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संपादकीय : संसद बना श्मशान

अब यह स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री शाह को लोकतंत्र, संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से कोई प्रेम नहीं है। प्रधानमंत्री बोलते कुछ हैं, लेकिन करते कुछ और ही हैं। यह उनका आत्मविश्वास है कि लोग मूर्ख हैं और हम उन लोगों को आसानी से मूर्ख बना सकते हैं जो मूर्ख नहीं हैं। भाजपा संसदीय दल की बैठक में मोदी ने अपने सांसदों को ज्ञान दिया। ‘विपक्षी दल संसद में घुसपैठ का समर्थन कर रहे हैं, यह सही नहीं है। किसी को भी संसद में घुसपैठ का समर्थन नहीं करना चाहिए।’ प्रधानमंत्री का यह बयान एक तरह से राजनीतिक मिमिक्री है। संसद में घुसपैठ की गई। बेरोजगार युवाओं ने ऐसा किया। इसका मतलब अगर आतंकी चाहते तो वे इसी तरह से संसद में घुस सकते थे और आतंकी वारदात को अंजाम देकर हाहाकार मचा सकते थे। संसद में घुसपैठ क्यों और वैâसे हुई? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह सवाल विपक्षियों ने सदन में पूछ लिया तो क्या गुनाह कर दिया? गृहमंत्री को इस मुद्दे पर बाहर प्रवचन झाड़ने की बजाय संसद में बोलना चाहिए। संसद का सत्र चल रहा है और प्रधानमंत्री, गृहमंत्री घुसपैठ को लेकर खुलासे करते घूम रहे हैं। इस पर सवाल उठाने वाले १४३ सांसदों को सरकार ने निलंबित कर दिया। प्रधानमंत्री मोदी फिर विपक्ष पर आरोप लगाकर लोकतंत्र की मिमिक्री कर रहे हैं। संसद में घुसपैठ को लेकर चार पंक्तियों का बयान देना था। लेकिन इसकी बजाय लोकसभा, राज्यसभा से विपक्षियों को बाहर कर दिया गया और लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर को सरकार ने मरघट बना डाला। २२ जनवरी को प्रधानमंत्री भव्य श्रीराम मंदिर का उद्घाटन करने अयोध्या जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर को श्मशान बना डाला, इसे क्या कहा जाए? क्या उन्हें राम मंदिर का उद्घाटन करने का अधिकार है? श्री मोदी का ये कहना है, ‘विधानसभा चुनाव हारने के कारण विपक्ष हताश हो गया है और संसद में घुसपैठ के मामले में राजनीति कर रहा है।’ श्री मोदी की बातों का कोई मतलब नहीं है। विपक्ष कोई हताश वगैरह नहीं हुआ है। ‘ईवीएम है तो मोदी है’ यही चार राज्यों के नतीजों का मतलब है। विपक्ष पराभव के चलते हताश नहीं हुआ है बल्कि भाजपा और उसके नेताओं पर विजय का नशा और उन्माद चढ़ गया है। उस उन्माद में वे संसद के नियम, संविधान को आग लगाकर उसको मरघट बना रहे हैं, लेकिन विपक्ष इन परिस्थितियों में भी लड़ रहे हैं और सीने पर घाव झेलते हुए आगे बढ़ रहे हैं। यदि मोदी सचमुच लोकतंत्र के भक्त हैं तो उन्हें २०२४ का चुनाव मतपत्र पर कराकर अपने विरोधियों को परास्त करके दिखाना चाहिए। इन सभी घटनाक्रमों के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू से फोन पर चर्चा की। दोनों ने इजरायल-हमास संघर्ष पर चर्चा की। मोदी को नेतन्याहू से वहां की चुनावी व्यवस्था पर चर्चा करनी चाहिए। भले ही भाजपा को ईवीएम हैकिंग, पेगासस आदि तकनीक इजरायल से मिली हो, लेकिन नेतन्याहू के अपने देश में बैलेट पेपर से चुनाव होते हैं। इजरायल की विपक्षी पार्टियों को ‘ईवीएम’ पर भरोसा नहीं है। दुनिया द्वारा नकार दी गई तमाम तकनीकों को भारत में लाकर मोदी ‘विश्व गुरु’ आदि बनने निकले हैं और उस पर सवाल उठाया जाए तो उनके सब्र का बांध टूट जाता है। संसद में विरोधियों को निलंबित करके श्री मोदी ने कई अहम विधेयक मंजूर करवाए। विपक्ष विधेयकों का खोखलापन उजागर कर देगा, यह डर सरकार को होगा। प्रचंड बहुमत होने के बावजूद मोदी और उनकी सरकार विपक्ष से इतनी डरती क्यों है? इसका उत्तर यह है कि उनका बहुमत खरा नहीं है। मोदी ने अंधभक्तों की फौज तैयार कर ली है और ये अंधभक्त भंगेड़ी की तरह भक्ति का तांडव करते हैं। इनमें से हर कोई बेरोजगारी के विस्फोट और उसकी वजह से संसद में हुई घुसपैठ पर चुप है। भक्त अंधे और गूंगे भी हैं। केंद्र सरकार ने लोकसभा को ‘मूकसभा’ बनाकर देश को अजीब स्थिति में धकेल दिया है। दो दिनों में १४३ सांसदों को निलंबित कर दिया गया। इनमें से कई लोग जाने-माने दिग्गज सांसद हैं। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर, नेहरू, सरदार पटेल आदि के समय में यदि मोदी-शाह का शासन होता तो उन्होंने डॉ. आंबेडकर, सरदार पटेल को भी प्रश्न पूछने पर संसद से निलंबित कर दिया होता। यह एक तरह से अहंकार और असफलता का लक्षण है। चार राज्यों में हुई हार के कारण ‘इंडिया’ गठबंधन जोर-शोर में काम पर लग गई है, क्योंकि उन्हें संघर्ष करना है। मोदी कहते हैं, वर्ष २०२४ में विपक्ष की संख्या आज है, उससे भी कम हो जाएगी। क्योंकि उन्हें ‘ईवीएम’ के कारनामों पर भरोसा है। वर्ष २०२४ में विपक्ष को इसी तरीके से परास्त कर भाजपा क्या संसद में अपने उद्योगपति मित्रों की सभा कराना चाहती है? उनकी मंशा तो यही दिखती है। संसद का महत्व, प्रतिष्ठा, गौरव खो गया है। संसद का महत्व, प्रतिष्ठा, वैभव नष्ट हो गया है। लोकतंत्र के मंदिर में लोकतंत्र का श्मशान बन गया। श्रीराम मंदिर के उद्घाटन के बाद अब क्या करेंगे? संविधान के साथ सब बेदी पर चढ़ गए, लेकिन जनता सती नहीं होगी। वह लड़ती रहेगी!

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