मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : हमार बांग्ला!

संपादकीय : हमार बांग्ला!

पड़ोस के बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ लाखों लोग सड़कों पर उतर आए हैं। हसीना के राजनीतिक विरोधियों ने शनिवार को एक लॉन्ग मार्च निकाला। इस दौरान जबरदस्त हिंसा हुई। पुलिस, सरकारी दफ्तरों पर हमले किए गए, पुलिसकर्मी मारे गए। बांग्लादेश में जो चिंगारी भड़की है, वह शेख हसीना की मनमानी, तानाशाही कामकाज के खिलाफ है। लोकतंत्र, व्यक्ति स्वातंत्र्य की रक्षा के लिए किसी इस्लामिक देश में लोगों का सड़कों पर उतरना अभूतपूर्व ही माना जाएगा। बांग्लादेश के लोगों को अब न्यायपालिका पर भरोसा नहीं रहा, अदालतें सरकार के दबाव में हैं और निष्पक्षता से न्याय नहीं देतीं। बांग्लादेश के संविधान को महत्व नहीं दिया जाता और महत्वपूर्ण पैâसले सरकारी दबाव में लिए जाते हैं। नतीजा यह हुआ कि ढाका में भड़की हिंसा में मुख्य न्यायाधीश ओबेदुल हसन पर हमले की कोशिश की गई। मुख्य न्यायाधीश तो बच निकले, लेकिन उनके सरकारी आवास को प्रदर्शनकारियों ने जला दिया। लोकतंत्र की रक्षा में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका अहम होती है। जब शासक मनमानी कर रहे हों तब सर्वोच्च न्यायालय ही एकमात्र आशा की किरण होता है। जब ये रोशनी बुझ जाती है, तो देश में अंधेरा हो जाता है, देश अंधकारमय गुफा में धकेल दिया जाता है। लोग एक मर्यादा तक यह सब सहते हैं और जब यह असहनीय हो जाता है, तो प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश की कोई परवाह नहीं करता। बांग्लादेश में फिलहाल यही हो रहा है। शेख हसीना लोकतंत्रवादी होने का दिखावा करती हैं, लोकतंत्र पर भाषण देती हैं। वस्तुत: उनका व्यवहार इसके विपरीत है। बांग्लादेश में जनवरी में चुनाव होनेवाले हैं। विरोधियों को लगता है कि यदि शेख हसीना के हाथ में सत्ता रही तो चुनाव निष्पक्षता से नहीं हो पाएंगे। बांग्लादेश में ‘ईवीएम’ के जरिए चुनाव कराकर उसे जीतने का मंसूबा हसीना और उनके समर्थकों का था, लेकिन ईवीएम एक घोटाला है और बांग्लादेश में ‘ईवीएम’ की बजाय बैलेट पेपर से ही चुनाव कराए जाने का दबाव विपक्ष ने लाया और प्रधानमंत्री हसीना को वह स्वीकार करना पड़ा। भारतीय कंपनियों को बांग्लादेश चुनाव के लिए ईवीएम उपलब्ध कराने का ठेका दिया गया था, लेकिन भारतीय घोटालेबाज ‘ईवीएम’ प्रणाली अपने यहां नहीं चाहिए यह पैâसला वहां के सभी विरोधी दलों ने किया है, जो काफी महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह है कि भारतीय ‘ईवीएम’ की लोकप्रियता सरहदों के पार तक पहुंच चुकी है। बांग्लादेश में बी. एन. पी. और जमात-ए-इस्लामी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी हैं और शेख हसीना के अलोकतांत्रिक शासन के खिलाफ इन्होंने ही जंग छेड़ दी है। यह भारत के लोगों के लिए एक मार्गदर्शक है। बांग्लादेश का जन्म भारत के पराक्रम की वजह से हुआ है। इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान का बंटवारा करा दिया और बांग्लादेश का नेतृत्व शेख मुजीबुर रहमान को सौंप दिया। शेख मुजीबुर एक प्रगतिशील सोचवाले, लोकतांत्रिक नेता थे। उन्होंने बांग्लादेश में लोकतंत्र स्थापित करने की कोशिश शुरू कर दी, लेकिन उनकी हत्या कर दी गई। शेख हसीना मुजीबुर की बेटी हैं। बांग्लादेश की राजनीति में अनेकों उतार-चढ़ाव आए, सत्ताधारियों की हत्याएं हो गर्इं। भारत द्वारा बनाया गया यह देश भारत के ही खिलाफ हो गया। शेख हसीना भारत में आस्था रखती हैं, लेकिन हाल ही में उन्हें भारतीय ‘मोदी मॉडल’ की हवा लग गई और उन्होंने भारतीय तरीके से शासन करना शुरू कर दिया, लेकिन उनके खिलाफ लोग बड़ी निडरता से रास्ते पर उतरे और उन्हें चुनौती दी। बांग्लादेश में केंद्रीय जांच एजेंसी, पुलिस, मीडिया, सरकारी कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं। भारत में यही हो रहा है, लेकिन लोग सड़कों पर उतरने को तैयार नहीं हैं। लोग शांत हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि उनके मन में कुछ हो नहीं रहा है। शेख हसीना ने बांग्लादेश में अपने विरोधियों पर दबाव बनाने के साथ ही दमन शुरू कर दिया है। झूठे मामलों में फंसाकर मुकदमे भी दाखिल किए गए। हालांकि, कुछ को जेल भेज दिया गया, लेकिन वे लोगों की निडरता को खत्म नहीं कर सकीं। आज बांग्लादेश में माहौल यह है कि मुख्य न्यायाधीश का घर जलानेवाले लोग प्रधानमंत्री के घर में भी घुस सकते हैं। भारत में धार्मिक संप्रदायवाद को बढ़ावा देना, देश पर खतरा मंडराने जैसी झूठी छवि बनाना, विरोधियों को मूर्ख और भ्रष्ट बताने वाली भाषणबाजी भारत में शुरू रहती है। यही तस्वीर बांग्लादेश में भी है, लेकिन भारत में जिस प्रकार से ‘अंधभक्तों’ की टोलियां बन गर्इं वैसे अंधभक्त शेख हसीना बांग्लादेश में बनाने में असफल रहीं। दरअसल, उन्होंने भारत के गुजरात मॉडल को खूब भुनाया है। बांग्लादेश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना के खिलाफ विरोधियों ने आवाज उठाई और लाखों लोग सड़कों पर उतर गए। भारत में लोकतंत्र का ढिंढोरा तो पीटा जा रहा है, लेकिन लोगों का मुंह और कलाइयां ठंडे पड़े हुए हैं। भारत की न्यायपालिका दबाव में है और जैसा कि अशोक गहलोत बताते हैं, उसके अनुसार ‘ईडी’ जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों ने आवारा कुत्तों की तरह उत्पात मचा रखा है। लोगों में बेरोजगारी और गरीबी बढ़ गई है। फिर भी मोदी कहते हैं, २०२४ में मैं फिर आऊंगा! क्योंकि भूखी जनता के लिए अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है और मंदिर में आने का निमंत्रण दिया गया है। फिर देश का लोकतंत्र, संविधान, चीन की घुसपैठ, कश्मीरी पंडितों की फंस चुकी घर वापसी तो गौण राष्ट्रीय मुद्दे हैं। महाराष्ट्र में एक अवैध सरकार स्थापित कर उसकी रक्षा की जा रही है और सर्वोच्च न्यायालय की भी बात सुनने को कोई तैयार नहीं है। बांग्लादेश में भी यही हो रहा है। लाखों लोग सड़कों पर उतरकर शेख हसीना सरकार को सरपट दौड़ा रहे हैं। सरकार की चापलूसी करनेवालों को जनता ने घरों में बंद कर दिया है। एक इस्लामिक राष्ट्र में लोकतंत्र के लिए चल रहा यह संघर्ष अनुकरणीय है। अंधभक्तों के चंगुल में घुट रहे भारतीय लोकतंत्र के लिए ये एक मार्गदर्शक हैं। बांग्लादेश से सीखो, ऐसा कहने की नौबत भारतीय लोकतंत्र पर आना यह दुर्भाग्यपूर्ण नहीं तो और क्या है?

अन्य समाचार