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संपादकीय : इतिहास को लेकर नया विवाद!

इतिहास को मसलते न बैठिए, नया इतिहास रचिए, ऐसा संदेश शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे हमेशा देते आए। महाराष्ट्र में इस समय इतिहास को लेकर जो निरर्थक वाद-विवाद छिड़ा हुआ है, इसमें शिवसेनाप्रमुख के ये विचार मार्गदर्शक हैं। ‘हर हर महादेव’ एक मराठी फिल्म स्क्रीन पर आई है। इस फिल्म में इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। छत्रपति शिवराय के इतिहास के बारे में गलत जानकारी दी गई है, ऐसी आपत्ति उठाई जा रही है। महाराष्ट्र की कई राजनीतिक पार्टियों, संगठनों ने इस फिल्म का विरोध किया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विधायक जितेंद्र आव्हाड ने सिनेमा हॉल में घुसकर आंदोलन किया, जिसके चलते उनकी गिरफ्तारी और रिहाई हुई। छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस मिट्टी में जन्म लिया इसीलिए महाराष्ट्र का इतिहास है और अन्य राज्यों का केवल भूगोल है। इस इतिहास में किसी भी प्रकार की जोड़-तोड़ नहीं होनी चाहिए। लेकिन जिस तरह से तोड़-मरोड़ होने की आपत्ति ‘हर हर महादेव’ फिल्म को लेकर जताई गई, वैसी इससे पहले भी कई फिल्मों को लेकर जताई जा चुकी है। कुछ लोगों ने ‘तानाजी’ फिल्म के कुछ दृश्यों को सामने लाया। इस बीच एक फिल्म में सीमा पार झंडा लहरानेवाले बाजीराव पेशवा को ‘बॉलीवुड’ सरीखा नाचते हुए दिखाया गया था और उस पर भी आपत्ति जताई गई थी। झांसी की रानी पर बनी फिल्म के कुछ दृश्य आपत्तिजनक होने के कारण करणी सेना ने चुनौती दी थी। पृथ्वीराज चौहान पर बनी फिल्म पर भी आपत्ति जताते हुए इतिहास पर वाद-विवाद छिड़ गया था। अब कुछ मराठी ऐतिहासिक फिल्मों में दिखाए गए दृश्यों को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। महाराष्ट्र के दो ही देवता हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर। दोनों देवताओं को महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरा देश पूजता है। इन देवताओं की छवि और श्रद्धा को किसी ने ठेस पहुंचाई तो महाराष्ट्र उबल उठता है। आज भी इतिहास को विकृत करनेवालों के खिलाफ राज्य का माहौल गरमाया हुआ है। ‘हर हर महादेव’ नामक फिल्म में इतिहास को विकृत करना यानी छत्रपति शिवराय के इतिहास को गलत तरीके से पेश करने पर आपत्ति है। इस फिल्म के ऐतिहासिक प्रसंग कैसे गलत हैं, इस बारे में एक सूची ही जारी की गई है। बाजी प्रभू देशपांडे को छत्रपति शिवाजी महाराज से बड़ा दिखाने की कोशिश इस फिल्म में की गई है। ऐसे कई दृश्य फिल्म में हैं, जो कि इतिहास की विसंगति है। ‘पावनखिंड’ नामक एक फिल्म बीच में आई और गई। उस पर भी आपत्ति जताई गई थी। इसलिए पर्दे पर और रंगमंच पर ऐतिहासिक नाट्य लानेवालों के सामने बड़ा प्रश्नचिह्न निर्माण हो गया है। फिल्म और नाटकों के लिए एक सेंसर बोर्ड है। वह सभी तथ्यों की जांच करके फिल्म को प्रदर्शित करने की अनुमति देता है। उस सेंसर बोर्ड को भी ऐसे मामलों में आरोपी के पिंजरे में खड़ा किया जाता है। ऐसा नहीं है कि ये केवल इतिहास के मामले में ही होता है। सरकार बदलते ही श्रद्धास्थल बदल जाते हैं। उसी तरह इतिहास के संदर्भ भी बदल दिए जाते हैं। महात्मा गांधी पीछे हो जाते हैं और सरदार पटेल, सुभाषचंद्र बोस आगे आ जाते हैं। वीर सावरकर केवल नाम लेने तक ही सीमित रहते हैं। पंडित नेहरू तो कोई मायने ही नहीं रखते। क्योंकि नया इतिहास लिखा जाता है और वह सुविधानुसार लिखा जाता है। इस बीच कट्टर शिवसैनिक धर्मवीर आनंद दिघे पर एक फिल्म प्रदर्शित हुई, उसमें भी कई तथ्यों में साफतौर पर तोड़-मरोड़ की गई है। ऐसा अब बार-बार होने लगा है। बेशक छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस इतिहास का कलश रखा, उसमें जोड़-तोड़ ‘गल्लाभरू’ फिल्मों के लिए न किया जाए। छत्रपति शिवराय का जब जन्म हुआ, उस समय पूरा भारत वर्ष दावानल की तरह पैâलते जा रहे मुगलों की सत्ता के आगे कमजोर होता जा रहा था। उसी दौरान समुद्री सीमा से पुर्तगाली आदि यूरोपीय देश भारत को सत्ता प्रसार और धर्म प्रसार के जबड़े में पकड़कर मगर की तरह निगलना चाहते थे। ऐसे दोहरे संकट में फंसे भारत के लिए वह निराशाजनक दौर था। आम जनता के मन में भारत के पुनर्निर्माण की उम्मीदें जैसे धूमिल हो रही थीं। ऐसे समय में राष्ट्र के उद्धार के लिए छत्रपति शिवाजी महाराज खड़े हुए। भय और निराशा का जंजाल जनमानस से जला देनेवाले दिव्य और दाहक तेज मनुष्य के रूप में प्रकट हुए। यह इतिहास है और वह वैसा ही रहेगा। लेकिन इतिहास को लोकप्रिय करने का कार्य शाहीरों, कलाकारों, लेखकों, प्रवचनकारों, कीर्तनकारों, नाट्य व फिल्मों की मंडली ने किया। यह भी उतना ही सच है। इतिहास को लोकप्रिय तरीके से पेश करने की स्वतंत्रता कलाकार को होती है लेकिन इतिहास की विडंबना न हो, इसका खयाल रखना भी उतना ही जरूरी है। मूलरूप से पूरी दुनिया में इतिहास कठिन विषय है। वैसे यह भी होता रहा है कि यदि किसी शोधकर्ता ने एक संदर्भ रखा तो उसे गलत ठहराने के लिए दूसरा संदर्भ आगे लाया जाता है। इतिहास जस का तस कभी नहीं बन सकता। उसका स्वरूप और विवरण हमेशा बदलते रहता है। हालांकि छत्रपति शिवाजी महाराज के इतिहास में तोड़-मरोड़ करनेवाले अनाड़ी अक्षिक्षितों की मनमानी महाराष्ट्र बर्दाश्त नहीं करेगा। महाराष्ट्र में ‘जेम्स लेन’ का मामला इससे पहले हो चुका है, लेकिन इस मिट्टी में ऐसे कई देशी ‘जेम्स लेन’ पैदा हो गए हैं। उनके लिए इतिहास भले ही पेट पालने का धंधा बना होगा लेकिन महाराष्ट्र के लिए छत्रपति शिवराय आत्मा हैं। महाराष्ट्र की इस आत्मा को मत बेचो! बिना किसी सबूत के मनमाफिक ढेर सारे बेतुके और मूर्खतापूर्ण बयान देना, ऐसे महाराष्ट्र के तथाकथित ‘विद्वान’ शोधकर्ताओं के एक गुट का बहुत पुराना धंधा है। ऐसे शोधकर्ताओं को एक बोरे में भरकर हिंद महासागर में डुबा देना चाहिए, तभी इतिहास का तेज धधकता रहेगा!

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