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संपादकीय: डूबना निश्चित है, चरम पर तानाशाही!

संसद का शीतकालीन सत्र सिर्फ विपक्षी दलों के सांसदों को ‘निलंबित’ करने के लिए ही शुरू है क्या, ऐसा सवाल अब खड़ा हो गया है। लोकसभा और राज्यसभा इन दोनों सदनों में सरकार आए दिन विपक्षी सांसदों के खिलाफ निलंबन का सोटा चला रही है। मंगलवार को लोकसभा में ४९ विपक्षी सांसदों को निलंबित कर दिया गया, जिसके चलते दोनों सदनों में निलंबित सांसदों की कुल संख्या १४१ पर पहुंच गई। १३ दिसंबर को संसद भवन में दो युवकों द्वारा किए गए ‘स्मोक बम’ हमले पर विपक्ष रोजाना सरकार से जवाब मांग रहा है लेकिन सरकार सवालों का जवाब देने की बजाय जवाब मांगने वाले विपक्षी सांसदों को निलंबित कर रही है। १३ दिसंबर २०२३ की घटना ने सरकार की सुरक्षा व्यवस्था और क्षमता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। लेकिन उस पर भी विपक्षी दल चुप रहे और सरकार से कुछ न पूछे, ऐसी सरकार की अपेक्षा है। दरअसल होना तो यह चाहिए था कि इस धक्कादायक मामले पर अब तक सरकार यानी केंद्रीय गृहमंत्री को स्पष्टीकरण दे देना चाहिए था। क्योंकि देश के सर्वाेच्च सदन की सुरक्षा की धज्जियां उड़ते पूरी दुनिया ने देखा। दुनिया भर में देश का अपमान हुआ है। इसकी जिम्मेदारी के तौर पर सरकार की ओर से क्या कदम उठाए जाएंगे? क्या सरकार इस शर्मनाक घटना की जिम्मेदारी लेगी या नहीं? ऐसे कई सवाल न सिर्फ विपक्षी दलों बल्कि देश के मन में भी लावे की तरह उबल रहे हैं। उनका संतोषजनक निराकरण करना यह सरकार और सत्तारूढ़ दल की जिम्मेदारी है और वह इस जिम्मेदारी को न टालें, यह विपक्षी सांसदों का कर्तव्य है। हालांकि उनकी यह कर्तव्य कठोरता सरकार के लिए मुसीबत बनती जा रही है। इसीलिए उनके निलंबन का रोज एक नया रिकॉर्ड बनाया जा रहा है। इसका मतलब तो यही है कि सरकार विपक्ष के हमले से डरी हुई है। मंगलवार को निलंबित विपक्षी सांसदों की संख्या १४१ तक पहुंच गई। लोकसभा में कुल २२१ विपक्षी सांसदों में से ९५ को निलंबित कर दिया गया है। यानी अब वहां १२६ विपक्षी सांसद हैं। राज्यसभा के २५० में से ४५ सांसदों को निलंबित कर दिया गया है। यानी २०५ सांसद बचे हैं। लेकिन उनमें से १०८ सत्तारूढ़ गठबंधन के हैं। यानी राज्यसभा में भी विपक्षी सांसदों की संख्या घटकर ९७ रह गई है। क्या सरकार चल रहे मौजूदा सत्र में इस आंकड़े को शून्य पर लाना चाहती है? मोदी सरकार के अब तक के प्रदर्शन को देखते हुए यह भी ‘मुमकिन’ है। सत्र की पूर्व संध्या पर ‘लोकतंत्र को विपक्ष की आवश्यकता है’, ऐसा विनम्रतापूर्वक कहनेवाले प्रधानमंत्री लोकसभा और राज्यसभा में रोज हो रहे विपक्षी सांसदों के अन्यायपूर्ण निलंबन पर सुविधानुसार मौन पाले हुए हैं। प्रधानमंत्री ने उम्मीद जताई थी कि विपक्ष संसद पर स्मोक हमले पर राजनीति न करें, लेकिन अब जो आप हर दिन विपक्षी सांसद को निलंबित कर रहे हैं वह क्या है? वह राजनीति नहीं बल्कि ‘गजकरण’ है। सांसद हमले के मामले में आपकी चारों तरफ से फजीहत हुई है और यह आपके विफलता का कबूल नामा ही है। इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय से जवाब मांगना विपक्षी सांसदों को लोकतंत्र द्वारा दिया गया ङ अधिकार है। लेकिन आप खुद भी इस बात का खुलासा नहीं करना चाहते और निलंबन के जरिए इसकी मांग करने वाले विपक्षी सांसदों की आवाज बंद कर देते हैं। इस कार्रवाई को संसद की प्रतिष्ठा का मुलम्मा ओढाने का काम यह सरकार कर रही है। बाईस साल पहले १३ दिसंबर को पुरानी संसद पर हुआ हमला एक आतंकवादी हमला था। अब नए संसद भवन पर हमला बेरोजगारी, महंगाई के खिलाफ युवाओं का ‘विद्रोह’ था। विपक्षी दल सदन में सरकार से जवाब की मांग कर रहे हैं। वे अपना कर्तव्य और दायित्व निभा रहे हैं। सरकार का भी कर्तव्य है कि वह देश के सामने तथ्य रखे और संसद पर ‘स्मोक हमले’ के संबंध में सभी प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर दे। लेकिन केंद्र की कुटिल सरकार अपने इस कर्तव्य से ही भाग रही है और विपक्षी सांसदों को निलंबित कर उन्हें अपना कर्तव्य निभाने से रोक रही है। उनकी आवाज दबा रही है। अब ये भी बता ही दीजिए कि आप बाकी विपक्षी सांसदों को कितने दिनों में निलंबित करेंगे। यानी कि बाकी सत्र में न तो सामने से कोई सवाल होगा और न ही सरकार पर जवाब देने की नौबत आएगी ! वर्तमान केंद्र सरकार का राजकाज कुछ ऐसा है कि देश में केवल ‘अंधभक्त’ हों और संसद में केवल ‘भक्त’ ही रहें। इसीलिए विपक्षी सांसदों को एकसाथ निलंबित किया जा रहा है। लेकिन इससे आपकी जो आबरू चली गई है वह छिपेगी नहीं। ङ इसके विपरीत, आप जिस दलदल में फंस गए हो वहां पर डूबना निश्चित है। विपक्षी सांसदों का एकमुश्त निलंबन मोदी सरकार के एकतरफा और तानाशाही शासन का चरम है। यह ९ साल के अघोषित आपातकाल की पराकाष्ठा है, मीनार है। ध्यान रखें कि २०२४ में जनता ही आपके सतांध राज को उखाड़ फेंकेगी, ‘मीनार’ को उखाड़ कर रख देगी और इस देश में एक बार फिर से लोकतंत्र की पुनस्र्थापना करेगी।

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