मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : राष्ट्रपति का मान-सम्मान... संविधान का क्या?

संपादकीय : राष्ट्रपति का मान-सम्मान… संविधान का क्या?

राष्ट्रपति के अपमान को लेकर भाजपा और कांग्रेस में टकराव जारी है। लोकसभा में कांग्रेस गुट के नेता अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का उल्लेख ‘राष्ट्रपत्नी’ के रूप में किया। इस पर भाजपा ने आपत्ति जताई। राष्ट्रपति पद पर एक महिला के चयनित होने के बाद उसका नामोच्चार कैसे किया जाए? यह सवाल प्रतिभाताई पाटील जब राष्ट्रपति बनी थीं तब भी कइयों के मन में उठा था। लेकिन उनका उल्लेख राष्ट्रपति के रूप में ही होने लगा। अंग्रेजी भाषा में महिला राष्ट्रपति का उल्लेख ‘मैडम प्रेसिडेंट’ के तौर पर किया जाता है। लेकिन मराठी और अन्य भाषाओं में क्या करें? एक तो इसके आगे ‘राष्ट्राध्यक्ष’ के रूप में संबोधित करें या दूसरा संदर्भ ढूंढ़ना होगा। इसी भ्रम में कइयों की जुबान फिसल जाती है। लेकिन जुबान फिसली और उसकी राजनीति हो गई। राष्ट्रपति का उल्लेख ‘राष्ट्रपत्नी’ करने पर अधीर रंजन चौधरी ने राष्ट्रपति से माफी मांग ली है। खुद सोनिया गांधी ने भी हाथ जोड़कर माफी मांगी। लिहाजा, यह मुद्दा समाप्त हो जाना चाहिए। लेकिन इस बहाने भाजपा के हाथ एक मुद्दा लग गया और उसने अलग ही भ्रम निर्माण कर दिया। संसद में भाजपा की स्मृति ईरानी इस मामले को लेकर हद से ज्यादा आक्रामक हो गईं और उन्होंने सोनिया गांधी के साथ असभ्य बर्ताव किया। सोनिया गांधी के विरोध में भाजपा ने आपत्तिजनक नारे लगाए। यह सब लोकसभा में हुआ। स्मृति ईरानी की बेटी का गोवा में अवैध शराब बार का खुलासा जब से कांग्रेस ने किया है, तबसे उनका मन अस्थिर और बेचैन है। उनके व्यवहार में यह नजर आ रहा है। इसलिए अपनी राजनिष्ठा का घृणित प्रदर्शन कोई न करे। सोनिया गांधी विरुद्ध स्मृति ईरानी का यह झगड़ा संसदीय लोकतंत्र के असली स्वरूप को दर्शाता है। देश के राष्ट्रपति पद पर एक आदिवासी महिला विराजमान हुर्इं और उनका स्वागत देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने किया। शिवसेना जैसी ‘एनडीए’ बाह्य पार्टियों ने भी श्रीमती मुर्मू को समर्थन दिया। मुर्मू चुनकर आईं , देश के इस आनंदित क्षण में उसे धक्का लगे, यह ठीक नहीं है। संसद में पिछले सप्ताह से महंगाई, बेरोजगारी को लेकर विपक्ष प्रदर्शन कर रहा है। राज्यसभा और लोकसभा के सांसद महंगाई, बेरोजगारी को लेकर सरकार से सवाल पूछे और इसके लिए २७ सांसदों को निलंबित कर दिया गया। महंगाई, बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर चुप बैठनेवाले सत्ता पक्ष के सांसदों का राष्ट्रपति के अपमान को लेकर उबल उठना जितना मजेदार है उतना ही अचंभित करनेवाला भी है। मूलरूप से क्या आज हमारे देश में राष्ट्रपति और राज्यपाल की गरिमा रह गई है? देश का कानून, संविधान, व्यक्तिगत आजादी, न्यायालय की गरिमा खुलेआम रौंदी जा रही है लेकिन हमारे राष्ट्रपति और राज्यपाल कोई ठोस भूमिका नहीं लेते। महाराष्ट्र में तो राज्यपाल ने सीधे-सीधे एक गैरकानूनी सरकार को शपथ दिलाई और यह सरकार अभी भी मंत्रिमंडल नहीं बना सकी है। ऐसे समय पर संविधान के चौकीदार के रूप में राष्ट्रपति हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो यह राष्ट्रपति पद का अवमूल्यन है। राष्ट्रपति यानी ‘रबर स्टैंप’ बन गए हैं, ऐसी जनभावना है और राष्ट्रपति उस जनभावना में अपने आचरण से खाद-पानी डालते रहते हैं। अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष की तरह हिंदुस्थान के राष्ट्रपति को सर्वाधिकार नहीं है। मंत्रिमंडल की सिफारिशों के अनुसार उन्हें काम करना पड़ता है। अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष पद पर चुने जाने के बाद अब्राहम लिंकन ने कहा था-
‘एक महत्वपूर्ण पद पर विशेष कालावधि के लिए मुझे चुना गया है। आपकी दृष्टि से आज मुझे जो बड़ा अधिकार प्राप्त हुआ है वह कुछ वर्षों बाद नहीं रहेगा। आप खुद से और संविधान के प्रति प्रमाणिक रहे तो मैं किसी भी दुष्ट बुद्धि से प्रशासन करूं या मूर्खता से पेश आऊं और ऐसे होने की संभावना अधिक है, फिर भी मैं आपका ज्यादा नुकसान नहीं कर पाऊंगा।’
राष्ट्राध्यक्ष लिंकन की यह अप्राकृतिक विनम्रता किसके पास और हमारे बहुसंख्य जनप्रतिनिधियों का सत्ता का उन्माद किसके पास! राष्ट्रपति का चयन सत्ताधारी दल ही करता है। लेकिन राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नाक से बड़ी नथुनी न हो ऐसी व्यवस्था प्रधानमंत्री और उनकी सत्ताधारी पार्टी करती है। इन सभी मामलों में संविधान की नाक कई बार काटी गई। क्या उसकी चिंता कोई करेगा?

अन्य समाचार