मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : महंगाई कम हो गई भाईऽऽऽ... ‘दस्तावेजी’ फुफकार!

संपादकीय : महंगाई कम हो गई भाईऽऽऽ… ‘दस्तावेजी’ फुफकार!

हमारे देश में जनता लगातार बढ़ रही महंगाई से त्रस्त है। खाद्यान्न की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि होने से क्या खाएं, यह सवाल लोगों के सामने खड़ा हो गया है। फिर भी ‘देश में महंगाई कम हो गई’ ऐसी एक खबर सरकारी हवाले से आई है। अब सरकारी हवाला है तो! उसका और प्रत्यक्ष रूप से वास्तविक स्थिति से कहां संबंध होता है? वैसे सरकार के ये सभी हवाले आंकड़ों में जोड़-तोड़ करके तैयार किए होते हैं। लिहाजा ‘दस्तावेजी’ फुफकार के आगे इसका कोई अर्थ नहीं होता। सरकार केवल अपनी पीठ थपथपाती है। अब महंगाई कुछ हद तक कम हुई है, इस सरकारी दावे के बारे में इससे कुछ अलग घटित नहीं हुआ है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय ने सोमवार को जो जानकारी जारी की, उसके तहत थोक और खुदरा महंगाई दर में कमी आई है। थोक महंगाई की दर तकरीबन १८ महीनों बाद एक अंकी आंकड़े में आई है। थोक मूल्य सूचकांक अप्रैल २०२१ से सितंबर २०२२ तक लगातार १८ महीनों तक दोहरे अंकों में रहा। लेकिन अब वह ८.३९ प्रतिशत नीचे आ गया है। खुदरा महंगाई की दर भी खिसक कर ६.७७ फीसदी नीचे आ गई है। इस गिरावट के कारण ईंधन और बिजली महंगाई भी ३२.६१ प्रतिशत से घटकर २३.१७ फीसदी नीचे आ गई है, ऐसा दावा सरकार ने किया है। सरकार की यह आंकड़ेवारी और आंकड़ों का मेल-मिलाप उनकी हमेशा की कार्यप्रणाली का हिस्सा है। सरकार खुद की पीठ खुद ही थपथपा रही है। वादा पूरा करने का दावा किया जा सकता है। आम जनता का जीवन हमने किस तरह आरामदायक बनाया है, उसकी भी तस्वीर खड़ी की जा सकती है। अब भी ‘महंगाई दर कम होने के सरकारी दावे से इससे अलग कुछ भी नहीं होगा। क्योंकि सरकार कितना भी कह रही है लेकिन प्रत्यक्ष रूप से सब्जी से लेकर अनाज तक, शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर यात्रा तक सभी क्षेत्रों में दर वृद्धि नहीं रुकी है। विलासिता की बातें हों या रोजमर्रा की जरूरत की वस्तुएं, इनकी कीमतें आज भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। जीने के लिए जरूरी अनाज भी आम आदमी के बस के बाहर हो गया है। एक तरफ स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव का ढोल पीटा जा रहा है और दूसरी तरफ अनाज की कीमतें आजादी के इतिहास में सर्वाधिक बढ़ गई हैं। इसलिए अच्छे दर्जे के लोकवान जैसे गेहूं के बदले ‘मिलबर’ निम्न किस्म का गेहूं खरीदने की नौबत आम जनता पर आ गई है। इस गेहूं का उपयोग केवल आटा, मैदा तैयार करने के लिए किया जाता है। ग्रामीण लोगों का भोजन ज्वार भी ४० प्रतिशत महंगा हो गया है। ज्वार की रोटी, चटनी और प्याज हमारे देश में गरीब लोगों का भोजन है। ज्वार की रोटी तो उनके लिए ‘महंगी’ हो ही गई है लेकिन पशु खाद्य के लिए उपयोग में लाई जानेवाली ज्वार भी खाने का समय उन पर आ गया है। क्या इसे ही आजादी के अमृत महोत्सव का फल कहा जाए? सरकार कहती है, चालू वित्त वर्ष में गेहूं का निर्यात दोगुना हो गया है और यह बड़ी ‘उपलब्धि’ है। लेकिन यहां देश की आम जनता, गरीबों का पेट महंगाई के कारण तड़प रहा है, उसका क्या? केंद्र सरकार का इस पर क्या कहना है? जो हाल गेहूं-ज्वार का है, वही बाजरे का भी है। बाजरे की कीमतें भी आम जनता की पहुंच के बाहर हो गई हैं। बारिश के कारण काले पड़ गए निम्न किस्म के बाजरे को भी बढ़े दाम में खरीदने की नौबत आ गई है। क्या इस दर वृद्धि का फायदा फसल उगानेवाले बलिराजा को मिल रहा है? हमेशा की तरह दर वृद्धि की बहती गंगा में स्टॉकिस्ट, व्यापारी, कॉर्पोरेट कंपनियां हाथ धो रही हैं। देश में ज्वार, बाजरा, गेहूं महंगे हो गए हैं। अनाज और दाल की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। खाद्य तेल भी महंगा हो गया है। रोजमर्रा की सब्जियां भी सस्ती नहीं हो रही हैं। फिर भी केंद्र सरकार का कहना है, ‘देश में महंगाई कम हो गई भाईऽऽऽ!’ एक तरफ महंगाई बढ़ी हुई है। आम जनता उसमें पिस रही है और दूसरी तरफ सरकार उस पर ‘दस्तावेजी’ फुफकार के माध्यम से जनता को गुमराह कर रही है। जनता ऐसे भ्रम के बहकावे में इस बार नहीं आएगी, सरकार इसे ध्यान में रख ले।

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