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संपादकीय: स्वतंत्रता में ‘पराधीनता’

आज देश का स्वतंत्रता दिवस हमेशा की तरह उत्साहपूर्वक मनाया जाएगा। इसे उत्साहपूर्वक ही मनाना चाहिए। क्योंकि हजारों ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों, क्रांतिकारियों के बलिदान से, त्याग से अपना देश आजाद हुआ है। पिछले वर्ष आजादी का ‘अमृत महोत्सव’ देश-विदेश में बड़े उत्साह के साथ मनाया गया था। अर्थात केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर यह उत्साह इस तरह मनाया, जैसे कि वर्तमान सत्ता पक्ष ने ही देश की स्वतंत्रता की लड़ाई अकेले के दम पर जीती हो और उसके बाद के ७५ वर्षों में उनकी वजह से ही देश प्रगति कर इस ऊंचाई पर पहुंचा। गत वर्ष की तरह ही इस साल भी स्वतंत्रता दिवस पर विभिन्न अभियान चलाए गए। ‘हर घर तिरंगा’ और ‘मेरी माटी-मेरा देश’ इन अभियानों की घोषणा की गई। ‘मिट्टी को नमन, वीरों को वंदन’ इस नारे के साथ ‘मेरी माटी-मेरा देश’ यह अभियान ९ अगस्त से देशभर में चलाया गया। प्रशासनिक अधिकारियों-कर्मचारियों को ‘पंचप्रण शपथ’ लेनी थी और मिट्टी का दीया हाथ में लेकर ‘सेल्फी’ को संबंधित वेबसाइट पर अपलोड करना, ऐसा इसका स्वरूप था। इस अभियान के पीछे देशभक्ति की भावना जागृत हो यही इसका उद्देश्य है, ऐसा सरकार का कहना है। यह सही होगा भी और यह अभियान अच्छे ही हैं, लेकिन क्या इसी तरह सरकार चलानेवालों का कामकाज भी इतना ही सच्चा और शुद्ध है? यह सरकार सत्ता में आई, तभी से अर्थात २०१४ से ही इस सरकार का चेहरा अलग और मुखौटा अलग है। अलग-अलग ‘मुखौटे’ पहनकर देशभक्त दिखाने हैं और फिर उसी मुखौटे की आड़ में छिपकर अपनी तानाशाही चलानी है। एक ओर आजादी का नारा देना और दूसरी ओर इसी आजादी का गला घोंटना। स्वतंत्रता और लोकतंत्र के बारे में बस मुंह से बोलना, जबकि काम दमनशाही और निरंकुश दबाव तंत्र वाला। साम, दाम, दंड, भेद इन नीतियों का जितना निरंकुश इस्तेमाल पिछले नौ वर्षों में देश में हुआ है, उतना कभी भी नहीं हुआ था। केंद्रीय जांच एजेंसियों के माध्यम से राजनैतिक गुलामी लादी जा रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति में सभी धर्म, जाति, पंथ का महत्वपूर्ण योगदान था। लेकिन इस योगदान पर भी मोदी सरकार की ‘सांस्कृतिक टिड्डी दल’ हमला कर रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न नेताओं की आलोचना करने का विषैला प्रयोग सरकारी कृपा से विभिन्न राज्यों में शुरू है। महाराष्ट्र जैसा प्रगतिशील राज्य भी इससे अछूता नहीं रहा। देश के इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। पाठ्यक्रमों में वैचारिक घुसपैठ करके सांस्कृतिक एकता भंग की जा रही है। मतों के ध्रुवीकरण के लिए धार्मिक समरसता पर ‘बुलडोजर’ चलाया जा रहा है। सर्वधर्म स्वतंत्रता यह देश की आत्मा है और संविधान द्वारा प्रदान किया गया मूलभूत अधिकार है। यह देशजीवन का मूलमंत्र है। लेकिन शासकों के नकली हिंदुत्व के नीचे सभी धर्मों की स्वतंत्रता को कुचलने का खतरा निर्माण हो गया है। केंद्रीय जांच एजेंसियां हों या अन्य संवैधानिक संस्थाएं, कहने को ‘स्वतंत्र’ और ‘स्वायत्त’ होंगी लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद से इन्हें भी हुक्म का गुलाम बनाने का प्रयास किया जा रहा है। नोटबंदी लादकर और सरकारी बैंक व अन्य सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करके आम जनता को पराधीनता की ओर धकेला जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन कर बहुमत के आधार पर नए कानून बनाए जा रहे हैं और यहां की संघीय व्यवस्था के ढांचे को तोड़ने की साजिश की जा रही है। एक ओर वे ब्रिटिश कानूनों के जुआठ उतार फेंककर नए ‘संप्रभु’ कानून लाने का ढोल पीटना और दूसरी ओर स्वतंत्र हिंदुस्थान के कानूनों तथा नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति झिझकना। देश की यह तस्वीर चिंताजनक है। हिंदुस्थान यह एक स्वतंत्र और संप्रभु देश है ही, लेकिन हिंदुस्थानी संविधान और लोकतंत्र द्वारा नागरिकों को दिया गया अधिकार, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाकर देश में नई गुलामी की शुरुआत करने की साजिश पिछले ९ वर्षों से चल रही है। स्वतंत्रता की इस ‘पराधीनता’ को उलटने की कसम लोगों को आज के स्वतंत्रता दिवस को साक्षी मानकर लेनी चाहिए।

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