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संपादकीय : प्याज निर्यात शुल्क में वृद्धि …मोदी सरकार के ‘खाने के दांत’

किसानों की आमदनी दोगुनी करने का आश्वासन देनेवाली मोदी सरकार असल में किसानों (बलिराजा) को कमाई करने से रोकने का काम कर रही है। इस सरकार की नीति ना ही किसानों के हित की है और न ही ग्राहकों के फायदे की। उसमें भी कृषि उत्पादों को लेकर इतने धड़ाधड़ पैâसले लिए जा रहे हैं कि किसानों की जेब में चार पैसे भी अतिरिक्त न जाएं। प्याज उत्पादकों के लिए तो यह रोजमर्रा की बात हो गई है। इस बार भी प्याज के निर्यात शुल्क में सीधे ४० प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करने के केंद्र के इस फैसले ने किसानों की ही परेशानी बढ़ाई है। प्याज की कीमतें काबू में रहें इसी के मद्देनजर निर्यात शुल्क वृद्धि की गई है, ऐसी दलील सरकार की ओर से दी गई है। लेकिन इस वजह से प्याज उत्पादकों की अतिरिक्त आय फिसल गई उसका क्या? सरकार द्वारा निर्यात शुल्क वृद्धि के तुरंत बाद प्याज की कीमत में प्रति क्विंटल लगभग २०० रुपए की कमी आई। प्याज का अधिकतम मूल्य २,५०० से गिरकर २,३०० रुपए तक नीचे चला गया। भविष्य में इस मूल्य में और भी गिरावट देखी जाएगी यह तय है। क्योंकि निर्यात शुल्क वृद्धि होने से निर्यात में कमी आएगी, घरेलू बाजार में प्याज की उपलब्धता बढ़ेगी, जिसमें कीमत कम होगी। इसलिए ग्राहकों को अब प्याज रुलाएगा नहीं यह तो सही है। लेकिन आम प्याज उत्पादकों की आंखों से आंसुओं की जो धारा बह रही है उसे कौन पोंछेगा? ग्राहकों की जेब से पैसे निकालो और किसानों (बलिराजा) की जेब में डालो, ऐसा कोई कहनेवाला नहीं है। किसान और ग्राहक की लाभ-हानि का ‘पलड़ा’ ज्यादा से ज्यादा वैâसे समान होगा, इसकी जिम्मेदारी और कर्तव्य केंद्र सरकार को निभाना होता है। लेकिन मोदी सरकार के घोड़ों को हमेशा यही चारा मिलता रहा है। कृषि उत्पाद की कीमत वृद्धि का लाभ किसानों को ही होता है, यह तर्क भी अक्सर भ्रामक होता है। पिछले डेढ़-दो महीनों से टमाटर की कीमत प्रतिकिलो २०० रुपए तक उछली थी। इसका भी सीधा फायदा किसानों को कितना हुआ होगा, यह शोध का विषय है। प्याज के मामले में भी इससे कुछ अलग अनुभव नहीं होगा। जब प्याज की कीमतें गिर जाती हैं तब किसानों पर इसे फेंकने की नौबत आ जाती है या फिर कौड़ी के दाम में बेचना पड़ता है। यदि दाम बढ़ते हैं तो केंद्र की माई-बाप सरकार ही दर नियंत्रण नीतियों की कुल्हाड़ी से प्रहार करने लगती है। निर्यात से मिलनेवाली अधिक आय किसानों को लेने नहीं देती। प्याज के निर्यात शुल्क वृद्धि के मोदी सरकार के पैâसले से यही होनेवाला है। इस फैसले का झटका महाराष्ट्र के प्याज उत्पादकों को लगा है। इसलिए प्याज उत्पादक जिलों में यदि किसानों ने प्याज की नीलामी बंद रखने की चेतावनी दी है तो इसे गलत कैसे कहा जा सकता है? किसानों की जेब में कभी-कभार जैसे ही ज्यादा मुनाफा मिलने का समय आता है तब उसी वक्त सरकार या तो निर्यात शुल्क वृद्धि कर देती है या फिर निर्यात बंदी के चाबुक से प्रहार करती है। अब भी किसान को प्याज के निर्यात से मिलनेवाली रकम छोड़नी पड़ रही है। फिर एक बार मोदी सरकार ने यह फैसला अचानक घोषित किया है। उसमें भी स्पष्टता नहीं है। इस वजह से पहले से ही निर्यात के लिए भेजे गए हजारों टन प्याज सीमा पर और बंदरगाह पर अटके पड़े हैं। यदि वे कंटेनर में ही सड़ गए तो न तो निर्यात होगा और न ही देश में उसकी बिक्री होगी। दोनों मामले में नुकसान किसान का ही होगा। दरअसल, पिछले साल के मुकाबले जुलाई तक भारतीय प्याज निर्यात में ६३ फीसदी की भारी बढ़ोत्तरी हुई है। इसमें और भी बढ़ोत्तरी हो सकती थी, लेकिन सरकार के निर्यात शुल्क वृद्धि के कारण इस निर्यात पर ही ब्रेक लग गया है। इसके चलते प्याज उत्पादक की बढ़ी हुई आमदनी तो डूबी ही, साथ ही देशांतर्गत कीमत गिरने के कारण उसे दोहरी मार सहन करनी पड़ेगी। इस देश के प्याज उत्पादक हमेशा आसमानी-सुल्तानी के चक्कर में फंसे रहते हैं। प्याज ने राजनेताओं को भी रुला दिया है। कई बार सत्ता से भी बेदखल किया है। इसके बावजूद प्याज उत्पादक को रुलाने का, किसानों (बलिराजा) को हल्के में लेने का साहस वर्तमान सरकार कर रही है। देश में सब्जी, दाल-अनाज से लेकर सभी चीजों की कीमतें रिकॉर्ड तोड़ रही हैं। पिछले महीने टमाटर ने २०० रुपए का आंकड़ा पार किया था। यदि आनेवाले समय में प्याज ने भी इसी के साथ कदम से कदम मिलाया तो पहले से ही महंगाई से त्रस्त जनता कुछ राज्यों में मुहाने पर पहुंचे विधानसभा चुनाव में केंद्र की सत्ता पक्ष पर ‘मतबंदी’ की कुल्हाड़ी चलाएगी, यही मोदी सरकार का असली आतंक और डर है। इसी डर की वजह से प्याज निर्यात शुल्क में ४० प्रतिशत वृद्धि करने का पैâसला सरकार ने जल्दबाजी में लिया है। कीमतों पर नियंत्रण और जनता का हित यह सब दिखाने के दांत हैं। आम प्याज उत्पादकों के पेट पर मारा गया निर्यात शुल्क वृद्धि की यह लात ही मोदी सरकार के ‘खाने के दांत’ है। निर्णय से त्रस्त किसान और महंगाई से ग्रस्त जनता आनेवाले चुनाव में सत्तारूढ़ दल के इन दांतों को उन्हीं के गले में ठूंसे बगैर नहीं रहेगी।

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