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संपादकीय : अफीम ही अफीम…!

देश में असंख्य सवालों का सैलाब जारी है। मणिपुर से लेकर जम्मू-कश्मीर तक प्रश्न ही प्रश्न दिख रहे हैं। इस पर सरकार के पास कोई हल नहीं। पालघर में जयपुर-मुंबई एक्सप्रेस में एक सिरफिरे जवान ने गोलीबारी कर चार लोगों की जान ले ली। यह वही धर्मांध अफीम के सेवन का ही परिणाम है। हरियाणा में भी जातीय तनाव का बवंडर भड़काया गया है। २०२४ के आम चुनाव के लिए ‘धर्म-मंदिर-धार्मिक तनाव’ इन्हीं त्रि-सूत्रीय के सहारे भाजपा चुनाव में उतरेगी। धर्म ही अफीम की गोली है। इस अफीम का अमल देश के रग-रग में घुल गया है। २०२४ यह धार्मिक वर्ष के तौर पर मनाया जाएगा। अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के साथ इसकी शुरुआत होगी। लोगों को अन्न, वस्त्र, घर, महिलाओं को सुरक्षा, प्रतिष्ठा न दे सकनेवाली सरकार ने धर्म के नाम पर अफीम की गोलियां दीं। उसी नशे का अमल कायम रहे, इसलिए १३ हजार करोड़ रुपए खर्च कर देश में २१ भव्य मंदिरों के कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं। मंदिरों का विकास किया, यही मोदी के प्रचार का मुद्दा रहेगा, क्योंकि यही उनका हिंदुत्व है। लोगों को घंटा बजाने, पूजा-अभिषेक, महाआरती में उलझाए रखने की कला में भाजपा माहिर है। इसके लिए बागेश्वर बाबा, मनोहर पंत भिड़े, राम रहीम ऐसे बाबा लोगों को उसने हाथों में थामे रखा है। देशभर के मंदिरों का जीर्णोद्धार हो, पुनर्विकास हो, इस विषय में किसी के भी मन में कोई शंका होने का कोई कारण नहीं है। विदेशी आक्रांताओं ने कई मंदिरों को नुकसान पहुंचाया है। अनेक पुरातन मंदिरों के मरम्मत आदि की जरूरत है। अन्य देशों में भव्य स्वर्ण मंदिर, मस्जिद, चर्च इत्यादि उत्कृष्ट कला के नमूने हैं। हमारे देश में भी मंदिरों में ऐसी भव्यता, स्वच्छता, अनुशासन व साफ-सफाई होनी चाहिए। इसके लिए सरकार पहल करे तो कोई बुराई नहीं। लेकिन सिर्फ मंदिरों को बनाकर देश की प्रगति नहीं होती। शिक्षा, उद्योग, विज्ञान, रक्षा उत्पाद, कला, सामाजिक न्याय एवं सुधार में भी भारत देश अग्रसर हो। मंदिर यह मन की शांति के लिए है। विज्ञान प्रगति के लिए है। भारत सरकार २१ मंदिरों के विकास पर व धार्मिक कॉरिडोर पर बड़े पैमाने पर काम कर रही है, इनमें विज्ञान नहीं। सोमनाथ मंदिर, काशी विश्वनाथ, महाकाल मंदिर के कॉरिडोर तैयार हो गए हैं। प्रधानमंत्री ने इसका लोकार्पण किया है। उत्तर प्रदेश में मथुरा-वृंदावन, अयोध्या, आसाम में कामाख्या मंदिर, मध्य प्रदेश में चित्रकूट में वनवासी राम पथ, ओरछा में रामराजा लोक, दतिया में पीतांबरा पीठ कॉरिडोर, इंदौर में अहिल्या नगरी लोक, बिहार में भगवती स्थान, महिषी तारा स्थान का निर्माण कार्य शुरू हो चुके हैं। राजस्थान में भी गोविंद देव मंदिर, तीर्थराज पुष्कर के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। महाराष्ट्र में भी मंदिरों पर बड़ा काम शुरू है। कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर कॉरिडोर पर २५० करोड़, तो नासिक त्र्यंबकेश्वर कॉरिडोर पर करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। गुजरात में अद्भुत द्वारका नगरी बनाने का काम शुरू है। इस पर भी एक हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे। १३८ करोड़ रुपए खर्च कर द्वारका बेट बनाया जा रहा है। २०२४ के चुनाव से पहले ये सभी मंदिर तैयार हो जाएंगे। २००९ व २०१४ में सत्ता में आने से पहले मोदी सरकार ने कई वादे किए थे। विदेशों से काला पैसा वापस लाने, देश के नागरिकों के खाते में १५ लाख रुपए जमा करने, गरीबी, महंगाई खत्म करने, बेरोजगारी मिटाने, कश्मीरी पंडितों की घरवापसी कराने, देश के दुश्मनों को सबक सिखाने, वीर सावरकर को भारत रत्न देने जैसी अनेक घोषणाएं मोदी सरकार ने चूल्हे में डाल दी हैं और २१ मंदिरों को बनाकर भाजपा ने १४० करोड़ लोगों के हाथों में सिर्फ ‘घंटा’ थमाने का काम किया है। देश में रक्षा सामग्री नहीं बनती। राफेल जैसे लड़ाकू विमान प्रâांस-अमेरिका से हजारों करोड़ रुपए में खरीदने पड़ते हैं, यह कोई आत्मनिर्भरता के लक्षण नहीं। उस राफेल की खरीददारी में भी कमीशनबाजी हुई है। देश में गोमांस, समान नागरिक कानून, लव जिहाद, हनुमान चालीसा जैसे विषयों पर धार्मिक तनाव निर्माण करना और उस माहौल का फायदा उठाकर चुनाव लड़ना, यह भाजपा की हमेशा की नीति है। इसमें अब मंदिर भी जुड़ गए हैं। मणिपुर की हिंसा में कई मंदिर क्षतिग्रस्त हुए हैं। कश्मीर घाटी में कई मंदिर खतरे में हैं। उस पर भारतीय जनता पार्टी ने चुप्पी साध रखी है। मणिपुर में महिला को नग्न कर घुमाया जाता है। सैकड़ों छोटे बच्चे वहां की हिंसक घटनाओं में अनाथ हो गए। उनकी रक्षा कोई मंदिर, चर्च, मस्जिद करेंगे? अंतत: मानवता ही श्रेष्ठ धर्म है और यही हिंदू धर्म की सच्ची शिक्षा है। केदारनाथ में आए प्रलय से भी मानव जीवन का रक्षण नहीं हो सका। वहां हमने पर्यावरण, प्रकृति, विज्ञान की परवाह नहीं की। अफीम की गोली से न धर्म की रक्षा होती है, न राष्ट्र की रक्षा होती है। कोरोना के संकट काल में मंदिर भी बंद ही थे। डॉक्टर, नर्स ही देवता के रूप में उपस्थित थे। थालियां पीटकर, घंटे बजाकर कोरोना भागा नहीं। महाराष्ट्र में वो उद्धव ठाकरे के कार्यों के चलते रुका। उस समय गंगा में मनुष्यों के शव बहते हुए दुनिया ने देखे। वहां धर्म था ही लेकिन विज्ञान का उपयोग नहीं हुआ और लोगों को गंगा में बहकर मरना पड़ा। वर्ष २०२४ में एक बार फिर धर्मांध अफीम की फसल उगाने की तैयारी शुरू है। उसके लिए २१ मंदिरों का उपयोग होगा। भक्त अब सावधान रहें, इतना ही!

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