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संपादकीय : एक गुट, बारह झमेले!

महाराष्ट्र के नसीब में जो दशा फिलहाल आई है उससे मार्ग कैसे निकाला जाए, इसी उधेड़बुन में फिलहाल मराठी जनता लगी है। ‘ईडी-पीडी’ बल का इस्तेमाल करके राज्य की गर्दन पर पीपल वाले ४० भूत बैठा दिए गए हैं। इसलिए सुबह उठकर देखें तो राज्य में एक नया झमेला हुआ नजर आता है। उनमें से एक भी झमेले से शिवसेना का संबंध नहीं है। ३८ दिनों बाद मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ और उसके बाद विभागों का बंटवारा भी रखड़ता रहा। लोगों द्वारा सवाल पूछे जाने की वजह से मजबूरन उन्हें विभागों के बंटवारे का एलान करना पड़ा। विभागों का बंटवारा भी एकदम विशिष्ट होने से शिंदे गुट में इसे लेकर किसी झमेले की चिंगारी न भड़के, तो आश्चर्यजनक ही होगा। नगर विकास का मालदार खाता छोड़ दें तो शिंदे गुट के हाथ में भाजपा ने कद्दू ही दिया है। सभी प्रमुख विभाग श्री फडणवीस और उनके ही लोगों की मुट्ठी में हैं इसलिए नाक पकड़कर ही ‘उन’ ५० लोगों को फडणवीस के पास जाना होगा, लेकिन खोखे के नीचे स्वाभिमान रौंदे जाने की वजह से वे सब ये सहन करेंगे! शिंदे के रूप में जो एक गुट तैयार हुआ है, उसमें से कुछ लोगों को मंत्री पद मिल गया है। इससे बचे हुए लोगों ने तुरंत नाराजगी व्यक्त करके मंत्री पद की इच्छा जाहिर की। शिंदे गुट के संभाजीनगर के विधायक शिरसाट ने खुलकर नाराजगी का इजहार किया। ‘मुझे कैबिनेट मंत्री पद और संभाजीनगर का पालकमंत्री पद चाहिए मतलब चाहिए!’ कल-परसों आए टोपी घुमानेवाले दीपक केसरकर को मंत्री पद मिलता है, फिर हमें क्यों नहीं? ऐसा शिरसाट कहते हैं। इस पर केसरकर ‘मुफ्त के माल’ का मालिक होने की तर्ज पर आश्वासन देते हैं, ‘शिरसाट को भी आगामी मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्रीपद अवश्य मिलेगा!’ केसरकर, सामंत जैसे कई अलग राजनीतिक विचारों वाले लोग कभी यहां तो कभी वहां और कहीं नहीं जमा तो शिंदे गुट के गुड़ में जाकर चिपक जाते हैं। इसकी वजह से गुट के शिरसाट-गोगावले जैसे निष्ठावानों के लिए मुश्किल हो गया, ऐसा ही कहा जा सकता है। शिरसाट इस झमेले से इतना बौखला गए कि उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर उद्धव ठाकरे ही परिवार प्रमुख होने का एलान कर दिया और बाद में उस पर सफाई देते हुए कहा कि यह हमारा टेक्निकल लोचा था। लेकिन शिरसाट ने शिंदे गुट के ५० लोगों की ‘व्यथा’ ही एक तरह से व्यक्त की। हर किसी को कुछ-न-कुछ तो मिलना ही चाहिए, ऐसी शिंदे गुट के सभी की अपेक्षा है। अब इन ५० लोगों को कुछ-न-कुछ चाहिए मतलब क्या? फूल  नहीं तो फूल की पंखुड़ी ही हमें मिलनी चाहिए, ऐसा वे कहते हैं। तो अब इसमें से फूल किसे? पंखुड़ी किसको और बचे हुए कांटे किसे मिलेंगे? यह सवाल ही है। इन ५० लोगों को ‘खोखे-खोखे’ भरकर शहद पहले ही मिल गया है। परंतु सिर्फ शहद में उंगलियां डुबाकर चाटने से क्या होगा? अब मंत्री पद चाहिए ही। कम-से-कम महामंडल की लॉटरी तो लगनी ही चाहिए अन्यथा इस क्रांति का लाभ नहीं, ऐसा शिंदे गुट के लोग खुलकर कहने लगे हैं। ये तो पहले विस्तार के बाद का झमेला है। दूसरे विस्तार के बाद शिंदे के गांव और गुट में रोज बारह झमेले सिर उठाएंगे और हर झमेलेबाज को खोखे का वितरण करने के दौरान बाल और दाढ़ी झड़ जाएगी। शिंदे गुट के मंत्री जहां जाते हैं, वहां विरोध होता है। महामानव संजय राठोड़ अपने गांव में गए, वहां ट्रक भरकर फूल उन पर बरसाए गए। उन फूलों की हर पंखुड़ी से पुणे की ‘निर्भया’ की चीखें सुनाई दे रही होंगी। लेकिन सरकार यदि बारह झमेले और लफड़े करके आई होगी तो उस अबला की चीखों को कौन पूछेगा? कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री शिंदे ने अपने गुट के लोगों को बुलाकर समझाया है कि उल्टे-सीधे काम न करें, ऐसा कुछ करोगे तो साथ नहीं देंगे। कोई भी झमेला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह शिंदे को कहना चाहिए? कमाल है! मूलत: खुद शिंदे व उनका गुट ही एक झमेला है। हर एक को लालच देकर फोड़ा गया है। पैसा, लाभ के पद और ईडी की धमकी से ये शिंदे गुट की झमेलेबाज सरकार बनी है। अब इस गुट को संभालने के लिए भी झमेलों का आश्रय उन्हें लेना पड़ेगा। अब कहा जा रहा है कि इस समूह के लोग मुंबई में और जगह-जगह शिवसेना भवन की प्रतिकृति बनानेवाले हैं। उस प्रति शिवसेना भवन में शिंदे गुट के सेनापति जाकर बैठेंगे। मतलब ये लोग अब प्रतिसृष्टि तैयार करने का झमेला करने लगे हैं। पुराणों में देवादिकों को चुनौती देते हुए किसी ने प्रतिसृष्टि के निर्माण का झमेला किया था। उस प्रतिसृष्टि का आगे क्या हुआ, इसकी जानकारी दादर के सदोबा हगवणकर को लेनी चाहिए। कुछ ने प्रति पंढरपुर, प्रति शिर्डी, प्रति बालाजी आदि निर्माण करके जेब भर ली। लेकिन श्रद्धा का और निष्ठा का स्थान एक ही होता है। शिवसेना के संदर्भ में यही प्रखर सत्य है। इसलिए इस सत्य के प्रखर तेज की ओर देखने का प्रयास इस ‘प्रति शिवसेना भवन’ वाले न करें। फिर अब अपने गुट के झमेलों का सामना करते समय आपके मुंह से झाग निकल रही है, उस पर प्रति शिवसेना भवन के नए झमेले का निवारण करने की आफत को संभालना आपके लिए मुश्किल हो जाएगा। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने असल स्वाभिमानी मराठियों का, हिंदुत्व का संगठन शिवसेना के रूप में बनाया। ५६ वर्षों के बाद भी इस संगठन की बुनियाद और कलश मजबूत और उतना ही अजेय है। कई लहरें, कई प्रहार, विश्वासघातों और आरोपों का सामना करते हुए शिवसेना भवन खड़ा है। यह इमारत न होकर छत्रपति शिवराय के विचारों का अभेद्य दुर्ग है। बारह झमेलों से निर्माण हुआ यह अड्डा न होकर यह इमारत मतलब महाराष्ट्र का अभेद्य कवच है, ये गुट-समूहों के झमेलेबाज लोगों को ध्यान में रखना चाहिए। शिवसैनिक स्वाभिमान का नमक और रोटी खाता है लेकिन महाराष्ट्र से बेईमानी नहीं करेगा। भारतीय जनता पार्टी को मुंबई पर से शिवसेना का भगवा उतारना है। मराठी लोगों को गुलाम-लाचार करके मुंबई को निवाला बनाना है और इस कार्य के लिए शिंदे गुट का झमेला उन्होंने तैयार किया, यह गंभीर बात है। शिंदे गुट के झमेले से संजय शिरसाट ने आवाज उठाई। ‘यही दूल्हा चाहिए’ की तर्ज पर वे बोले, ‘मंत्री पद अभी चाहिए।’ ५० लोगों को चाहिए मतलब चाहिए ही। चलो, इसके माध्यम से एक ज्वलंत सच्चाई बाहर आई। शिंदे गुट ने शिवसेना छोड़ते समय स्वाभिमान, हिंदुत्व आदि के जो मुद्दे उठाए थे, वे पूरी तरह झूठ हैं। जो ५० लोग शिंदे गुट में गए, उन्हें मंत्री पद और कुछ-न-कुछ चाहिए इसलिए गए। हिंदुत्व से उनका कोई संबंध नहीं है। जिन्हें मंत्री पद आदि नहीं मिलेगा, उन्हें प्रति शिवसेना भवन से मंत्री पद दिया जा सकेगा क्या? प्रति राज्यपाल किसी प्रति राजभवन में इस झमेलेबाज गुट की प्रति शपथ विधि कर सकेगा क्या? राज्य में एक गुट के बारह झमेले, इस तरह का मैटिनी शो शुरू हो गया है। मुफ्त में इसका लुत्फ उठाने में हर्ज क्या है?

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