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संपादकीय : क्या फर्श बदलना ही फर्ज है? …रेलवे को नैतिक जिम्मेदारी का एहसास कब होगा?

आकलनों पर गौर करें तो भारतीय रेलवे दिन-प्रतिदिन सुरक्षा के मामले में फिसलती जा रही है। चुनाव दर चुनाव रेलवे को सुरक्षित करने के तमाम सियासी वादे होते रहे हैं। २०१४ से पहले भी मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार ने ऐसे बड़े-बड़े वादे किए थे, परंतु आज सत्ता में ९ वर्षों से अधिक समय रहने के बाद भी यदि आम रेल यात्री को उन वादों पर विश्वास नहीं होता, तो इसके पीछे पुख्ता कारण भी हैं। २०१४ से आज तक लगातार भारतीय रेलवे में आधुनिकीकरण और यात्री सुविधाओं को बेहतर बनाने के नाम पर तरह-तरह के शुल्क और चार्जेस वसूल किए जा रहे हैं। निजी भागीदारी बढ़ाई जा रही है, तेजी से निजीकरण किया जा रहा है। एक तरह से देखें तो पिछले दशक की तुलना में इस दशक में आम यात्री, उसी पुरानी यात्रा के लिए लगभग दो गुना किराया अदा कर रहा है, उसकी एवज में उसे मिल क्या रहा है? तो कुछ ट्रेनों के बदले हुए नाम और कुछ स्टेशनों की पुरानी फर्श की जगह पर ग्रेनाइट या मार्बल की नई फर्श। वो फर्श भी भारी फुटफॉल के दबाव में जगह-जगह दम तोड़ चुकी है। ऐसे में आज हर हिंदुस्थानी के मन में सवाल है कि क्या अब फर्श बदलना ही रेलवे का फर्ज रह गया है? नए भारत में रेल परिसर में कदम रखने से लेकर, वेटिंग रूम सुविधाओं और यात्री बीमा तक के लिए यात्रियों को अलग से जेब ढीली करनी पड़ रही है। रफ्तार के नाम पर जमकर वसूली हो रही है। कभी फ्लैसी फेयर और डायनॅमिक फेयर के नाम पर भारी लूट हुई तो कभी किसी और नाम पर। एक ओर रेलवे लगातार मुनाफा वसूलती है तो दूसरी ओर अपनी सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों और नैतिक फर्ज से भी मुंह मोड़ती है। जिससे ट्रेनों में यात्रा करना महंगा भी हुआ है तो अब कम सुरक्षित और जानलेवा भी। भारतीय रेलवे में यात्रा की अब कोई सुरक्षा गारंटी नहीं है। अभी कुछ दिन पहले ही जिस तरह से जयपुर-मुंबई एक्सप्रेस में एक रेल सुरक्षा रक्षक ने अपने सहयोगी समेत तीन यात्रियों को गोलियों से भून दिया था, वो इस बात का ताजा उदाहरण है कि रेल यात्रा आज किस तरह से असुरक्षित है। जबकि दो माह पहले ओडिशा में हुई तिहरी रेल दुर्घटना इस बात का उदाहरण है कि इन दिनों रेल सुरक्षा से कहां तक समझौते हुए हैं, तो वहीं रेलवे दावा अधिकरण का एक हालिया पैâसला इस बात का उदाहरण है कि अब रेलवे अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से कितना मुंह मोड़ चुकी है। हाल ही में रेलवे दावा अधिकरण ने एक मामले में यात्रा के दौरान चलती ट्रेन से गिरने के चलते हुई यात्री की मौत पर जिम्मेदारी तय की है। रेलवे प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि वो मृतक के आश्रितों को बतौर क्षतिपूर्ति ८ लाख रुपए मय ९ प्रतिशत ब्याज, हर्जाना दे। जिस यात्री की मौत हुई थी, वो ९ नवंबर, २०२२ को वैध टिकट के जरिए कामाख्या एक्सप्रेस से मोरबी जा रहा था। सुबह के समय जब वो कोच के वॉश-बेसिन में हाथ धो रहा था, तभी रेल के एक झटके ने उसे बाहर फेंक दिया, जिसमें उसकी मौत हो गई। परिजनों के मांगने के बावजूद मुआवजा नकार दिया गया। गत कुछ वर्षों में ऐसे तमाम मामले नजर आए हैं, जहां रेलवे अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ती दिखी है। अतिरिक्त खर्च और ज्यादा शुल्क देने के बाद भी जब आम यात्री को कम व निम्न स्तरीय सुरक्षा मिले, उसकी जान जोखिम में रहे और सही सुनवाई न हो तो रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के लिए सकारात्मक कदम उठाना जरूरी हो जाता है। वर्ना, जनता अगले वर्ष आम चुनावों में जवाब भी मांगेगी और हिसाब भी करेगी। बेशक, आप रेलवे को रफ्तार देने का काम करें, प्लेटफॉर्मों को मार्बल-ग्रेनाइट से चमकाएं पर जब तक ये रफ्तार और चमक आम यात्री की सुरक्षा में नजर नहीं आती, तब तक आपके सारे प्रयास विफल ही हैं। कोई भी यात्री या उसके परिजन मुआवजे के अभिलाषी नहीं होते, परंतु सरकार इसे देती है तो अपनी नैतिक जिम्मेदारी का अहसास दिलाने के लिए। यदि यह अहसास भी मर जाए तब क्या दलील ही दी जाए? इस अहसास को जिंदा रखिए। जब आप नए भारत की बात करते हैं तो नई जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकते, नई सुरक्षा को ताक पर नहीं रख सकते। देश में रेल तेजी से दौड़ें पर उनकी दौड़ में आम यात्रियों का जीवन न कुचला जाए, यह सुनिश्चित करना भी नरेंद्र मोदी सरकार की ही जिम्मेदारी होनी चाहिए। तभी सही अर्थों में ‘वंदे भारत’ की वंदे-वंदे हो सकेगी। रॉलिंग स्टॉक के साथ-साथ जब तक समूचे रेल इंप्रâास्ट्रक्चर की मजबूती नहीं होगी, तब तक आपके ‘बुलेट’ सपने निरर्थक ही कहलाएंगे। निरर्थक प्रयासों से सरकार को बचना चाहिए। सार्थकता में ही विकास है, इस तथ्य को स्वीकार कीजिए। जितना जल्दी स्वीकार करोगे, उतना बेहतर!

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