मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय : शिंदे को बल मिले! तबीयत क्यों बिगड़ी?

संपादकीय : शिंदे को बल मिले! तबीयत क्यों बिगड़ी?

बीते दो महीनों से महाराष्ट्र का राजनीतिक स्वास्थ्य बिगड़ गया था, परंतु जिन बागियों अथवा विश्वासघातियों के ‘डायरिया’ के कारण राज्य का स्वास्थ्य खराब हुआ उन मुख्यमंत्री शिंदे के ही बीमार पड़ने की खबर अलीबाबा और चालीस चोरों के लिए चिंताजनक है। मनुष्य, प्राणी व उनका शरीर एक यंत्र है। इसमें बीच-बीच में खराबी होगी ही, लेकिन शिंदे करीब २० से २२ घंटे सोये बगैर काम करते हैं। उनमें काम को लेकर उत्साह और गजब का जोश है। कोई भी वायरस उनके इर्द-गिर्द नहीं फटकता। इसके बावजूद मुख्यमंत्री शिंदे बीमार पड़े यह उनके ‘चालीस’ लोगों के लिए चिंता की बात है। शिंदे निश्चित तौर पर किस रोग से ग्रस्त हैं, ये उन्हें ही पता नहीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय में फिलहाल जो घटनाक्रम चल रहा है, उसकी वजह से कई लोगों को विविध रोगों ने जकड़ लिया है। शिंदे और उनके चालीस विधायकों ने शिवसेना को त्याग कर अपना स्वतंत्र गुट बना लिया। लेकिन ‘हमारी ही शिवसेना असली’ ऐसा दावा उन्होंने किया। यह मनोरंजन का हिस्सा है। कल शिंदे और उनके लोग ग्वालियर जाएंगे और जिवाजीराजे सिंधिया की तमाम संपत्ति पर दावा करेंगे। ‘आप कहां के शिंदे? आप कैसे  सरदार? तुमने ऐसी कौन-सी मर्दानगी दिखाई? मैं ही असली शिंदे। इसलिए ग्वालियर का राजा मैं ही हूं!’ ऐसा दावा करने में भी ये लोग पीछे नहीं हटेंगे और उनकी मानसिक अवस्था को देखते हुए वे ऐसा दावा कर सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने शिंदे गुट से बेहद तीखे सवाल पूछे हैं कि ‘आप बागी नहीं तो निश्चित तौर पर कौन हैं?’ न्यायालय ने उन्हें और एक सवाल पूछा, ‘पार्टी का नेता मिलता नहीं इसलिए नई पार्टी स्थापित कर सकते हैं क्या?’ इन दोनों सवालों का जवाब महाराष्ट्र की जनता जानती है। मुख्यमंत्री के पद की लालसा और ईडी वगैरह की कार्रवाई से खुद को बचाने के लिए शिंदे और उनकी टोली ने विश्वासघात किया। विधान मंडल में पार्टी तोड़ी मतलब पूरी पार्टी टूट गई, ऐसा नहीं है। शिंदे गुट के समक्ष कानूनन दो ही विकल्प हैं। एक तो वे सभी लोग इस्तीफा दें और फिर चुनाव लड़ें। दूसरा मतलब यह बागी गुट किसी अन्य पार्टी में विलीन हो जाए, ऐसा पेच शिंदे के समक्ष मौजूद है। इसके लिए उनके गुट के कितने विधायक मंजूरी देते हैं, ये भी सवाल ही है। उस पर मंत्री पद के लिए उनके गुट में मारामारी होगी, यह भी खुला सत्य है। इसलिए नई औषधि और उपचार के लिए शिंदे बीमार पड़ गए होंगे। शिवसेना का ‘धनुष-बाण’ चिह्न हमें ही मिलेगा व हमारी ही सेना असली है। उनके इस दावे का खोखलापन भी खुल गया है। शिवसेना के धनुष-बाण पर फिलहाल कोई निर्णय न लें, ऐसा निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को दिया। इससे भी कई लोगों को नई बीमारी जकड़ सकती है। एक बात स्वीकार करनी चाहिए, शिवसेना का पक्ष सच्चा है और ५६ वर्षों के जीवन काल में शिवसेना ने विश्वासघात का ऐसा हलाहल कई बार पचाया है। इसलिए प्रहार करनेवालों की तलवारें टूट गयीं , ऐसा इतिहास कहता है। शिंदे और उनके गुट को अब यह दिखने लगा है। हमने बहुत बड़ी क्रांति की, इस भ्रम का कद्दू फुट गया है। अब साथ में खोखे उठानेवाले लोग ही हैं। वे भी कल नहीं रहेंगे। शिवसेना असली बाकी सब धतूरे के बीज हैं, यह स्पष्ट हो गया है। शिवसैनिक, शिवप्रेमी जनता हमारे साथ दृढ़तापूर्वक खड़ी है। उद्धव ठाकरे का राज्यव्यापी दौरा अब शुरू होगा। उसके बाद उड़नेवाली धूल देखकर आज की बीमारी और अधिक गंभीर हो जाएगी और कितना भी जादू-टोना कर लें शिवसेना की लहर कोई रोक नहीं पाएगा। उस पर ८ अगस्त को न्यायालय में सत्य और ईमानदारी की ही जीत होगी। आज भी न्यायालय में कुछ रामशास्त्री हैं और उन्होंने न्याय के तराजू को समतोल रखने का राष्ट्रीय कर्तव्य निभाया है। मूलत: अलीबाबा और चालीस चोरों का पक्ष कानूनन व नीतियों के आधार पर सही होता तो अब तक पूरे मंत्रिमंडल की शपथ विधि हो गई होती। शपथ विधि नहीं व शिंदे-फडणवीस के दिल्ली दौरे चल रहे हैं। गुरुवार को तो मुख्यमंत्री फडणवीस अकेले ही दिल्ली गए। यहां मुख्यमंत्री शिंदे अचानक बीमार पड़ गए। या तो शिंदे को दिल्ली की हवा रास नहीं आ रही है अथवा महाराष्ट्र की हवा के एक बार फिर से बिगड़ जाने से शिंदे को घुटन जैसा महसूस हो रहा होगा। विवाह होने के बाद भी पालना नहीं हिला तो लोग संदेह से देखते हैं और दंपति को तरह-तरह की सलाह देते हैं। शिंदे के मामले में यही हो रहा है। मुख्यमंत्री पद की वरमाला सहर्ष गले में डलवा ली, परंतु मंत्रिमंडल का जन्म नहीं हो रहा है। इसलिए शिंदे-फडणवीस की सुहागरात पर प्रश्नचिह्न निर्माण होने लगा है। पार्टी छोड़ी नहीं तो दल-बदल क्यों? इस सवाल का उत्तर ढूंढ़ने के दौरान शिंदे का दिमाग ठनकता रहेगा और एक दिन उन्हें उसी सिर से अपने बाल नोचते बैठना पड़ेगा। महाराष्ट्र के सत्ता संघर्ष का फैसला अब करीब आ गया है। इस प्रकरण में क्या हुआ कि आपने जल्दबाजी में सुहागरात मनाई, परंतु विवाह करना ही भूल गए! ऐसी शिंदे गुट की अवस्था हो गई है। अब उन्हें मितली हो रही है और गुड़गुड़ी हो रही है। क्रांति की भविष्यवाणी की और अब डर से वमन शुरू हो गया है। शिंदे का स्वास्थ्य बिगड़ गया है। उनके चालीस समर्थकों के लिए यह शुभ शगुन नहीं है। आखिरी सांसें ले रही सरकार के लिए ‘स्ट्रेचर’ व ‘एंबुलेंस’ तैयार रखनी चाहिए। शिंदे जल्द ठीक हो जाएं। उन्हें बहुत कुछ देखना है। ईश्वर उन्हें सब कुछ देखने का बल दे!

अन्य समाचार