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संपादकीय :पवार नहीं, फिर कौन?

हिंदुस्थान नामक विशाल देश का अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा, इस पर अब दोनों ओर मंथन शुरू हो गया है। अमेरिका, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका  जैसे देशों में राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया सामान्यत: डेढ़ से दो वर्ष पहले शुरू होती है और उस प्रक्रिया में गंभीरता होती है। हमारे देश में ऐसी गंभीरता आज कहीं दिख रही है क्या? राष्ट्रपति पद के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है। १८ जुलाई को देश के नए राष्ट्रपति के चुनाव के लिए मतदान होगा। देश के विपक्ष की बैठक बुधवार को दिल्ली में संपन्न हुई और राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा, इस पर पहली चर्चा हुई। शरद पवार ने राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव लड़ने की इच्छा नहीं है, उनके ऐसा खुद घोषित किए जाने से विपक्षी गठबंधन के गुब्बारे की हवा ही निकल गई। शरद पवार नहीं, तो दूसरा कौन? समकक्ष का कोई नेता विपक्षी गठबंधन का उम्मीदवार बन सकेगा क्या? इन सवालों का उत्तर अधर में छोड़कर ममता बनर्जी द्वारा आयोजित की गई बैठक खत्म हो गई। महात्मा गांधी के नवासे गोपालकृष्ण गांधी, डॉ. फारुख अब्दुल्ला इन सदाबहार नामों की चर्चा हुई। परंतु ये नाम मतलब विपक्षी आघाड़ी की शक्ति नहीं हैं। इन दोनों नामों के कारण राष्ट्रपति पद के चुनाव दिलचस्प होंगे, ऐसा उनका व्यक्तित्व नहीं है। अर्थात सत्ताधारी पार्टी भी राष्ट्रपति पद के लिए कोई चमकदार नाम ले आएगी, ऐसा दिख नहीं रहा है। पांच साल पहले रामनाथ कोविंद के नाम की लॉटरी निकाली गई और दो-तीन लोगों ने उनका नाम तय किया इसलिए कोविंद देश के महामहिम बन गए। इस बार भी उसी ढंग से देश का राष्ट्रपति चुना जाएगा। राष्ट्रपति तीनों सेनाओं के प्रमुख होते हैं। देश के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। न्याय व्यवस्था के प्रमुख होते हैं। इन जिम्मेदारियों को निभाकर उन्हें देश को दिशा दिखानी होती है। परंतु बीते कुछ समय से हमारे राष्ट्रपति अपनी मर्जी से करवट भी नहीं बदल सके हैं। अमेरिका, फ्रांस , दक्षिण अफ्रीका  के राष्ट्रपतियों की तरह हमारे राष्ट्रपति को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं है यह सत्य है। परंतु फिर भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जाकिर हुसैन, डॉ. अब्दुल कलाम, प्रणव मुखर्जी इतना ही क्या ज्ञानी जैल सिंह ने राष्ट्रपति के रूप में अपनी छाप छोड़ी। राजीव गांधी व ज्ञानी जैल सिंह के संबंध जैल सिंह के आखिरी समय में इतने बिगड़ गए थे कि जैल सिंह ने कुछ बिल रोककर रखा। विशेष अधिकार का इस्तेमाल करके जैल सिंह हमारी सरकार को बर्खास्त करेंगे इस डर से प्रधानमंत्री राजीव गांधी ग्रस्त थे। डॉ. कलाम जनता के राष्ट्रपति थे और प्रणव मुखर्जी अनुभवी, शानदार व्यक्तित्व थे। इसलिए ही राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन का घटक होने के बावजूद शिवसेना ने बेखौफ होकर प्रणव मुखर्जी को मतदान किया था। सरकारी पक्ष की ओर से अथवा विपक्ष की ओर से ऐसा प्रोत्साहित करनेवाला व्यक्तित्व राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में खड़ा होनेवाला है क्या? शरद पवार एकमात्र ऐसे नेता देश में हैं। उन्होंने राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी स्वीकार की तो इस चुनाव में कांटे की टक्कर होगी। चुनाव सिर्फ मजेदार नहीं होंगे, बल्कि सरकारी पक्ष के लिए भी ये चुनाव आसान नहीं होगा। इस चुनाव में देशभर से विधानसभा सदस्य, लोकसभा-राज्यसभा के सदस्य मतदान करते हैं। वर्तमान में इनमें से बहुत हद तक मतदान को मोड़ने की क्षमता रखनेवाले शरद पवार एकमात्र नेता हैं। डॉ. अब्दुल्ला, गोपालकृष्ण गांधी इस मामले में कमजोर साबित होंगे। इसलिए सर्वसम्मति के नाम पर विपक्षी गठबंधन को अनावश्यक उठापटक नहीं करनी चाहिए। सत्ताधारी पार्टी की ओर से इस चुनाव के लिए विपक्ष के कुछ लोगों को जाल में फंसाने  का प्रयास चल रहा है। इसका मतलब उनकी जीत का गणित पक्का नहीं है और विरोधियों के वोट हासिल करने के लिए उनका प्रयास चल रहा है। आंध्र के जगन मोहन रेड्डी, ओडिशा के नवीन पटनायक के वोट निर्णायक होंगे। विपक्षी गठबंधन समकक्ष उम्मीदवार खड़ा करेगा तो सरकारी पक्ष को भी अपने पसंदीदा रबर स्टैंप से किनारा करना होगा व यही महत्वपूर्ण है। राष्ट्रपति रबर स्टैंप अथवा शोभा बढ़ानेवाला पुतला नहीं है। देश की समस्याओं की जानकारी रखनेवाला लोगों से समरस रहनेवाला वह सेनापति है। संविधान, न्यायालय, मानवाधिकार पर हमले जारी रहने के दौरान वह चुप नहीं बैठ सकता है। उसे सामने आना ही होगा। राष्ट्रपति संविधान का रक्षक है। न्याय व्यवस्था का न्यासी है। देश जिन चार स्तंभों पर खड़ा है, उन स्तंभों का संरक्षक है। आज ये स्तंभ ढहते हुए दिख रहे हैं। संसद, मीडिया, न्याय व्यवस्था व प्रशासन सत्ताधारियों के समक्ष घुटनों के बल बैठा है। देश में धार्मिक उन्माद बढ़ाया जा रहा है। ऐसे समय राष्ट्रपति चुप कैसे  बैठे रह सकते हैं? परंतु दुर्भाग्य से राष्ट्रपति इन सब पर कोई भूमिका नहीं लेते हैं। यह राष्ट्र की अखंडता के लिए घातक है। ये सब तस्वीर बदलनी होगी तो विपक्ष सर्वसम्मति के नाम पर लचर भूमिका नहीं अपना सकता है। विपक्ष के कई प्रमुख नेता मोदी अथवा एनडीए को सक्षम विकल्प देने की बात करते हैं। परंतु जब इन तमाम प्रक्रियाओं का नेतृत्व करने की बारी आती है तो उस समय वे आगे नहीं आते। ऐसा दृश्य बीते कुछ वर्षों में दिखाई दिया है। ऐसे समय में हर कोई अपना-अपना राज्य संभालने को प्राथमिकता देता है। ऐसा अब नहीं चलेगा। राष्ट्रपति पद के लिए शरद पवार नहीं कहते होंगे तो कौन? राष्ट्रपति पद के लिए आम सहमति के नाम पर कोई भी चलेगा, यह नहीं चलेगा। विरोधी यदि राष्ट्रपति पद के लिए आम सहमति का ‘सख्त’ उम्मीदवार खड़ा नहीं कर सकता होगा तो देश को सक्षम प्रधानमंत्री कैसे  देगा? ऐसा सवाल जनता के मन में उठ सकता है। कल विपक्ष का आंकड़ा जम गया तो प्रधानमंत्री पद के लिए कई दूल्हे कतार में खड़े हो जाएंगे, परंतु राष्ट्रपति पद नहीं चाहिए! फिर भी ममता बनर्जी कहती हैं उसके अनुसार राष्ट्रपति पद का चुनाव २०२४ की तैयारी है। विपक्ष को इसे गंभीरता से लेना ही होगा। सरकार की ओर से कोई भी खड़ा रहे विपक्षियों को गंभीरता से लड़ना होगा। पवार नहीं, तो फिर कौन? इस सवाल का जवाब छह महीने पहले ही ढूंढ़ा गया होता तो गंभीरता की झलक दिख गई होती। अब देर हो गई है, फिर भी वक्त बीता नहीं है।

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