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संपादकीय : संसद में विद्रोह!

२००१ को पुराने संसद भवन पर हुए हमले को २२ साल हो गए हैं। उस घटना में शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों को श्रद्धांजलि देने के लिए सुबह संसद परिसर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था और दोपहर में चार-पांच युवकों ने नए संसद भवन में घुसकर स्मोक बम फोड़कर देश और संसद को हिलाकर रख दिया। लोकसभा की दर्शक दीर्घा से दो युवक लोकसभा हॉल में कूद पड़े। उनके पास ऐसे स्मोक बम थे, जिनसे पीला धुआं निकलता था। इससे पूरा हॉल धुआं-धुआं हो गया। संसद की सुरक्षा की धज्जियां उड़ते हुए पूरी दुनिया ने देखा। आए दिन कहा जाता है कि मोदी के नेतृत्व में भारत महाशक्ति बन रहा है, लेकिन जब संसद में महाशक्ति की मजबूत सुरक्षा व्यवस्था हो और दो युवक उसमें घुसकर दर्शक दीर्घा से हॉल में कूद जाते हैं, इस संकेत को क्या कहा जाए? मोदी और उनकी पूरी सरकार पिछले दो महीने से पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के प्रचार में व्यस्त है। जब चुनाव के नतीजे घोषित हुए, तो राजा और उनकी टीम जीत के जश्न में मग्न हो गई। बाद में मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति और शपथ ग्रहण के राजनीतिक जश्न के रंग में सराबोर रही ऐसे में पांच बेरोजगार युवक संसद में घुस गए और सरकार की बेइज्जती कर दी। ये युवक ‘भारत माता की जय’, ‘संविधान की रक्षा करो’, ‘बेरोजगारों को न्याय दो’ जैसे नारे लगा रहे थे। लोकसभा अध्यक्ष श्री बिड़ला कहते हैं, ‘यह सनसनी फैलाकर और प्रसिद्धि पाने का एक तरीका है। इसे ज्यादा गंभीरता से न लें।’ श्रीमान बिड़ला जी, इन युवाओं के हाथ में सिर्फ स्मोक बम थे तो अच्छा हुआ! क्या २००१ की तरह बम, एके-४७ होना चाहिए था? क्या तब जाकर आपको यह मामला गंभीरता से लेने लायक लगता? चार युवा इस देश के नागरिक हैं। उनमें से एक नीलम हरियाणा से है। अमोल शिंदे महाराष्ट्र के लातूर से है। महंगाई और बेरोजगारी से तंग आकर उन्होंने यह रास्ता अख्तियार किया। मोदी ने हर साल दो करोड़ नौकरियों की ‘गारंटी’ दी थी। अगर उस गारंटी पर अमल किया गया होता तो अमोल शिंदे पर इतने उग्र आंदोलन की नौबत नहीं आती। यदि किसानों की आय दोगुनी करने की मोदी की गारंटी लागू होती तो हरियाणा की उच्च शिक्षित नीलम आजाद को संसद के बाहर ‘राड़ा’ करने की दुर्बुद्धि नहीं सूझती। पूरे देश में युवाओं में निराशा है और बेरोजगारों को रामलला के मुफ्त दर्शन कराने से यह निराशा दूर नहीं होगी। पिछले चार महीनों में महाराष्ट्र में ३,००० से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। अब अमोल शिंदे जैसे युवा ने भी एक तरह से आत्महत्या ही कर ली है क्योंकि सरकार ने उसे आतंकवादी करार देते हुए आतंकवाद विरोधी धाराओं के तहत गिरफ्तार कर लिया है। इसलिए उन चारों की किस्मत में ताउम्र जेल में रहना लिखा है। मोदी सरकार और उनकी पार्टी के चुनाव मग्न रहने का खामियाजा देश भुगत रहा है। अब सवाल आता है नई संसद की सुरक्षा व्यवस्था का। हजारों सुरक्षाकर्मियों, सैकड़ों सीसीटीवी कैमरे, स्कैनर, बॉडी सर्च सिस्टम के बावजूद, दो युवक स्मोक बम के साथ अंदर दाखिल हुए। इन दोनों को भाजपा सांसद की सिफारिश पर अंदर जाने का ‘पास’ मिला। इसलिए इस मामले में पूरी भाजपा के मुंह पर ताला लगा हुआ है। अगर वही सांसद विपक्षी पार्टी का होता और मुस्लिम होता तो भाजपा देशभर में ‘हिंदू खतरे में’, ‘देश खतरे में’ का एलान करते हुए २०२४ के प्रचार अभियान का श्रीगणेश कर देती। अगर पांचों युवकों में से कोई भी मुस्लिम होता तो मोदी-शाह को मारने की इस्लामिक देशों की साजिश का शंख बजाते हुए देश का माहौल गर्म कर देती। लेकिन ‘पास’ देनेवाले सांसद के भाजपाई होने व संसद घुसपैठियों के भी हिंदू होने की वजह से कार्यक्रम में रंग नहीं चढ़ पाया। देश का माहौल भी ऐसे अजीब मोड़ पर खड़ा है। यह धारणा झूठी साबित हुई है कि देश सुरक्षित है। चीन लद्दाख की भूमि में घुस चुका है, पाकिस्तानी आतंकवादी कश्मीर में घुसकर सैनिकों का खून बहा रहे हैं, मणिपुर हिंसा में चीन और म्यांमार का हाथ है और अब पांच बिना चेहरे वाले ‘भारतीय’ युवा संसद में घुस गए हैं। सब कुछ ‘रामभरोसे’ चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी और उसकी सुरक्षा नीतियों की पोल खुल गई है। दो युवक स्मोक बम लेकर संसद व हॉल में घुस गए और दो ने संसद के बाहर हल्ला बोल दिया। अब क्या इस हमले के लिए पंडित नेहरू और कांग्रेस की नीति जिम्मेदार है? गृहमंत्री अमित शाह को संसद में आकर एक बार घोषणा कर देनी चाहिए कि कल के हमले के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं। देश की शीर्ष सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर संसद पर हुए ‘स्मोक’ हमले की जांच अब चल रही है। क्या इस जांच के लिए ‘ईडी’, ‘इनकम टैक्स’ के अधिकारी जिम्मेदार हैं? गृहमंत्री महोदय, देश की सुरक्षा, संविधान, कानून-व्यवस्था सबका सत्यानाश हो गया है। राजा तीन राज्यों की जीत में मगन है, लेकिन जनता बेरोजगारी, महंगाई से त्रस्त है। विद्रोही युवाओं ने सांसदों के सदन में भावनाओं का विस्फोट कर दिया। वे रास्ता भटक गए। उन्हें देश की सुरक्षा और संसद की गरिमा से खिलवाड़ नहीं करना चाहिए था।

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