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संपादकीय : पुलवामा से पुंछ!

मोदी-शाह की सरकार चुनावी राजनीति में उलझी पड़ी है और राष्ट्रीय सुरक्षा के बारह बज गए हैं। पहले संसद में घुसपैठ हुई और अब जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने सैन्य वाहनों के काफिले पर हमला कर दिया, इसमें पांच जवान शहीद हो गए। सरकार ने संसद में १४६ सांसदों की बलि ले ली है। संसद की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है? ऐसा सवाल पूछने पर सांसदों को सामुदायिक तौर पर निलंबित कर दिया गया। सैन्य वाहनों पर हमले का जिम्मेदार कौन? अगर कल किसी ने ऐसा सवाल पूछा तो उन्हें भी संसद से निलंबित कर दिया जाएगा। देश की ये स्थिति बेहद गंभीर है। सैन्य वाहनों के काफिले पर हुए आतंकी हमले ने केंद्र सरकार को एक बार फिर बे-आबरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कश्मीर से अनुच्छेद ३७० हटाने की वैधता पर मुहर लगा दी है। इसके बाद भाजपा ने जीत का विजयोत्सव शुरू कर दिया। उस उत्सव पर हमारे जवानों के खून के छीटें उड़े हुए हैं। जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक वैद ने कहा है कि ‘सेना पर हमला पाकिस्तान द्वारा किया गया सुनियोजित हमला है। अनुच्छेद ३७० हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आतंकवादी ये ‘नेरेटिव’ बदलकर लोगों में डर पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं।’ पुलिस महानिदेशक का ये कहना सच ही है, लेकिन चार साल पहले पुलवामा हमले में ४० जवानों को मारने वाले आतंकवादी अभी भी कश्मीर में खुलेआम घूम रहे हैं और वे बार-बार हमारे जवानों की हत्या कर रहे हैं। कल पुंछ में पांच जवान शहीद हो गए। इसी पुंछ के सूरतकोट इलाके में १९-२० दिसंबर को पुलिस कैंप पर भयानक बम हमला हुआ था, उसमें भी भारी नुकसान हुआ था। इस वर्ष राजौरी, पुंछ जिले में २५ जवान शहीद हुए। ये तस्वीर अच्छी नहीं है। धारा ३७० हट गई, लेकिन कश्मीर में स्थिरता नहीं। कश्मीर अब केंद्र शासित राज्य बन गया है। इसलिए वहां गिरे खून की हर एक बूंद के लिए सरकार जिम्मेदार है। अनुच्छेद ३७० हटाने के बाद भी कश्मीर में जवानों का खून बह रहा है और आम नागरिकों का जीवन सुरक्षित नहीं है। कश्मीरी पंडितों की ‘घर वापसी’ की दी गई गारंटी हवा में ही उड़ गई, तो धारा ३७० हटाने से कश्मीर में क्या हासिल हुआ? सरकार चार वर्षों में वहां चुनाव नहीं करा पाई और राज्यपाल के जरिए राजरथ हांका जा रहा है, यह स्वस्थ लोकतंत्र का लक्षण नहीं है। आश्चर्य की बात है कि कश्मीर से हर दिन जवानों की शहादत की खबरें आ रही हैं और सरकार का मन तनिक भी विचलित नहीं हो रहा। पुलवामा नरसंहार के बाद उन्हीं वीर जवानों के नाम पर वोट मांगने वाली यह सरकार आज जवानों के बलिदान पर चुप है। आतंकियों और उन्हें पोसनेवाले पाकिस्तानियों का खात्मा कर देंगे, ऐसा उस समय वे दहाड़ते थे। आखिरकार, वह दहाड़ सिर्फ कोरी गप्प ही साबित हुई। पाकिस्तान ने कश्मीर घाटी में गतिविधियां बढ़ा दी हैं और भारतीय जवान, पुलिस, सुरक्षा बल उनके ‘टार्गेट’ पर हैं। ऐसे समय में केंद्र सरकार क्या कर रही है? ऐसे वक्त में जब कश्मीर की धरती अपने जवानों के खून से लहूलुहान है, सरकार ने संसद भवन में इस पर सरकार से सवाल पूछने के लिए कोई विपक्षी सांसद नहीं छोड़ा है। दिल्ली में १५० सांसदों को ‘शहीद’ किया गया, तो वहीं कश्मीर में पांच जवान वीरगति को प्राप्त हुए। ऐसे में जबकि रक्त व लोकतंत्र का पतन हो रहा है, मोदी व उनके लोग अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन की तैयारी कर रहे हैं। राजनीतिक राम भक्तों को यह नहीं भूलना चाहिए कि राम ने अत्यंत युक्ति से रावण को परास्त किया और अंतत: उसका वध किया। राम सत्य के पक्ष में खड़े रहे और अपने राजनीतिक शत्रुओं का भी सम्मान करते थे। आज के रामभक्तों की राजनीति ठीक इसके विपरीत है। कश्मीर में आतंकी हमलों की बढ़ती घटनाओं से देश अस्वस्थ है और दिल्ली की राजनीति में कोई राम नहीं बचा है। एक तरफ जहां जवान मारे जा रहे हैं और दिल्ली में भाजपा तथा उनके लोग चुनावग्रस्त होकर मीटिंग में व्यस्त हैं। इस दुष्चक्र को रोका जाना चाहिए। क्या सैनिकों की शहादत, उनके परिवारों की वेदना और भारत माता की पीड़ा को समझनेवाला कोई है? क्योंकि संसद की जुबान काट दी गई है!

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