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संपादकीय : मुट्ठीभरों की जाए, …प्रजा की सत्ता आए!

देश का ७४वां गणतंत्र दिवस आज हर जगह मनाया जाएगा। स्कूलों, सरकारी दफ्तरों इत्यादि स्थानों पर गणतंत्र दिवस का उत्साह जरूर उमड़ता नजर आएगा, लेकिन जिस वजह से यह गणतंत्र दिवस मनाया जाता है, क्या सच में आम जनता, किसानों, गरीब खेतिहर मजदूरों, श्रमिकों, बेरोजगार युवाओं को लगता है कि यह प्रजा की सत्ता है? क्या गणतंत्र दिवस समारोह की खुशी गांव, कस्बों और बस्तियों में गरीब जनता के चेहरों पर दिखाई दे रही है? हिंदुस्थान लोकतांत्रिक देश है और यहां प्रजा की सत्ता है, ऐसा वचन देश की जनता को देकर इस दिन यानी २६ जनवरी १९५० को हमने संविधान को अपनाया था। तब से लेकर अब तक हमने ७३ गणतंत्र दिवस मनाए हैं। हर साल महामहिम राष्ट्रपति दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराकर देश को संबोधित करते हैं। ‘रिपब्लिक डे’ परेड होती है, विभिन्न राज्यों के सांस्कृतिक दर्शन करानेवाली झांकियों की दौड़, सेना के जवानों के हैरतअंगेज करतब देखने को मिलते हैं। ये सारे उत्सव हम वर्षों से देखते आ रहे हैं। हर साल की तरह आज के ७४वें गणतंत्र दिवस पर भी लाल किले पर राष्ट्रपति का भाषण और अन्य सरकारी कार्यक्रम होंगे, लेकिन जिस जनता का गणतंत्र है, उस आम जनता के जीने-मरने के असंख्य मसले हैं। क्या उसका उत्तर इससे मिलेगा? ये मसले यदि ७४वें गणतंत्र दिवस तक कायम रहेंगे या इन मसलों का प्रकोप और बढ़ रहा है तो हमारे देश में सचमुच प्रजा की सत्ता अस्तित्व में है, यह कैसे कहा जा सकता है? पिछले ७० वर्षों में देश में निश्चित रूप से कई अच्छे बदलाव हुए हैं। हरित क्रांति आई, औद्योगिक क्रांति आई, वैज्ञानिक क्रांति का लाभ और आधुनिकीकरण जैसे बदलाव जरूर हुए। हालांकि, इन परिवर्तनों से सबसे अधिक लाभ किसको हुआ? केवल मुंबई, दिल्ली, बंगलुरु, कोलकाता में ऊंचे टावर और चमक-धमक का मतलब हिंदुस्थान नहीं है! इन महानगरों के बाहर जो खंडप्राय देश पैâला हुआ है, वहां की जनता का क्या? देश के अमीर और अधिक धनवान होते जा रहे हैं तथा गरीब और निर्धन! क्या इस विषमता की व्यवस्था को लोकतांत्रिक देश कहा जाए? संविधान रचयिता क्या ऐसा गणतंत्र चाहते थे, यह प्रश्न राजनीतिज्ञों को स्वयं के मन से पूछना चाहिए। वैश्विक गरीबी उन्मूलन के लिए काम करने वाली संस्था ‘ऑक्सकॉम इंटरनेशनल’ ने हाल में एक रिपोर्ट जारी की है। ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट: द इंडिया स्टोरी’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में हिंदुस्थान की आर्थिक विषमता की हकीकत पेश की गई है, जो चौंकानेवाली है। देश के अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को उजागर करते हुए रिपोर्ट कहती है कि हिंदुस्थान के केवल २१ अमीर अरबपतियों के पास इस समय देश के ७० करोड़ लोगों से ज्यादा संपत्ति है। एक तरफ हिंदुस्थान का युवा वर्ग बेरोजगारी से ग्रसित है। नौकरी के लिए इधर-उधर भटक रहा है। खेती का खर्च और उपज की कीमतों के बीच कोई मेल न होने से किसान आत्महत्या कर रहा है और दूसरी तरफ अरबपतियों की संपत्ति में प्रतिदिन साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हो रही है। संविधान अपनाया गया, इसके उपलक्ष्य में हम इस दिन गणतंत्र दिवस मनाते हैं। इस संविधान के तहत यह देश चलेगा, ऐसा वचन देकर हमने संविधान को स्वीकार किया लेकिन क्या आज देश में संविधान के तहत एक भी काम हो रहा है? संविधान द्वारा न्यायपालिका, चुनाव आयोग, रिजर्व बैंक जैसी संस्थाओं को दी गई स्वायत्तता वर्तमान सरकार को मंजूर नहीं है। हर जगह थाली के नीचे बिल्लियां चाहिए और सरकारी आदेशों को ‘हां’ कहने वाले लोग चाहिए, ऐसी तानाशाही मानसिकता वाले लोगों के हाथों में आज देश का गणतंत्र आ गया है। असंवैधानिक गतिविधियों से विपक्षी दलों की सरकारों को गिराया जाता है, असंवैधानिक सरकारें लाई जाती हैं। पक्षपातपूर्ण निर्णय लेकर एक राज्य से उद्योगों को दूसरे राज्य में ले जाया जाता है। क्या इस तानाशाही को ही गणतंत्र कहा जाए? गिने-चुने लोग मस्त और अधिकांश जनता भूखी, ऐसी भयावह तस्वीर ७४वें गणतंत्र दिवस पर दिखाई दे रही है इसलिए भविष्य में बदलाव लाना ही होगा। मुट्ठीभर लोगों के लिए काम करने वाली सरकार को उखाड़-फेंककर असली जनता का राज लाने के लिए देश की प्रजा को ही अब एकता दिखानी होगी। यदि हम संविधान रचयिताओं की अपेक्षा के अनुरूप गणतंत्र दिवस को ‘चिरायु’ रखना चाहते हैं, तो मुट्ठीभर लोगों की सत्ता जाए और प्रजा की सत्ता आए, ये मौजूदा शासकों को दृढ़ता के साथ बताना ही होगा!

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