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संपादकीय : प्रकाशमय फैसलापत्र! सब कुछ गैरकानूनी!!

वर्तमान केंद्र सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। इस पर मुंबई के विशेष न्यायालय ने भी मुहर लगा दी है। गोरेगांव में पत्राचाल पुनर्विकास परियोजना के घोटाले का आरोप लगाकर शिवसेना नेता व सांसद संजय राऊत की ‘ईडी’ द्वारा की गई गिरफ्तारी को विशेष न्यायालय के न्यायाधीश एम.जी. देशपांडे ने गैरकानूनी ठहराया है। हमारे देश में एक वरिष्ठ संसद सदस्य को गैरकानूनी तरीके से गिरफ्तार कर १०० दिनों तक जेल में डाला जाता है तो कानून और न्याय का राज देश में नहीं है। मानव अधिकारों का, स्वतंत्रता का ये सीधा हनन है। विश्व के कई देशों में तानाशाह विरोधियों को बंदूक की जोर पर खत्म करते हैं। कोई भी मुकदमा बिना चलाए जेल में डालते हैं और फांसी पर लटकाते हैं। हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था ने ये काम ‘ईडी’ नामक संस्था को सौंपा है। न्यायाधीश देशपांडे ने संजय राऊत और प्रवीण राऊत मामले में इस व्यवस्था की पोल खोल दी है। पत्राचाल मामले में घोटाला हुआ और उसमें लगभग पचास लाख रुपए की राशि राऊत के खाते में जमा हुई। ये सभी पैसे प्रवीण राऊत के पास से मिले, ऐसा आरोप लगाते हुए पचास लाख के इस मामले में ‘ईडी’ ने मनी लॉन्ड्रिंग ठहराते हुए पहले प्रवीण राऊत को गिरफ्तार किया। इसके बाद संजय राऊत के घर छापा मारकर उन्हें गिरफ्तार किया। १०० दिन जेल में डाल दिया। सरकार ने किसी नागरिक के खिलाफ कार्रवाई की है तो उसे कानून का सहारा मिलना चाहिए, ऐसा ब्रिटिश शासनकाल में भी कोर्ट देखता था। लोगों की स्थानबद्धता या बोलने की आजादी, मुद्रण स्वतंत्रता जैसी अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लगानेवाले मामलों को भी उन दिनों कोर्ट संज्ञान में लेता था। आज कानून कमजोर और न्याय व्यवस्था के दबाव में दिखाई दे रहा है। ऐसे में एक न्यायाधीश द्वारा निडर होकर ‘न्यायदान’ करने के मामले को दुर्लभ ही कहा जाएगा। देश के मुख्य न्यायाधीश उदय ललित अपने सेवानिवृत्ति के दिन न्याय मंदिर की सीढ़ियों पर नतमस्तक हुए। उनके लिए वह मंदिर ही है। लेकिन इस श्रद्धा को आज कितने न्यायाधीश मान रहे हैं? संजय राऊत को जांच से पहले ही फांसी पर लटकाने का प्रयास हुआ और ऐसी फांसी की डोरी वर्तमान में सिर्फ राजनीतिक विरोधियों के लिए ही मोड़ी जा रही है। महाराष्ट्र के ईडी के कई मामले इसके गवाह हैं। राज्य के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख और उनके सहयोगी एक वर्ष से ज्यादा समय से जेल में हैं। ये सभी मामले यानी राजनीतिक कपट की साजिश हैं। १०० करोड़ की वसूली मुंबई-ठाणे के बार मालिकों से करने का निर्देश क्या गृहमंत्री एक फौजदार स्तर के पुलिस अधिकारी को दे सकता है? लेकिन जो अधिकारी खुद मुकेश अंबानी के घर के सामने विस्फोटक रखने के अपराध का आरोपी है, जिसने इस मामले के सबूत नष्ट करने के लिए अपने मित्र की हत्या करवाई, उसकी गवाही के आधार पर देशमुख के खिलाफ मुकदमा ईडी और सीबीआई ने खड़ा किया। हाईकोर्ट ने लगभग एक वर्ष में देशमुख की जमानत मंजूर करते हुए कहा कि फौजदार सचिन वझे की गवाही पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन सीबीआई के सत्र न्यायालय ने उसी गवाह पर भरोसा करते हुए देशमुख की जमानत नामंजूर कर दी। यह हमारी न्याय व्यवस्था की गड़बड़ी है या दबाव? पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र सहित देशभर में ऐसे कई फर्जी मुकदमे केंद्र की जांच एजेंसियों ने खड़े किए और बेगुनाह लोगों को जेल में सड़ा दिया। सबूत नहीं तो मुकदमे भी नहीं चलते। लेकिन विशेष न्यायालय तारीख पर तारीख दे रहा है। इन सभी को भेदनेवाला निर्णय न्या. एम.जी. देशपांडे की विशेष अदालत ने दिया। ‘किसी को तय करके ‘टारगेट’ या ‘गिरफ्तार’ करने का काम ईडी कर रही है। प्रवीण राऊत का मामला दीवानी स्तर का है। लेकिन उसे मनी लॉन्ड्रिंग का रूप दे दिया और संजय राऊत को बेवजह गिरफ्तार कर लिया।’ इस मामले के मुख्य आरोपियों को ‘ईडी’ ने गिरफ्तार नहीं किया। यानी ईडी ने खुद आरोपी का चयन करके गिरफ्तार किया। न्यायालय का यह निरीक्षण कइयों के मुखौटे फाड़ने वाला है। विरोधियों को फंसाने के लिए केंद्र की भाजपा सरकार ‘ईडी’, सीबीआई का दुरुपयोग कर रही है। ऐसे किसी भी एजेंसी की नोटिस विपक्षी दल के नेताओं को ही क्यों दी जाती है और उन्हें ही क्यों गिरफ्तार किया जाता है? ऐसा सवाल झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पूछा है। प. बंगाल की मुख्यमंत्री भी वही कहती हैं और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव का भी यही कहना है। खुलासा हुआ है कि रांची में छापेमारी के लिए ईडी ने भाजपा के स्वामित्ववाली गाड़ियों का उपयोग किया। महाराष्ट्र में शिवसेना को तोड़ने के लिए, सरकार गिराने के लिए ‘ईडी’ का इस्तेमाल हुआ। ‘ईडी’ जिन्हें पहले गिरफ्तार करनेवाली थी, उनके शिवसेना छोड़ते ही उन्हें क्लीन चिट दे दी गई और जो शिंदे-फडणवीस के सामने नहीं झुके, वे ‘ईडी-सीबीआई’ के अपराधी साबित हुए। देश में कानून का राज नहीं है। न्यायतंत्र पर दबाव है और केंद्रीय एजेंसियां गुलाम बन गई हैं। संजय राऊत के मामले में इसका खुलासा हो गया। विशेष न्यायालय ने यह सब स्पष्टता के साथ सामने लाया। मुंबई-महाराष्ट्र के भाजपा के कम-से-कम ७ मंत्री, १५ विधायक-सांसद, भाजपा को आर्थिक मदद पहुंचानेवाले बिल्डर ‘मनी लॉन्ड्रिंग’ मामले में अंदर जाएंगे, ऐसे अपराध उनके नाम पर हैं। लेकिन ‘ईडी’ खुद आरोपी को चुनती है, न्यायालय का ऐसा कहना, ऐसे समय में सच साबित होता है। विशेष न्यायालय के निडर न्यायाधीश एम.जी. देशपांडे का फैसला ऐतिहासिक और मार्गदर्शक है। न्या. देशपांडे का फैसलापत्र व निरीक्षण तेजस्वी प्रकाश की किरणों जैसा है। वर्तमान न्याय व्यवस्था के अंधकार को दूर करनेवाले फैसले का स्वागत पूरे देश में इसी वजह से हुआ। जेल में अर्से से बंद कइयों को इसके कारण रोशनी दिखाई देगी, ऐसी उम्मीद करते हैं।

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