मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : पालघर का हत्याकांड! फडणवीस, अब किसका इस्तीफा मांगेंगे?

संपादकीय : पालघर का हत्याकांड! फडणवीस, अब किसका इस्तीफा मांगेंगे?

महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था को क्या हो गया है? ऐसा सवाल मुंबई उच्च न्यायायल के समक्ष है, इस सवाल का जवाब सरल है। राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को लकवा मार गया है। वर्तमान में मूसलाधार बारिश, महाप्रलय वगैरह चिंता का माहौल यानी आसमानी संकट है। लेकिन लकवा मार चुकी स्वास्थ्य व्यवस्था यानी फडणवीस-शिंदे गुट सरकार की सुल्तानी है। ठाणे के पास ‘मोखाडा’, ‘वाडा’ जैसे आदिवासी क्षेत्र में स्वास्थ्य व्यवस्था की बदहाली महाराष्ट्र के लिए शर्म की बात है। दो घटनाओं ने तो व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। ठाणे के पास मोखाडा तहसील में बोटोशी नामक अतिदुर्गम गांव है। वहां के मरकटवाड़ी में वंदना बुधर नामक आदिवासी महिला को जुड़वां बच्चे पैदा हुए। प्रसूति के दौरान कुछ दिक्कतें हुईं लेकिन न गांव में वाहन और न ही सरकारी स्वास्थ्य केंद्र । महिला इलाज के लिए बेबस हो गई। वंदना को बेहद रक्तस्राव होने पर गांववालों ने उसे मोखाडा के डॉक्टर के पास ले जाने का फैसला किया। लेकिन दवाखाने तक ले जाने के लिए रास्ता नहीं था। इसलिए उसे ‘डोली’ से तीन किलोमीटर दूर मुख्य मार्ग पर ले जाया गया। तब तक समय निकल चुका था। वंदना के जुड़वां बच्चों की मूसलाधार बारिश में डोली में ही मौत हो गई। एक तरफ आजादी का अमृत महोत्सव शुरू था और दूसरी तरफ महाराष्ट्र की आदिवासी बस्ती इस तरह के परतंत्र के अंधेरे में अपने शिशुओं की मौत खुली आंखों से देख रही थी। यह हुआ मोखाडा का मामला। बगल की वाडा तहसील में भी ऐसा ही हुआ। यहां पांच घर के गांव में जाने के लिए पक्का तो छोड़िए, सहज रास्ता भी नहीं है। उस पर बारिश ने पगडंडी ही नष्ट कर दी। १५ अगस्त को एक आदिवासी महिला को प्रसूति वेदना शुरू हुई। गांव में दौड़-भाग शुरू हो गई। गांव में एकमात्र वाहन जीप थी, उसे बाहर निकाला गया। लेकिन रास्ता कीचड़ से सना हुआ था। उस जीप को दो घंटे धक्के मारकर मुख्य रास्ते पर लाना पड़ा। मोखाडा की तरह यह क्षेत्र भी शत-प्रतिशत आदिवासियों की बस्ती है। महाराष्ट्र के इस अमानवीय मामले को उच्च न्यायालय ने संज्ञान में लिया और सरकार को फटकार लगाई। राज्य में कुपोषण से मरनेवालों की संख्या कम नहीं हो रही है, इसे लेकर चिंता जताई। पालघर, मोखाडा, वाडा की घटना पर मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायाधीश मकरंद कर्णिक ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ‘उचित मार्ग के अभाव में समय पर न स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने के कारण आदिवासी महिला ने अपने जुड़वां बच्चे खो दिए, यह चिंताजनक है। बालमृत्यु, गर्भवती महिला और शिशु मृत्यु दर कम नहीं हो रही है, जिसकी हमें चिंता है। हमने पालघर की घटना के संदर्भ में समाचार पत्र में पढ़ा। महिला को डोली में अस्पताल लाया गया। पहुंचने तक उसके बच्चों की मृत्यु हो गई थी। यह पालघर में हुआ। हम २००७ से इस याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। आज हम २०२२ में हैं। १६ वर्ष हो गए।’ उच्च न्यायालय द्वारा जताई गई चिंता महत्वपूर्ण है। देश को आदिवासी समुदाय की पहली महिला राष्ट्रपति मिली इसलिए हमने उत्सव मनाया। लेकिन आदिवासी बस्तियों पर अंधेरा और छलवाद कायम है। मोखाडा, वाडा, पालघर के मसले किसी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक पहुंचाना चाहिए। इतने वर्षों में हम आदिवासियों को स्वास्थ्य सेवा, रास्ते नहीं दे सके। मेलघाट, धुले, नंदुरबार जैसे दुर्गम क्षेत्र तो हैं ही लेकिन मोखाडा, पालघर, वाडा क्षेत्र तो ठाणे के हैं। मुंबई के करीब हैं और पिछले कई वर्षों से मौजूदा मुख्यमंत्री इस क्षेत्र का नेतृत्व कर रहे हैं। ऐसा दिखाई दे रहा है कि वे कभी उन रास्तों पर गए ही नहीं। फडणवीस-शिंदे महाशय ने समृद्धि महामार्ग का निर्माण किया। लेकिन अपने ही ठाणे जिले में आदिवासी बस्तियों को रास्ता नहीं दे पाए। सड़कों के अभाव में आदिवासी महिला, बुजुर्ग, शिशु तड़पकर मर रहे हैं। उनके जीवन में समृद्धि आए, ऐसा क्यों नहीं लगता? पिछले कई वर्षों से वे और उनके सहायक इस जिले के पालकमंत्री तथा सब कुछ थे। फिर आदिवासी महिलाओं पर कोख के लालों को गंवाने की नौबत क्यों आई? सूरत-गुवाहाटी का एक-दो खोखा सड़कों के काम में आता तो वंदना बुधर के जुड़वां बच्चे बच गए होते लेकिन दुर्भाग्य उसका। आज भी मुंबई के करीब मुख्यमंत्री के जिले में बीमार महिलाओं, बुजुर्ग मरीजों को डोली से यात्रा करनी पड़ती है। फिर भी हम किस विकास की डींगें हांक रहे हैं? कोरोना काल में सर्वोत्तम स्वास्थ्य प्रबंधन करनेवाले महाराष्ट्र की सराहना विश्व ने की। घर-घर में, आदिवासी बस्तियों में जब स्वास्थ्य सेवा पहुंचाई गई, यह तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की उपलब्धि थी। वह सिर्फ दो-तीन महीने में नष्ट हो गई। पालघर में साधु की हत्या भीड़ ने की तब हिंदुत्व खतरे में आ गया, यह कहकर सरकार पर हमला करनेवाले भाजपावालों को वंदना बुधर और उसके जुड़वां बच्चे हिंदू नहीं लग रहे हैं और इस हत्याकांड पर वे मुंह न खोलें, इस ढोंग को क्या कहा जाए? पालघर साधु हत्याकांड जितनी ही वंदना बुधर के जुड़वां बच्चों की मृत्यु गंभीर है। केवल औपचारिक जांच के आदेश देने से नहीं चलेगा। इस समय चल रहे मानसून सत्र के पहले दिन २५,८२६ करोड़ रुपए की मांग प्रस्तुत की गई। उसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए २,२५९, महिला व बाल कल्याण १,६७२, सामाजिक न्याय विकास २,६७३, आजादी का अमृत महोत्सव ५०० ऐसे सभी करोड़ों में आंकड़े हैं। इसके अलावा सड़क के लिए सैकड़ों करोड़ के अलग आंकड़े होते हुए भी वंदना बुधर ने अपने जुड़वां बच्चे गवां दिए हैं। क्योंकि इन पैसों का नियोजन जनता के लिए नहीं, बल्कि विधायकों-सांसदों को खोखे देने के लिए शुरू है। खोखेवालों की सरकार ने बेगुनाह जीवों की बलि ले ली। फडणवीस, अब किसका इस्तीफा मांगेंगे?

अन्य समाचार