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संपादकीय : निवेश के आंकड़े; रोजगार की तंगी

जब जनता को बताने के लिए कुछ नहीं हो तो बड़ी और खोखली घोषणाएं करना यह राज्य की शिंदे सरकार का आम उद्योग है। इसके अलावा समय-समय पर करोड़ों के वित्तीय निवेश के आंकड़े भी ये सरकार घोषित करती रहती है। अब भी राज्य सरकार ने ऐसे ही कई लाख करोड़ के निवेश की घोषणा की है। सरकार ने घोषणा की है कि हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए राज्य में लगभग २७६ हजार ३०० करोड़ रुपए का निवेश हुआ है। यह निवेश कुल छह परियोजनाओं में किया जाएगा और इसके लिए विभिन्न कंपनियों के साथ करार किया गया है। स्टील उत्पादन के लिए आर्सेलर मित्तल
निप्पॉन स्टील इंडिया कंपनी के साथ भी एक अनुबंध किया गया है। यह अनुबंध भी ४० हजार करोड़ रुपए का है। वित्तीय निवेश का करार-अनुबंध करना सरकारी कामकाज का एक नियमित हिस्सा है। यह एक नियमित चलने वाली प्रक्रिया है। लेकिन वर्तमान शासक इस पर ऐसे इतरा रहे हैं कि मानो उनके कार्यकाल में ही इतना बड़ा निवेश हो रहा है, राज्य के बुनियादी ढांचे का विकास हो रहा है। जिस हरित हाइड्रोजन उत्पादन के नाम पर २.७६ लाख करोड़ रुपए के निवेश की स्वीकृति सरकार कर रही है, वह हरित हाइड्रोजन असल में समय की ही मांग है। लेकिन उसके लिए किया गया अनुबंध आपको खुद के लिए ‘ऑक्सीजन’ क्यों लग रहा है? एक शासक के तौर पर राज्य के विकास की गति बढ़ाना, उसके लिए घरेलू और विदेशी निवेश लाना, यह सरकार का ही कर्तव्य है। अब तक की सभी सरकारों ने वह निभाया है। इसीलिए महाराष्ट्र सदैव देश का अग्रणी राज्य बना रहा। आज भी महाराष्ट्र की ये प्रतिष्ठा कायम है। तो यह सिर्फ आपकी सरकार का श्रेय नहीं है। लेकिन वर्तमान शासकों की नीति ‘मेरा तो मेरा और तेरा भी मेरा’ वाली है। पिछले साल भी इस सरकार ने विदेशी निवेश को लेकर ऐसे ही श्रेय लिया था। उन्होंने दावा किया था कि वर्ष २०२२-२३ के दौरान राज्य में १ लाख १८ हजार ४२२ करोड़ रुपए का विदेशी निवेश हुआ और महाराष्ट्र नंबर वन बन गया। लेकिन इन नंबरों की जुमलेबाजी का तुरंत खुलासा भी हो गया था। क्योंकि उस निवेश अवधि के १५ महीनों के दौरान, राज्य में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास आघाड़ी की सरकार थी। इसलिए विदेशी निवेश के श्रेय में महाविकास आघाड़ी सरकार की भी हिस्सेदारी थी, लेकिन पहले की सरकार को श्रेय देने से इनकार करना वर्तमान शासकों की नीति है। मूलत: यह सरकार आर्थिक-औद्योगिक विकास के मामले में ‘तीन तिगाड़ा; काम बिगाड़ा’ ही साबित हुई है। जनता से कहने के लिए राज्य के शासकों के पास कुछ भी नहीं। इसलिए वे आर्थिक निवेश और उससे पैदा होने वाले कथित रोजगार के आंकड़ों के गुब्बारे हवा में छोड़ते रहते हैं। २.७६ लाख करोड़ रुपए के निवेश और ९२ हजार रोजगार की ‘हवा’ भरकर छोड़ा गया हरित हाइड्रोजन उत्पादन का यह ‘गुब्बारा’ उसी का हिस्सा है। महाराष्ट्र में घरेलू और विदेशी निवेश बढ़ रहा है तो दुखी होने की कोई वजह नहीं है। इसे बढ़ना ही चाहिए, लेकिन आर्थिक निवेश और उससे निर्माण होने वाला रोजगार हकीकत में दिखना भी चाहिए। मौजूदा हुक्मरान भले ही रोजगार निर्माण की घोषणाएं कर रहे हों, लेकिन हकीकत में रोजगार की बजाय बेरोजगारी के आंकड़े ही बढ़ते दिख रहे हैं। यानी कुछ हजार नौकरियों के आंकड़े कागजों पर ही रहते हैं। निवेश के आंकड़े; लेकिन रोजगार की तंगी, यही महाराष्ट्र की मौजूदा हकीकत है। लेकिन सत्ताधारी कई लाख करोड़ के निवेश की पतंगबाजी में मशगूल हैं!

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