीय मंत्री तो पुत्र विधायक। देशभर में सभी महत्वपूर्ण पदों पर आज गुजरात के ही लोगों को रखा जा रहा है। यह भी एक तरह का परिवारवाद ही है। फिलहाल, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री एक ही राज्य के हैं। इससे पहले प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष एक ही राज्य के थे। यह सब इस ‘नेक’ इरादे से चल रहा है कि सारे सूत्र और कार्यान्वयन की शक्तियां हमारे हाथ में हों। यह परिवारवाद का ही रूप है। देश की न्याय प्रणाली, चुनाव आयोग, जांच तंत्र, राष्ट्रपति इत्यादि संवैधानिक संस्थाएं आज आतंक के घेरे में हैं। परिवारवाद के राज में लोग इतने भयभीत कभी नहीं थे। आज लाल किले पर भी भय और बेचैनी होगी। इसलिए ‘लाल किले से मोदी का यह आखिरी भाषण होगा’ लालू यादव की यह भविष्यवाणी १४० करोड़ जनता की, स्वतंत्रता की लड़ाई में शहीद हुए आत्माओं का अभिशाप साबित होगा!

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