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संपादकीय : पाकिस्तानी हिंदू-कश्मीरी पंडित; अपेक्षा भंग का बोझ

देश की सरकार हिंदुत्ववादियों की है। वह हिंदू तथा हिंदुत्व के लिए कैसी नीतियों को लागू कर रही है, ऐसा हमेशा कहा जाता है। उसके लिए कुछ निर्णयों का प्रमाण सरकार समर्थक मंडली की ओर से दिए जाते रहते हैं। लेकिन वास्तविकता क्या है? निर्णय और वास्तविकता में कितना अंतर है? इन निर्णयों का प्रत्यक्ष लाभ कितना हुआ है या नहीं हुआ है? ऐसे कई सवाल उठ रहे हैं। वैसी घटनाएं भी देश में घटती दिखाई दे रही हैं। अब केंद्र सरकार के एक और निर्णय की असफलता सामने आई है। पांच साल पहले नागरिकता संशोधन विधेयक संसद में पारित किया गया। तब देश ही नहीं, बल्कि पड़ोसी इस्लामिक देशों के अत्याचार पीड़ित हिंदुओं का भी सरकार किस तरह से विचार कर रही है, उन्हें कैसे आधार दे रही है, ऐसे शब्दों में श्रेय लिया गया। पाकिस्तान, बांग्लादेश के हिंदुओं को भी उस समय सहज महसूस हुआ था। उनके लिए ये विधेयक एक आशा की किरण था। हिंदुस्थान में आकर सुरक्षित और सहज जीवन जीने की उनकी उम्मीद इसकी वजह से बढ़ गई थी। लेकिन अब सामने आ रही खबर चिंताजनक है। इस विधेयक की उम्मीद पर पाकिस्तान के जो प्रताड़ित हिंदू हिंदुस्थान में आए उनकी उम्मीदें भंग हो गई हैं। पिछले १८ महीने में तकरीबन १,५०० हिंदू तंग आकर पाकिस्तान वापस चले गए हैं यानी पाकिस्तान में कट्टरता, आतंकवाद, सरकार की उदासीनता से अपने आपको मुक्त कराने के लिए जो हिंदू यहां आए उनके हिस्से हिंदुस्थान में भी वही उदासीनता और सरकार की उपेक्षा आई। नागरिकता संशोधन विधेयक की प्रशंसा तो खूब हुई। पड़ोसी इस्लामिक देशों में उत्पीड़न छावनियों से वहां के हिंदू मुक्त हो गए हैं और उन्होंने हिंदुस्थान में खुली सांस ली है, ऐसी एक तस्वीर निर्माण की गई। लेकिन अब उन्हें मायूस होकर उसी ‘नरक’ में वापस जाना पड़ रहा है। तीन महीने पहले भी ८०० पाकिस्तानी हिंदुओं को हिंदुस्थान की नागरिकता से वंचित कर दिया गया था। अगर ऐसा ही होगा तो इस निर्णय का क्या फायदा हुआ? नागरिकता संशोधन कानून बना। लेकिन उसके पेचीदा नियम सरकारी उपेक्षा, उदासीनता कायम ही रही और पाकिस्तानी हिंदुओं की आशाओं पर पानी फेर दिया गया। वर्तमान सरकार से पहले पाकिस्तान के लगभग १३ हजार हिंदुओं को हिंदुस्थान की नागरिकता मिली थी। लेकिन पिछले पांच वर्षों में यह लाभ केवल २ हजार पाकिस्तानी हिंदुओं को मिल सका है। इसके अलावा पिछले १८ महीने में १,५०० पाकिस्तानी हिंदुओं पर तंग आकर वापस पाकिस्तान जाने की नौबत आई, वह अलग। इधर पाकिस्तानी हिंदू और उधर कश्मीरी पंडित दोनों की रक्षा और पुनर्वास का ढोल जोर-शोर से पीटा गया। लेकिन आज पाकिस्तानी हिंदू क्या या कश्मीरी पंडित क्या दोनों का मोह भंग हो गया है। यह सच है कि वर्तमान शासकों ने धारा ३७० हटा दी। लेकिन इसके बाद वहां औद्योगिक निवेश, उद्योग विकास, कश्मीरी पंडितों की घर वापसी, उनका पुनर्वास जैसी कई उम्मीदें विफल हुई हैं। इसके विपरीत जो पंडित जम्मू-कश्मीर में हैं, उन्हें ‘टार्गेट किलिंग’ का शिकार होना पड़ रहा है। दो महीने पहले जम्मू-कश्मीर के १,८०० पंडित परिवारों सहित तकरीबन ३ हजार हिंदुओं को वहां से विस्थापित होना पड़ा है। कश्मीरी पंडितों की जैसे उम्मीदें भंग हुई हैं उसी तरह पाकिस्तानी हिंदुओं की भी हुई हैं। कश्मीरी पंडितों को दिए गए सरकारी आश्वासनों के बुलबुले ‘टार्गेट किलिंग’ के रक्त से लाल हो रहे हैं और पाकिस्तानी हिंदुओं को दिया गया नागरिकता का गुब्बारा सरकारी उदासीनता और जटिल नियमों से फूट गया है। इसलिए डेढ़ हजार पाकिस्तानी हिंदुओं को हताश और निराश होकर वापस पाकिस्तान जैसे नरक में जाने की नौबत आ गई है। पड़ोसी इस्लामिक देशों के हिंदू हों या हिंदुस्थान के उनका मौजूदा सरकार से मोहभंग हो गया है। इस निराशा का क्या करें? यह सवाल पाकिस्तानी हिंदुओं और कश्मीरी पंड़ितों से लेकर देश के आम नागरिकों तक सभी के समक्ष है। शासकों ने जनता को उम्मीदें तो दिलाईं लेकिन उम्मीदें भंग करने का बड़ा बोझा उन्होंने जनता पर लादा है। यह बोझ जनता को ही उतारकर फेंकना होगा।

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