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संपादकीय : इसी का नाम चमत्कार है!

राज्यसभा के चुनाव संपन्न हुए। दूसरी पसंद के वोटों के आधार पर तीसरी जगह जीतने में भाजपा को सफलता मिली। इसलिए विधान परिषद चुनाव में भी चमत्कार होगा, ऐसा विपक्ष के नेता श्री देवेंद्र फडणवीस व भाजपा के प्रांत अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील का कहना है। राज्यसभा का चुनाव भाजपा ने सीधे मार्ग से अथवा नियमों का पालन करके नहीं जीता है, ये सभी जानते हैं। अर्थात फिलहाल राजनीति के मैदान में सब कुछ माफ है। विशेषत: कलियुग में जो मोदी युग शुरू हुआ, वह राजनीति न होकर दुष्टनीति है। राज्यसभा व विधान परिषद के चुनाव टाले जा सकते थे। विधान परिषद की पांचवीं सीट जीतने के लिए भाजपा को कम से कम २० वोटों की आवश्यकता है। फिर भी ‘हम ही चमत्कार करेंगे’ ऐसी रट इस टोली ने लगा रखी है। हाथ में केंद्रीय सत्ता, जांच एजेंसियों व न्याय व्यवस्था की डोर होने के कारण तमाम दबाव का इस्तेमाल करके अतिरिक्त उम्मीदवार खड़ा करना व जीतना, ऐसा खेल चल रहा है। आईपीएल मुकाबले में जिस तरह से गुजरात की टीम को जिताकर लाए (ऐसा भाजपा के ही डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी कहते हैं), इसी तरह घपला करके भाजपा ये चुनाव जीतना चाहती है। राज्यसभा चुनाव में महाविकास आघाड़ी के मत ‘दिल्ली’ के तंत्र का इस्तेमाल करके आउट करने की कलाबाजी भाजपा ने दिखा ही दी है। परंतु अनिल देशमुख, नवाब मलिक विधानसभा के इन सदस्यों को मतदान का अधिकार न मिले, इसके लिए परदे के पीछे से करामात की ही गई। नवाब मलिक व देशमुख को राज्यसभा में मतदान का अधिकार न्यायालय ने नकार दिया। अब विधान परिषद चुनाव में भी इन दो विधानसभा सदस्यों के मतदान का अधिकार नकार दिया है। यह संविधान के किस अनुच्छेद में बैठता है? मलिक व देशमुख को फर्जी ढंग से आरोपी बनाया गया व केंद्रीय जांच एजेंसियों ने उन्हें गिरफ्तार किया। उनके खिलाफ आरोप साबित होने हैं और प्रत्यक्ष मुकदमा भी शुरू नहीं हुआ है। किसी भी न्यायालय ने उन्हें अपराधी ठहराकर कोई भी सजा नहीं सुनाई है। उनकी विधायकी अभी तक सुरक्षित होने के बावजूद मतदान का अधिकार नकारना, यह संविधान की, लोकतंत्र की हत्या है। धारा ३०२ के तहत हत्या के आरोपवाले, दंडनीय अपराध सिद्ध हो चुके कैदियों को भी जेल से मतदान के अधिकार का कानून अधिनियम १९५१ के तहत है। मलिक, देशमुख को पुलिस की सुरक्षा में विधान भवन में एक घंटे के लिए लाकर मतदान करवाया जा सकता था। परंतु देशमुख, मलिक विधान भवन से भूमिगत हो जाएंगे अथवा भाग जाएंगे, ऐसा भय ‘ईडी’ को लगा होगा। यह मूर्खता ही है! जेल में विशेष व्यवस्था करके इन दोनों के मतदान का इंतजाम किया जा सकता था। लोगों द्वारा निर्वाचित व संविधान के तहत शपथ लेनेवाले दो विधानसभा सदस्यों के अधिकारों की अवहेलना की गई। ‘ईडी’ ने विरोध किया इसलिए यह अधिकार नकारा होगा तो ‘ईडी’ मतलब सर्वोच्च न्यायालय नहीं। मतदान करना दोनों विधायकों का अधिकार ही है! यह महाराष्ट्र में विधानसभा के सदस्यों को मतदान के लिए एक घंटे की राहत भी नहीं, और वहां हत्या, महिलाओं के यौन शोषण, ऐसे आरोपोंवाले बाबा राम-रहीम को न्यायालय ने एक महीने की विशेष छुट्टी दी। इससे पहले पंजाब चुनाव के दरम्यान भी बाबा राम रहीम एक महीने की छुट्टी लेकर बाहर निकला था। बाबा राम रहीम को हरियाणा उच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, फिर भी उसे सहूलियत पर सहूलियत और राहत मिल रही है। उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या करनेवाले केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के पुत्र को भी कोर्ट ने जमानत दी और चुनाव खत्म होते ही फिर अंदर ले गए। परंतु महाराष्ट्र के दो विधायकों को उनके मतदान के अधिकार का उपयोग करने के लिए एक घंटे की जमानत न मिले, इसके जैसा अन्याय नहीं होगा। राजनीतिक जोड़-तोड़ के लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग हो ही रहा है परंतु न्यायालय अपना विवेक खो देगा तो क्या होगा! नवाब मलिक व अनिल देशमुख को मतदान का अधिकार नकारना अर्थात दूसरे पक्ष को राजनीतिक राहत ऐसा यह गणित है। राजनीतिक विरोधियों के वोट निरस्त करना अथवा मतदान करने से रोकना और इसके लिए केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल करना, इसमें कैसी  मर्दानगी है? राज्यसभा चुनाव में खुले तरीके से मतदान होता है, उसी तरह विधान परिषद में भी होना चाहिए। परंतु खुले मतदान का नियम सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के लिए है। निर्दलीय वगैरह जो हैं, वे स्वतंत्र ही होते हैं और चुनाव का केंद्रबिंदु यही निर्दलीय साबित होते हैं। इसमें निर्दलीय विधायकों का दोष है, ऐसा नहीं है। हमारा लोकतंत्र सबसे बड़ा, मजबूत वगैरह है ही, परंतु लोकतंत्र को मालिक मिल जाए तो वह लोकतंत्र खुद ब खुद तानाशाही में रूपांतरित हो जाता है और मालिक की जीत के लिए तमाम सरकारी ‘तंत्र’ काम में जुट जाते हैं। चुनाव आयोग, न्यायालय का भी निष्पक्ष होने की भूमिका से मोहभंग हो जाता है। नवाब मलिक, अनिल देशमुख प्रकरण में यह दिखाई दिया। प्रधानमंत्री मोदी संत तुकाराम के देहू गांव में अवतरित हुए और संतों की पगड़ी पहनकर बोले, ‘भेदभाव नहीं चाहिए’, परंतु भेदभाव उनके ही समय में चरम पर पहुंच गया है। मलिक, देशमुख को मतदान की अनुमति नहीं है। यह भेदभाव की ही राजनीति है। परंतु उसी समय लक्ष्मण जगताप, मुक्ता तिलक इन दो बीमार विधायकों को बेहद नाजुक स्थिति में मतदान के लिए उठाकर लाया जाता है। ये दोनों विधायक कैंसर से जूझ रहे हैं, उनकी सांस वेंटिलेटर पर है, ऐसा कहा जा रहा है। परंतु राजनीतिक स्वार्थ होगा तो मानवता को रौंदकर उन्हें स्ट्रेचर व व्हील चेयर पर मतदान के लिए लाया जाता है। विजय अथवा चमत्कार का इतना ही विश्वास होने के बावजूद यह अमानवीय, अघोरी प्रयोग किसलिए? परंतु राजनीतिक लाभ के लिए भाजपा किसी भी अमानवीय स्तर तक गिर सकती है, इसी का नाम चमत्कार है!

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