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संपादकीय: सीना जोरी…!

चो री, उस पर सीना जोरी का मतलब क्या होता है यह हमें आज की भारतीय जनता पार्टी से सीखना चाहिए। कौन हैं जिनकी भाषा मनोज जरांगे पाटील बोल रहे हैं? इतने दिनों के बाद देवेंद्र फडणवीस और उनकी भाजपा की टोली के मन में यह सवाल उठ रहा है और इस टोली ने एक अफलातून खोज भी की है कि जरांगे की भाषा ठाकरे-पवार की भाषा है। जब भी कोई मामला सिर पर आता है तो भाजपा हमेशा उससे दूर रहने की कोशिश करती है। जरांगे पाटील के मामले में भी ऐसा ही हुआ है। क्या मराठों को दिया गया मौजूदा १० फीसदी आरक्षण कायम रहेगा? अगर वह आरक्षण नहीं टिकता, तो सरकार द्वारा समाज को धोखा दिया जा रहा है, ऐसा जरांगे पाटील का कहना है। उनका कहना है कि मराठों को ‘ओबीसी’ आरक्षण दिया जाना चाहिए और सरकार कहती है कि यह संभव नहीं है। किसी की थाली से निकालकर मराठों का आरक्षण नहीं चाहिए, बल्कि किसी के अधिकार, आरक्षण को छुए बिना मराठों को आरक्षण दो, ये भूमिका सबकी होनी चाहिए। महाराष्ट्र के सभी समाजों में सद्भावना होनी चाहिए। यदि गांवों में जाति विरुद्ध जाति संघर्ष होगा तो महाराष्ट्र की एकता में दरार आ जाएगी। ऐसा नहीं होना चाहिए। जरांगे ने १० फीसदी आरक्षण को लेकर फडणवीस पर जिस भाषा का इस्तेमाल किया वह उचित नहीं है। फडणवीस राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं और उनके मामले में भाषा का इस्तेमाल मर्यादा में रहकर करना चाहिए। जरांगे ग्रामीण इलाके से हैं और उन्होंने अंतरवाली साराटी के बाहर की दुनिया नहीं देखी है, बोलते वक्त उनका तोल बिगड़ जाता है। दूसरे, लगातार उपवास करने से पूरे शरीर और दिमाग पर भी असर पड़ता है, लेकिन फिर भी वरिष्ठ नेताओं के मामले में एकल उल्लेख (तू तड़ाक), अभद्र भाषा उचित नहीं है। एकल उल्लेख और धमकी भरी भाषा यही अगर जरांगे को अपराधी ठहराने की वजह है तो भाजपा के फडणवीस गुट के कई लोग जरांगे से भी निचले दर्जे की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्री नारायण तातू राणे और उनके गिरोह भाजपा में हैं। जब नारायण तातू राणे ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ हाथ उठाने की भाषा की तो पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। यहां तक ​​कि राणे के पिल्ले भी इनको-उनको मारने की बात करते हैं और गृहमंत्री फडणवीस को वह अपने गिरोह का ‘बॉस’ बताते हैं। तो जरांगे किसकी भाषा बोलते हैं? इसे खोजते समय इन ‘तातू’ पिल्लों के भाषाई मालिक का पता लगाना चाहिए। कानून का शासन सबके लिए समान ही होना चाहिए। जरांगे के आंदोलन को हवा देनेवाले और भूख हड़ताल स्थल पर उन्हें सरकारी संदेश देनेवाले कौन थे? यदि इसकी जांच ‘फोन टैपिंग’ फेम पुलिस महानिदेशक रश्मि शुक्ला से कराई जाए तो वास्तविक जानकारी गृहमंत्री तक पहुंच जाएगी। जब जरांगे के आंदोलन की चिंगारी भड़की तो फडणवीस सरकार में छगन भुजबल की भाषा एक मंत्री को शोभा देनेवाली नहीं थी। ‘मैंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। सरकार स्वीकार नहीं करती, मैं क्या करूं?’ ऐसा भुजबल कहते थे। इसलिए बिना सोचे-समझे बयान देनेवाले सिर्फ जरांगे ही नहीं, बल्कि सरकार में बैठे लोग भी हैं, लेकिन मामले दर्ज किए गए जरांगे और एक हजार मराठा कार्यकर्ताओं के खिलाफ। अब आखिर महाराष्ट्र की तस्वीर क्या है? जरांगे मुंबई जा रहे थे। उन्हें पुलिस ने रोका। जरांगे तो पीछे हट गए, लेकिन मराठवाड़ा में संभाजीनगर, बीड, जालना जिलों की सीमाएं सील कर दी गईं और वहां इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। कश्मीर घाटी, मणिपुर में इंटरनेट सेवा बंद है अब इसमें महाराष्ट्र भी जुड़ गया है। ये हुक्मरानों की नाकामी है। राज्य के कुछ हिस्सों में तनाव है। हिंसा की घटनाएं हो रही हैं। कुछ इलाकों में कर्फ्यू है। जरांगे पीछे हट गए और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया है इसलिए उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है। इस तरह जरांगे का करेक्ट कार्यक्रम शिंदे-फडणवीस सरकार ने किया और इसकी घोषणा खुद मुख्यमंत्री शिंदे ने की। मनोज जरांगे के आंदोलन को समय रहते रोका जा सकता था, लेकिन सरकार का ‘इंटरेस्ट’ कुछ और अलग तरीके का था। सरकार राज्य में मराठों और ओबीसी के बीच बखेड़ा निर्माण कर राज्य में फूट डालना चाहती थी। उन्हें माहौल को भड़काकर राजनीतिक रोटी सेंकनी थी और सरकार ने वह करेक्ट कार्यक्रम किया भी। अब जरांगे को जैसे का तैसा जवाब देने के लिए भाजपा के विधायकों को तैयार किया गया। अब जैसे को तैसा जवाब देने का मतलब क्या? भाजपा की टोली को ऐसा नहीं लगता कि महाराष्ट्र में शांति होनी चाहिए? जरांगे के भाषाई मालिक जो कोई होंगे वो होंगे ही, लेकिन जरांगे को प्रोत्साहन देनेवाले और आंदोलन को हवा भरने वाले ‘हवाबाण हरडे’ फडणवीस के बगल के ही हैं। यूं ही दूसरों पर उंगली क्यों उठा रहे हो? शिवसेना कभी भी दूसरों के भाड़े के कंधों का इस्तेमाल करने का खेल नहीं खेलती। आज की भाजपा ऐसे खेलों में पारंगत है। भाजपा नेताओं ने एक अहम सवाल पूछा है कि जरांगे के आंदोलन के लिए पैसा कहां से आता है? इसका जवाब आम जनता के मन में यही है कि ‘महाराष्ट्र में विधायक-सांसद खरीदने के लिए पैसे जहां से आते हैं, वहीं से वे भी आ रहे होंगे।’ भाजपा सेठों की पार्टी है और साहूकारी ही उनका धंधा है। इसलिए इस साहूकार की भी एस.आई.टी. जांच होने दीजिए! जरांगे और उनके आंदोलन के मामले में भाजपा का चोरी, उस पर सीना जोरी वाला शोर जारी है। चोरों को चोर कहने पर गुस्सा आता है।

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