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संपादकीय: अरे को क्या रे…!

कोई सरकार रामभरोसे चल रही है, ऐसा हमेशा कहा जाता है‌। लेकिन मौजूदा मिंधे सरकार मन्नत और मनौती तथा तंत्र-मंत्र पर चल रही है। इसलिए महाराष्ट्र के विपक्ष को इस (गंडे-डोरे-ताबीजवाली) सरकार के खिलाफ आवाज उठानी होगी। महाराष्ट्र में बेलगांव आए ऐसी मन्नतें कर मुख्यमंत्री शिंदे मंत्री विधायक लेकर फिर एक बार गुवाहाटी क्यों नहीं जाते? ऐसा प्रश्न हमने पूछा क्योंकि मुख्यमंत्री शिंदे के खासमखास अजय आशर को महाराष्ट्र में नीति आयोग की तर्ज पर स्थापित किए गए नए ‘मित्र’ के उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त करके खोके सरकार ने दिशा स्पष्ट की है। कहते हैं नीति आयोग की तर्ज पर यानी महाराष्ट्र इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसफॉरमेशन संस्था की स्थापना की गई वह इन अजय आशर महोदय के लिए। महाराष्ट्र में एक से बढ़कर एक आर्थिक क्षेत्र के जानकार और उद्योग क्षेत्र के महारथी होते हुए भी मुख्यमंत्री ने इस पद पर खोके सरकार के ‘टेकू’ अजय आशर की नियुक्ति की। अजय आशर के गुजरात संबंध ने ही महाराष्ट्र के बागी विधायकों को सूरत का रास्ता दिखाया था। सूरत में ‘हिसाब-किताब’ होने के बाद फिर गुवाहाटी। यह सब खोके की व्यवस्था करनेवाले महोदय महाराष्ट्र योजना आयोग के अध्यक्ष थे। यह जंतर-मंतर सिर्फ मुख्यमंत्री कर सकते हैं। महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा के आशीष शेलार ने ही श्रीमान आशर पर इससे पहले हमला बोला था। आघाड़ी सरकार में मौजूदा मुख्यमंत्री नगर विकास विभाग के मंत्री थे। उन दिनों नगर विकास विभाग के मंत्री भले ही एकनाथ शिंदे हों, उस विभाग के सारे निर्णय, यही आशर महोदय लेते हैं, ऐसा आरोप भाजपा के शेलार ने लगाया था। अब तो मुख्यमंत्री ने भाजपा की परवाह न करते हुए महाराष्ट्र के आर्थिक व उद्योग नीति के मामले का निर्णय लेने का सर्वाधिकार लिया और शेवाले मामा हाथ मलते रह गए। लेकिन विपक्ष हाथ मलते नहीं बैठेगा। वह एकजुटता के साथ सरकार की नाक में दम कर देगा। मूलरूप से महाराष्ट्र में ‘खोका क्रांति’ करने में इस आशर का बड़ा आर्थिक सहयोग है। उस उपकार के बोझ तले दबे मुख्यमंत्री ने आशर की प्रतिष्ठापना की, लेकिन उससे महाराष्ट्र का क्या भला होगा? महाराष्ट्र से छीनकर गुजरात ले गए उद्योगों को इन महोदय को फिर से वापस लाना चाहिए। निजी क्षेत्र और गैर-सरकारी संस्थाओं के सहयोग के द्वारा राज्य के जल्द व सर्वसमावेशक विकास के लिए ‘मित्र’ की स्थापना की गई है। अध्यक्ष पद की मुख्यमंत्री और उपाध्यक्ष पद की उपमुख्यमंत्री पर जिम्मेदारी है। लेकिन अजय आशर ये संस्था चलाएंगे। क्योंकि आशीष शेलार का ही दावा था कि आशर मुख्यमंत्री शिंदे के ‘प्रâंट मैन’ हैं। इस मामले में विपक्ष के पास कुछ विस्फोटक बम गोले हैं और वह नागपुर मे फूटे बगैर नहीं रहेंगे। इधर इस तरह की मनमानी करने वाली शिंदे-फडणवीस सरकार ने कानडी मुख्यमंत्री की मनमानी के आगे घुटने टेकने की नीति स्वीकार की है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने रोज सुबह उठकर महाराष्ट्र की बेइज्जती करने का घोषित कार्यक्रम शुरू किया है। इस पर विपक्ष को एक साथ आकर वङ्कामूठ का प्रहार करना होगा। अब यहां भी भाजपा के आशीष शेलार ने नाप-तोल कर कहा कि ‘कर्नाटक ने ‘अरे’ किया तो ‘क्या रे’ से उत्तर देंगे‌।’ भाजपा का यह ढोंग है। कर्नाटक में भाजपा की सरकार है। महाराष्ट्र के मंत्रियों को वहां की सरकार ने बेलगांव में जाने से रोक दिया। महाराष्ट्र के सैकड़ों गांवों पर उन्होंने अपना हक जताया। लिहाजा, यह मामला ‘अरे’ से आगे चला गया है और ‘क्या रे’ वाले दुम दबाकर बैठे हुए हैं। ‘अरे’ को ‘क्या रे’ करने की हिम्मत होती तो भाजपा वाले बेलगांव में घुसकर उस बोम्मई का मुंह रंग देते। वास्तविक में जो छत्रपति शिवराय का अपमान सहन कर लेते हैं और ‘क्या रे’ की भाषा बोलें, यह अपने आप में एक व्यंग्य है। महाराष्ट्र की जनता मूर्ख नहीं है, इसे ध्यान में रखिए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री आज भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं हैं कि ‘बेलगांव-कारवार सहित पूरा सीमा क्षेत्र महाराष्ट्र का है! और उसे फिर से महाराष्ट्र में लाए बगैर शांत नहीं बैठेंगे।’ शिंदे-फडणवीस ने एक बार भी ऐसी गर्जना की क्या? दूसरी ओर कानडी मुख्यमंत्री सीमा क्षेत्र के लिए लड़ रहे हैं और महाराष्ट्र के गांवों पर भी दावा ठोक रहे हैं और महाराष्ट्र सरकार के शेलार मामा ‘अरे’ को ‘क्या रे’ में जवाब देने की भाषा बोल रहे हैं। यह तो ऐसा ही हुआ कि ‘चीन लद्दाख में घुसकर हमारे भूभाग को कब्जे में करे और हम उन्हें अपनी एक इंच जमीन भी नहीं लेने देंगे, ऐसा दम भरें! अरे भाई वह तो पहले से एक हाथ अंदर घुस आए हैं। वैसा ही महाराष्ट्र में हुआ है। कानडी सरकार की यह ‘घुसपैठ’ केवल मजबूर, लाचार और गुजरात की थाली के नीचे बिल्ली बनी सरकार के कारण शुरू है।‌ खोके सरकार के विधायक महिलाओं को अभद्र भाषा में गालियां देते हैं। दूसरे विधायक शिवसेना नेताओं को मां-बहन की वैâमरे के सामने गालियां देते हैं। इस नई विकृति का उदय महाराष्ट्र की राजनीति में हो रहा है। इसे मिलकर तोड़ना होगा। किसानों के मसले दिन-ब-दिन विकट होते जा रहे हैं। उस पर ली गई ठोस भूमिका कहीं नजर नहीं आ रही है। शिंदे-फडणवीस सरकार केवल अपनी मर्जी के विधायकों-बिल्डरों और ‘मित्रों’ के लिए काम कर रही है। शिवराय का अपमान और जनता गई भाड़ में यदि किसी को लगता है तो अतिशयोक्ति है। इस भ्रम का खरबूजा जल्द फूटेगा। विपक्ष अब नरसिंह बनकर खोके सरकार काम करे। यह अब समय आ गया है। अरे का जवाब क्या रे से मतलब क्या? ये दिखाने के लिए हिम्मतबाज मर्दों की कलाई लगती है, जो जल्द ही दिखाई देगी।

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