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संपादकीय : कृष्ण की जरूरत है!

हमारे देश में हमेशा ही महिलाओं के सशक्तीकरण, महिलाओं के सक्षमीकरण आदि का राग अलापा जाता है; महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए नए-नए कानून भी लाए जाते हैं, लेकिन स्त्रियोेंं पर होनेवाले अत्याचार की घटनाएं नहीं रुकतीं। देश में आए दिन कहीं न कहीं औरतों को बेआबरू किए जाने की घटनाएं हो रही हैं और सरकार ही नहीं बल्कि समाज भी इन घटनाओं को निर्लिप्त भाव से देख रहा है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने महिला उत्पीड़न के एक मामले में ठीक इसी पर उंगली उठाई है। कर्नाटक के बेलगांव में महिला उत्पीड़न मामले पर संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने यह कहते हुए कि ‘यह संसार दुर्योधनों और दु:शासनों का है’, अपना क्षोभ व्यक्त किया, जो गलत नहीं है। बेलगांव में एक युवती अपनी सगाई के दिन परिवार द्वारा तय की गई शादी को तोड़कर अपने ही गांव के प्रेमी के साथ चली गई। इससे नाराज होकर युवती के परिजनों ने संबंधित युवक के घर जाकर उसकी मां की बुरी तरह पिटाई की। महिला को घर से बाहर खींचकर उसे निर्वस्त्र कर नग्न अवस्था में घुमाया गया और उसी हालत में महिला को करीब २ घंटे तक एक बिजली के खंभे से बांधकर रखा गया। जब मानवता को कलंकित करनेवाली यह घटना घट रही थी, तब न तो पुलिस वहां पहुंची और न ही पास-पड़ोस या सड़क पर मौजूद किसी व्यक्ति ने इस विकृत कुकृत्य को रोकने की कोशिश की। यह संतापजनक घटना मीडिया के जरिए सामने आने के बाद हाई कोर्ट ने घटना को गंभीरता से लिया और स्थानीय पुलिस तंत्र को कड़े शब्दों में फटकार लगाई। जस्टिस प्रसन्न वराले और जस्टिस कृष्णा दीक्षित की खंडपीठ ने प्रशासन के साथ-साथ समाज को भी फटकार लगाई। ‘प्राचीन काल में जब द्रौपदी का वस्त्रहरण हो रहा था तब उसकी लाज बचाने के लिए भगवान कृष्ण दौड़कर आए थे; लेकिन इस आधुनिक युग में जब इतना भयानक अत्याचार हो रहा था तब इस महिला की मदद के लिए कोई भी नहीं आया। दुर्भाग्य से यह संसार दुर्योधन और दु:शासन का है!’ ऐसे कड़े शब्दों में जस्टिस ने अपनी नाराजगी जाहिर की। बेशक, यह घटना भले ही कर्नाटक की हो, लेकिन देश के कई राज्यों में ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं। कुछ महीने पहले मणिपुर में भी दो महिलाओं का निर्वस्त्र जुलूस निकालकर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। किसी प्रकार के नस्लीय उन्माद से विक्षिप्त भीड़ महिलाओं के कपड़े फाड़ देती है… उन्हें नग्न कर पूरे शहर में घुमाया जाता है… भीड़ में से कुछ लोग इसका वीडियो भी बना लेते हैं और ८० दिनों तक इस बात की खबर किसी तक नहीं पहुंचती। सरकार और प्रशासन को सब कुछ पता होने पर भी वे मुंह में दही जमा कर चुप बैठ जाते हैं। मामले को दबाने की कोशिश की जाती है; लेकिन सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद सरकार की कलई खुलती है, फिर भी प्रशासन कोई कार्रवाई नहीं करता। आखिरकार, सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ता है। ‘अगर आप कार्रवाई नहीं करेंगे तो हम कार्रवाई करेंगे!’ सुप्रीम कोर्ट की ऐसी कड़ी डांट-फटकार के बाद आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। यदि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस व ऐसी घटनाओं के चलते यह रोष व्यक्त किया है कि आज का युग दुर्योधन और दु:शासन का है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हाल ही में महाराष्ट्र के बीड स्थित वालुंज गांव में भी जमीन विवाद के चलते एक महिला को निर्वस्त्र कर दिया गया। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, प. बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश में भी महिलाओं को निर्वस्त्र करने की घटनाएं होती रहती हैं। हालांकि, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने महिला के वस्त्रहरण को लेकर स्थानीय पुलिस और समुदाय के कान खींचे हैं, लेकिन आए दिन न केवल महिलाओं की गरिमा, बल्कि देश के लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थानों और पदों का भी वस्त्रहरण हो रहा है। सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाजों को जेलों में ठूंसा जा रहा है। जुल्म सहती पीड़ित महिलाओं और देश के लोकतंत्र की स्थिति एक समान हो गई है। महाभारत में द्रौपदी की करुण पुकार पर कृष्ण ने दौड़कर उसकी लाज बचाई थी। आज हमारे देश में लोकतंत्र, स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार भी अपनी लाज बचाने के लिए पुकार रहे हैं। आज भी देश को एक कृष्ण की जरूरत है!

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