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संपादकीय: विरोधियों को फांसी पर लटकाया नहीं जाता, यही है प्रजातंत्र! कानूनविद के विचार की स्वतंत्रता!

हरीश सालवे के कानून का ज्ञान और अनुभव निर्विवाद है। वह इंग्लैंड के राजघराने के वकील हैं और उनका अधिकतर समय यूरोप जैसे देशों के कोर्ट-कचहरी में बीतता है। वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर के वकील हैं। अपने देश के सबसे महंगे वकीलों में उनका शुमार है लेकिन पाकिस्तान की जेल में वैâद कुलभूषण जाधव का केस उन्होंने सिर्फ एक रुपया लेकर लड़ा। सीमा क्षेत्र के मराठी बंधुओं के व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गला घोंटने का जो प्रयास शुरू है, इस केस में भी सालवे ही सर्वोच्च न्यायालय में महाराष्ट्र का पक्ष रखनेवाले हैं। उनका ‘परिवार’ प्रजातंत्र परंपरा की प्रतिष्ठा बनाए रखने वालों में से है। कानूनविद सालवे ने आरोप लगाया है कि हिंदुस्थान में प्रजातंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हत्या होने का भ्रम अपने देश के ही लोग पैâला रहे हैं। कानूनविद सालवे का कहना है कि देश की प्रगति पर अंकुश लगाने के लिए ही यह भ्रम पैâलाया जा रहा है। सालवे विशेष ‘साम्राज्य’ के वकील हैं। अपने देश के कई कॉर्पोरेट्स, दिग्गज उद्योगपतियों के वे कानूनी सलाहकार हैं। श्री हरीश सालवे ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में एक बयान दिया है। यह इस बयान से बिल्कुल अलग व विपरीत था। ‘प्रवर्तन निदेशालय अर्थात ‘ईडी’ यह मनी लॉन्डरिंग मामले की जांच करने का क्रूर अधिकार है। इसके चलते व्यक्तिगत स्वतंत्रता धोखे में न आ जाए इसलिए इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता है।’ श्री सालवे का यह मत अपने देश में जारी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के गला घोंटने के खिलाफ है। सालवे ने अपना मुद्दा और अधिक स्पष्ट करते हुए बताया कि ‘ईडी’ को दिए गए अधिकार कठोर हैं। लॉर्डशिप्स ने यदि इन पर लगाम नहीं लगाया, तो इस देश में कोई भी सुरक्षित नहीं रह जाएगा। सालवे के बयान का सीधा अर्थ यह है कि केंद्र सरकार ‘ईडी’ का इस्तेमाल कर व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गला घोंट रही है। इसके बावजूद हरीश सालवे अब कहते हैं व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोई खतरा नहीं है। फिजूल ही देश की बदनामी मत कीजिए! हकीकत तो यह है कि आज हम सभी भयानक परिस्थिति से गुजर रहे हैं। देश में प्रजातंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, खान-पान, कपड़े-लत्ते का पहनावा, धार्मिक व सांस्कृतिक स्वतंत्रता धोखे में है। मोदी-शाह की सरकार ने केंद्रीय जांच मशीनरी का अमानवीय ढंग से इस्तेमाल शुरू किया है और इसी के शिकार कुछ उद्योगपतियों का केस खुद सालवे ही लड़ रहे हैं। सत्ता का दुरुपयोग कर मोदी-शाह की सरकार ने नौ सरकारें गिराई हैं। महाराष्ट्र में तानाशाही तरीके से शिवसेना तोड़कर भाजपा ने एक अप्राकृतिक सरकार बनाई। इस बागी शिवसेना गुट के वकील के रूप में भी श्री सालवी काम देख रहे हैं। यह तो उनका व्यावसायिक भाग है, लेकिन बहुमत की सरकार को ‘ईडी’ वगैरह की धमकी देकर गिराना यह लोकतंत्र व स्वतंत्रता की किस कानूनी व्याख्या में समाविष्ट है? इंग्लैंड में भी यह सब नहीं चलता है। झूठ साबित होने पर प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को इस्तीफा देना पड़ा था। ‘पार्टी गेट’ मामले की आग की आंच इन पर आने की वजह से इन्हें इस्तीफा देना पड़ा। कोविड महामारी के दौरान उन्होंने लॉक डाउन नियमों का उल्लंघन कर डाउनिंग स्ट्रीट पर एक ‘पार्टी’ का आयोजन किया था और इस बारे में हाउस ऑफ कॉमन्स अर्थात ब्रिटिश संसद को गुमराह किया था। इंग्लैंड के निवासी होने की वजह से श्री सालवे को इसकी बखूबी जानकारी होगी, लेकिन अपने देश में तो राजनेता शपथ लेकर भी रोजाना झूठ बोलते हैं, संसद को भी भ्रमित करते हैं और उसके बाद वे देशभक्त होने का दिखावा करते हैं। राहुल गांधी मानहानि मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गुजरात हाईकोर्ट के बारे में की गई टिप्पणी तो जरूर सालवे के नजर से होकर गुजरी होगी ही। राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द हो इस एकमात्र उद्देश्य को लेकर यह मामला चलाना उनके लिए ही न्यायदान साबित हुआ। यह एक संसद सदस्य के व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गला घोंटना नहीं है तो क्या है? संसद में सत्ताधारी पक्ष के सभागृह नेता अंधाधुंध तरीके से विरोधियों को ‘देशद्रोही’ कहते हैं और इसके खिलाफ आवाज उठानेवाले सांसदों को निलंबित कर दिया जाता है। मणिपुर हिंसा पर नियम २६७ के अनुसार चर्चा हो और प्रधानमंत्री महोदय इस पर संबोधन करें, ऐसी मांग करनेवाले संजय सिंह, डेरेक ओब्रायन इन राज्यसभा सदस्यों पर कड़ी कार्रवाई की गई। प्रजातांत्रिक तरीके से दिल्ली की सत्ता पर बैठे लोगों के अधिकार ले लिए गए और उन्हें पंगु बना दिया गया। मणिपुर में हिंदुस्थानी नागरिक महिलाओं का निर्वस्त्र जुलूस निकाले जाने के बावजूद वहां के भाजपा मुख्यमंत्री को पूर्ण रूप से संरक्षण प्राप्त है। यह मनमानी है। देश में खुली सांस लेना कठिन हो गया है। सभी जगह भय की अदृश्य फौलादी दीवार के भीतर घुट-घुटकर जीने की भावना सभी जगह व्याप्त है। जम्मू-कश्मीर में पिछले चार वर्षों से चुनाव नहीं हो रहे हैं। मुंबई सहित चौदह महानगरपालिकाओं पर प्रशासकों की नियुक्ति कर कार्यभार चलाना भ्रष्टाचार और प्रजातंत्र की हत्या है। सभी भ्रष्टाचारियों पर पहले ‘ईडी’ लगाना फिर उन्हें अपने पक्ष में शामिल कर मंत्री बनाना यह स्वतंत्र्ाता का अपमान है। लेकिन यह मनमानी करना प्रजातंत्र की हत्या नहीं है, ऐसा इंग्लैंड इत्यादि जगहों पर विराजमान अपने विद्वानों को महसूस होना इस महान देश का दुर्भाग्य है। हरीश सालवे एक प्रतिष्ठित कानूनविद हैं। उन्हें अपना मत प्रकट करने का संपूर्ण अधिकार है, लेकिन उनके मत और देश के वर्तमान हालात में भारी अंतर है। कहा जाता है कि हमने अपना प्रजातंत्र, संसदीय परंपरा यह इंग्लैंड से लिया है। इंग्लैंड में प्रजातंत्र, व्यक्तिगत स्वतंत्रता सही सलामत है, वहां सभी धर्मों में समन्वय है इसीलिए ऋषि सुनक प्रधानमंत्री बन सके हैं। अपने देश में धर्म, धर्मांधता, जाति विवाद को पाल-पोसकर राजनीति की जाती है। यहां तक तो ठीक था, लेकिन अब राजनैतिक स्वार्थ के लिए विविध धर्मों के बीच झगड़े लगाकर दंगे की आग भड़काई जा रही है। प्रजातंत्र पर इस तरह का आक्रमण धोखादायक है। हिंदुस्थान का आर्थिक महासत्ता बनना पड़ोस के चीन जैसे देशों से देखा नहीं जा रहा है। हिंदुस्थान का चीन से सीधा-सीधा आर्थिक संघर्ष जारी है। देश की आर्थिक प्रगति उनसे देखी नहीं जा रही है। इसीलिए हिंदुस्थान में प्रजातंत्र की हत्या होने का आरोप लगाया जा रहा है, जबकि सालवे कहते हैं कि देश में प्रजातंत्र जीवित होने की यह निशानी है। सालवे जो कहते हैं इसे मान्य करना ही पड़ेगा। वर्तमान सरकार राजनैतिक विरोधियों को आज सिर्फ धमकियां देती है, जांच की झड़ी लगाकर लाचार कर देती है। लेकिन अभी तक बिना जांच के फांसी पर नहीं लटकाया जा रहा है यह अपने देश में प्रजातंत्र के जीवित रहने का संकेत है। कानूनविद सालवे सत्य को सामने लाए हैं, इसके लिए उनका आभार!

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