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संपादकीय : समृद्धि महामार्ग …खून और आंसू

नाम में ‘समृद्धि’ वाले महामार्ग पर हादसे और दुर्घटनाओं की शृंखला थमने का नाम ही नहीं ले रही है। जिस समृद्धि की कल्पना इस महामार्ग के निर्माताओं ने की थी, वह समृद्धि कब आएगी ये कोई नहीं कह सकता है। परंतु इस महामार्ग पर हादसे, दुर्घटनाओं और निरपराध लोगों की बलि दिन-प्रतिदिन ‘बढ़’ ही रही है। बीते महीने में महामार्ग पर निजी ट्रैवेल्स बस के हादसाग्रस्त होने से २५ प्रवासियों की जलकर मृत्यु हो गई थी। अब शाहपुर तालुका अंतर्गत सरलांबे में पुल का काम जारी रहने के दौरान सोमवार की मध्य रात्रि में भयंकर हादसा हुआ। इसमें २० मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई। गर्डर मशीन को जोड़नेवाली क्रेन और स्लैब लगभग १०० फुट की ऊंचाई से मजदूरों पर ढह गया। अब इस हादसे की जांच करने का सुलभ मार्ग राज्य सरकार ने अपनाया है। मुआवजे की घोषणा की गई है। शासकों ने दुख आदि का इजहार किया, परंतु ऐसी नौबत समृद्धि महामार्ग पर बार-बार क्यों आ रही है, इसका विचार आप कब करोगे? बीते महज ७ महीनों में इस महामार्ग पर हुए हादसों में करीब १०७ लोगों की बलि चढ़ चुकी है। इसमें सोमवार को हुए हादसे में २० लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत और जुड़ गई। नागपुर से मुंबई तक इस महामार्ग ने सफर का समय अवश्य कम किया है, लेकिन इसी दौरान काल बनकर कई लोगों की जान ले रहा है। यह महामार्ग ‘हादसों के महामार्ग’ के रूप में कुख्यात होता जा रहा है। नाम में समृद्धि वाले महामार्ग के संदर्भ में ऐसी अवस्था न सरकार के लिए शोभनीय है और न ही जनता के लिए सुखद। लेकिन फिर भी महामार्ग के शेष २०० किलोमीटर का काम आगे बढ़ाया जा रहा है। जिस सरलांबे स्थित पुल पर सोमवार को हादसा हुआ, उस पुल के काम के मामले में भी सरकार की ऐसी ही जल्दबाजी शुरू होने का आरोप लग रहा है। पुल के शेष २० फीसदी काम अगले महीने के अंत तक पूरा करने का ‘टार्गेट’ ठेकेदार कंपनियों को दिया गया है। इसलिए रात-दिन बरसाती माहौल के बाद भी इस पुल का काम जारी है। इसी दबाव और जल्दबाजी ने २० निर्दोष मजदूरों की दर्दनाक बलि ले ली और उनके परिवारों को बेसहारा कर दिया। बीते महीने में लग्जरी बस के हादसे को लेकर सरकार ने संबंधित बस के चालक के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया था। परंतु अब सोमवार को हुई दुर्घटना के संदर्भ में क्या करनेवाली है। ठेकेदार कंपनी के खिलाफ मुकदमा दायर करके उन्हें बलि का बकरा बनाएंगे और खुद फिर से मुक्त हो जाएंगे! कल हुए हादसे के वास्तविक कारण जांच में सामने आएंगे ही लेकिन इस महामार्ग पर अब तक हुए छोटे-बड़े हादसों, उनमें मौतों की नैतिक जिम्मेदारी सरकार के रूप में आपकी नहीं है क्या? इसका क्या प्रायश्चित आप करनेवाले हो? अथवा सिर्फ हादसा हुआ, दुर्घटना हुई तो अफसोस जताना, मृतक और उनके वारिसों के नाम पर ‘आंसू’ बहाना, मुआवजे की फौरी मरहमपट्टी लगाना इतना ही करनेवाले हो क्या? समृद्धि महामार्ग पर आज तक हुए हादसों में मरनेवालों की चीखें, उनके परिजनों के क्रंदन से न सरकार के कान का पर्दा फटता है और न हृदय द्रवित होता है। कहा जाता है कि ‘समृद्धि’ महामार्ग मतलब राज्य सरकार का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ है। होगा भी, लेकिन आपका यह ‘स्वप्न’ निरपराध लोगों के लिए ‘काल स्वप्न’ सिद्ध हो रहा है उसका क्या? उस पर समृद्धि आएगी आदि ‘दिवास्वप्न’ है ही। शासक सपना देखते हैं और उसकी कीमत निरपराध लोग अपनी ‘मौत’ से चुकाएं, ऐसा ही समृद्धि महामार्ग के संदर्भ में हो रहा है। सोमवार को हुए पुल हादसे ने एक बार फिर यही साबित किया। सत्ताधारियों को समृद्धि महामार्ग का सपना अवश्य देखना चाहिए, परंतु निरपराधों का खून और उनके परिजनों के आंसू से यदि आपका यह महामार्ग लगातार भीगता रहेगा तो इसे ‘समृद्धि’ वैâसे कह सकते हैं? यह हादसाग्रस्त समृद्धि महामार्ग द्वारा खड़ा किया गया ज्वलंत सवाल है। इस महामार्ग के कर्ता-धर्ता ही आज राज्य के मुख्य और उपमुख्य हैं। उनके पास इन सवालों का क्या जवाब है?

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