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संपादकीय : विधानमंडल के ‘खोके हराम’!

महाराष्ट्र में गुरुवार को विधानसभा का समापन हो गया। यह मानसून सत्र था। राज्य में इस बार बारिश भी मूसलाधार हुई है। लेकिन विपक्ष द्वारा मांग करने के बाद भी सरकार गीला अकाल घोषित करने को तैयार नहीं है क्योंकि यहां सब सत्ताभोगी हैं। जनहित के मामले में उनकी अक्ल को अकाल पड़ गया है। इस अक्ल का अकाल आखिरी दो दिन सदन से विधान भवन की सीढ़ियों पर आया। इससे खोके छाप शिंदे गुट का असली चेहरा सामने आ गया। पहले प्रभावशाली लोगों को रावसाहेब, रावबहादुर वगैरह उपाधियां दी जाती थीं। लेकिन शिंदे गुट के लोगों के सामने यानी चुराए हुए विधायक आदि मंडली है। उनके उपनाम के आगे अब वंश परंपरा अनुसार ‘खोकेवाले’ उपाधि ही लगेगी। बेहद सहज और सरल भाषा में इस विषय को समझाना हो तो ‘दीवार’ फिल्म के अमिताभ बच्चन के हाथ पर उकेरा गया था कि ‘मेरा बाप चोर है’, इसी तरह उन चोरों की अगली पीढ़ी के ललाट पर उकेरा जाएगा, ‘मेरा बाप, भाई, दादा खोकेवाला था! और उसने महाराष्ट्र और बालासाहेब ठाकरे के साथ गद्दारी की!’ इस मुहर को मिटाना मुश्किल है। इस टीस के मन में चुभने की वजह से दो दिनों से शिंदे गुट के विधायक सदन छोड़कर विधानसभा की सीढ़ियों पर बैठे और हम ‘खोके’वाले नहीं हैं। हमें खोकेवाला मत बोलो। यह बताने का व्यक्तिगत प्रयास करते रहे। अमरावती के दो विधायकों में तो खोके मामले को लेकर ठन गई। रवि राणा बनाम बच्चू कडू के बीच हुई नोक-झोंक से चोर कौन और खोकेवाला कौन इसका पर्दाफाश हो गया। रवि राणा महोदय ने बच्चू कडू के गांव जाकर उन पर हमला बोला। उन्होंने कहा, ‘जहां पैसा वहां बच्चू कडू। बच्चू के लिए बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रुपइया!’ रवि राणा ने कहा, ‘मैं गुवाहाटी जाकर सौदेबाजी करनेवाला विधायक नहीं हूं।’ रवि राणा सत्तापक्ष और देवेंद्र फडणवीस के अंदरूनी गुट के विधायक हैं। वे रोज उठकर हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। इससे उन्हें सत्य बोलने की प्रेरणा और बल मिलता होगा। हालांकि रवि राणा ने हनुमान चालीसा का जो आंदोलन शुरू किया, उससे महाराष्ट्र के खोकेवाले कौरवों के प्रति उनके मन में रोष निर्माण हुआ होगा। राणा ने मन में सत्य का पक्ष लेकर बच्चू कडू खोखेवाला पर जो हमला किया, उसके पीछे उनके वरिष्ठों की ही प्रेरणा होगी। महाराष्ट्र की जितनी बदनामी इस खोके मामले ने की, उतनी आज तक किसी ने नहीं की होगी। शिंदे गुट के सभी कड़वे, खट्टे, मीठे, तीखे, कसैले लोग खोके के चक्कर में पड़ गए। लेकिन नाम महाराष्ट्र का बदनाम हुआ। मानसून सत्र के आखिरी दिन खोकेवाले विधायक फिर विधानसभा की सीढ़ियों पर बैठ गए। उन्होंने शरीर पर अजब-गजब पोस्टर वाले कपड़े पहनकर होली जैसा स्वांग रचाया। उनका आचरण व हाव-भाव बेहद विचित्र और परेशान करनेवाला था। केवल पीठ पीछे पूंछ लगाकर बंदरों जैसी उछल-कूद करना ही बाकी रह गया था। हम अब सत्ताधारी बेंच पर हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री के ‘खोका’ पार्टी के माननीय सदस्य हैं। सत्ताधारी बेंच पर बैठकर आपको जनहित और राज्य के कल्याण के कार्यों को आगे बढ़ाना है। यह सही मायने में उन्हें ध्यान रखना चाहिए था, लेकिन यह मंडली यह भी भूल जाए, यह उनके चरित्र के अनुरूप है। विधानमंडल की सीढ़ियों पर बैठे खोखा विधायकों का ये अजीब व्यवहार मुख्यमंत्री खुद देख रहे थे और उन्होंने इन विधायकों के भले के लिए चार शब्द भी नहीं कहे। क्योंकि कुएं में ही नहीं होगा तो रहट में कहां से आएगा? यही सवाल है। उन खोका विधायकों के बंदरों वाले खेल को देखते हुए मुख्यमंत्री खड़े थे और खोकावालों की कहानी सफल हो गई। महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या बढ़ रही है। बारिश से राज्य में हाहाकार मचा हुआ है। दही-हंडी के खोकेवाले पुरस्कृत खेल से कई गोविंदाओं की मृत्यु हो गई है। लेकिन सत्तापक्ष के ‘खोकेवाले गोविंदा’ विधानसभा की सीढ़ियों पर बैठकर झगड़ा करते रहे। महाराष्ट्र की प्रतिष्ठा और स्वाभिमान इस तरह से धूमिल हुआ। राज्य की सड़कों पर आज केवल गड्ढे हैं। उन गड्ढों में रास्ता कब बनेगा? मुख्यमंत्री कहते हैं, सभी सड़कें सीमेंट की बनाएंगे। बनाएंगे तब बनाएंगे। लेकिन इस समय महाराष्ट्र गड्ढे में और विधायक खोके में फंसे हुए हैं। महाराष्ट्र और बाहर जहां भी जाओ, वहां लोग खोकेवालों के नाम से चिल्ला रहे हैं। दिल्ली में मुख्यमंत्री केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री सिसोदिया ने सार्वजनिक तौर पर कहा, ‘महाराष्ट्र के खोके के फॉर्मूले का उपयोग करके ‘आप’ के विधायकों को खरीदने का प्रयास शुरू हो गया है। यानी महाराष्ट्र के विधान भवन की सीढ़ियों पर बैठे खोके वालों का उद्धार हो गया। बिहार में राजद-जदयू खुलेआम कह रहे हैं, ‘महाराष्ट्र में जो खोकेवाली राजनीति हुई, वो बिहार में फेल हो गई!’ सीढ़ियों पर के खोकेवाले इसे अच्छी तरह से समझ लें। हर तरफ खोकेवालों का ही शोर है। गद्दारी का दूसरा नाम खोकेवाला पड़ गया है। इसे महाराष्ट्र पर लगा कलंक ही कहा जाएगा। दुनिया के छोर पर ‘बोको हरम’ नाम का एक बदनाम संगठन है। उसी तर्ज पर महाराष्ट्र में ‘खोके हराम’ नामक संगठन का उदय हुआ है। उसमें बोके भी हैं और खोके भी हैं। हरामखोरी ही उनका धर्म है। ‘खोके हरामों’ का अस्तित्व ज्यादा समय तक नहीं रहेगा, यह एकदम तय है!

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