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संपादकीय : रिजर्व बैंक का बमगोला!

रिजर्व बैंक ने देश के आम कर्जदारों को एक बार फिर जोरदार झटका दिया है। लगातार दूसरे महीने में रेपो रेट में वृद्धि करके गृह कर्ज सहित सभी तरह के कर्ज रिजर्व बैंक ने महंगे कर दिए हैं। महीने का खर्च चलाने में आम व मध्यवर्गीय जनता पस्त हो रही है। इसी बीच लगातार दूसरे महीने में कर्ज की किस्त बढ़ानेवाला यह निर्णय सीधे-सीधे कर्जदारों की जेब काटनेवाला है। दो दिन तक चली कर्ज नीति समिति की बैठक के बाद रिजर्व बैंक के गवर्नर शशिकांत दास ने रेपो रेट में ०.५० फीसदी की वृद्धि करने की घोषणा की। कर्ज नीति घोषित करने के दौरान ही शेष सालभर में महंगाई दर ६ फीसदी पर और चालू वर्ष में विकास दर ७.९ फीसदी रहेगी। ऐसा संशोधित अनुमान दास ने व्यक्त किया। रिजर्व बैंक को ‘संशोधित’ अनुमान की घोषणा करनी पड़ती है। इसी में सब कुछ आ गया। रिजर्व बैंक का अनुमान मौसम विभाग की तरह बदलने लगा है। इसका अर्थ इतना ही है कि देश की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है। ‘महंगाई पर रिजर्व बैंक की पैनी नजर है’, ऐसा बयान गवर्नर दास ने कर्ज नीति घोषित करने के दौरान दिया। सचमुच इतनी पैनी नजर होगी तो महंगाई इतने बेतहाशा रफ्तार से बढ़ने की वजह क्या है? परंतु इसका उत्तर न केंद्र सरकार के पास है और न रिजर्व बैंक के पास। साग-सब्जी से रसोई गैस तक, अनाज से खाद्य तेल और पेट्रोल-डीजल तक तमाम जीवनावश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान में पहुंचने के कारण गरीब और आम जनता का जीना मुहाल हो गया है। महंगाई के दावानल से देश की जनता फिलहाल त्राहि-त्राहि कर रही है। महंगाई की आग ने रौद्र रूप धारण किया तो किस कदर कहर मच सकती है, इसका जीवंत उदाहरण हम श्रीलंका और पाकिस्तान में देख रहे हैं। हिंदुस्थान में भी महंगाई का कहर दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। परंतु महंगाई की इस आग को बुझाने के लिए किस अग्निशामक का इस्तेमाल किया जाए इस बारे में केंद्र सरकार पूरी तरह से भ्रमित हो गई है। महंगाई पर नियंत्रण के लिए सरकार की ओर से ठोस और प्रभावी उपाय-योजना बनाए जाने का दृश्य कहीं दिखाई नहीं दे रहा है, बल्कि जो थोड़ी-बहुत आर्थिक नीतियां बदली जा रही हैं उससे महंगाई पर लगाम लगने की बजाय वह अधिक ही बढ़ती दिख रही है। अभी भी वही हुआ है। महीने भर पहले ही देश के केंद्रीय  बैंक कहलानेवाले रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में ०.४० फीसदी की वृद्धि किए जाने से गृह कर्ज, वाहन कर्ज सहित सभी प्रकार के लोन महंगे हो गए थे। रिजर्व बैंक के रेपो रेट कम करने से महंगाई की आग कम होने में मदद मिलेगी, ऐसा दावा कुछ विद्वान अर्थशास्त्री कर रहे हैं। अर्थशास्त्र की पुस्तकों के पन्नों पर कदाचित ये समीकरण जुड़ते भी होंगे, परंतु प्रत्यक्ष धरातल पर इसका परिणाम शून्य नजर आता है। रिजर्व बैंक द्वारा मई महीने के पहले सप्ताह में रेपो रेट में वृद्धि किए जाने के कारण महंगाई कम हुई क्या? बल्कि रेपो रेट बढ़ाने के बाद महंगाई का ग्राफ और उफान मारकर उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। महीने भर पहले बढ़ाए गए रेपो रेट का दुष्परिणाम सामने मौजूद रहने के दौरान ही रिजर्व बैंक ने एक बार फिर रेपो रेट में ०.५० फीसदी की वृद्धि कर दी। इसलिए अप्रैल महीने में ४ फीसदी रहा रिजर्व बैंक का रेपो रेट मई महीने में ४.४० फीसदी पर और अब जून महीने में ४.९० फीसदी पर जाकर पहुंच गया। रेपो रेट में वृद्धि करने के रिजर्व बैंक के बमगोले के कारण आम और मध्यमवर्गीय कर्जदारों के ब्याजदर में महीने भर में दूसरी बार वृद्धि हुई है। महंगाई के जाल में पहले ही परिवारों का बजट डांवांडोल होने के दौरान कर्ज चुकाने के लिए ‘ईएमआई’ इसी तरह बार-बार बढ़ती रही तो कर्ज लेकर जीवन सुदृढ़ करने की उठा-पटक करनेवाली आम जनता जिएगी तो कैसे  जिएगी?

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