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संपादकीय: टाटा अर्थात विश्वास! दूसरों का क्या?

विश्वासराव पानीपत में मारे गए या खो गए, इसे लेकर इतिहास को आज भी कुरेदा जाता है। लेकिन देश और महाराष्ट्र का राजनीति से विश्वास उठ गया है। अब राजनीति झूठ और अविश्वास के सहारे खड़ी है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक सभी रोज झूठ बोल रहे हैं। ऐसे झूठ भरे माहौल में महाराष्ट्र सरकार ने उद्योगपति रतन टाटा को ‘उद्योगरत्न’ पुरस्कार से सम्मानित किया। यह पुरस्कार मुख्यमंत्री शिंदे के हाथों प्रदान किया गया और देवेंद्र फडणवीस व अजीत पवार जैसे लोग इस समारोह में मौजूद थे। इस कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री शिंदे ने कहा, ‘टाटा अर्थात ट्रस्ट। टाटा अर्थात विश्वास।’ सवाल यह उठता है कि ऐसे विश्वासपात्र व्यक्ति को पुरस्कार देनेवाले ने ही ‘विश्वास’ शब्द की हत्या की है। अजीत पवार, शिंदे, केसरकर, उद्योगमंत्री सामंत ने तो ‘विश्वास’ शब्द को ही समाप्त कर दिया और वह टाटा के माध्यम से ‘ट्रस्ट’, ‘विश्वास’ जैसे शब्दों का महिमामंडन कर रहे हैं। टाटा अर्थात ट्रस्ट। ऐसे में जिनके हाथों यह पुरस्कार दिया गया, क्या सही में वह टाटा को पुरस्कार प्रदान करने के काबिल हैं? राष्ट्र को बनाने में टाटा का योगदान बहुत बड़ा है। नमक से लेकर हवाई जहाज तक के उद्योग में टाटा हैं। टाटा ने महाराष्ट्र को कर्मभूमि माना और संपूर्ण देश में उद्योग का विस्तार किया। भारतीय उद्योग की नींव टाटा ने रखी है तो वह सिर्फ विश्वास के बल पर। देश को लूटकर और राजनेताओं की जी-हुजूरी करके उन्होंने अपना उद्योग साम्राज्य नहीं बढ़ाया। ‘पहले देश, फिर मुनाफा’ यह उनका मूलमंत्र है। इसीलिए अन्य उद्योगों की तरह चारसौबीसी करने की नौबत उन पर कभी नहीं आई। टाटा अर्थात विश्वास। टाटा का उत्पाद ग्राहकों की पहली पसंद रहती है। क्योंकि टाटा ने निष्ठा कभी नहीं बदली। वहीं देश की राजनीति की क्या स्थिति हो गई? आज राजनीति धोखाधड़ी का उद्योग बन गई है। टाटा के उद्योगों पर कभी छापा नहीं पड़ा, लेकिन टाटा को जिनके हाथों पुरस्कार मिला, उन महानुभावों के उद्योग पर छापा पड़ने के कारण विश्वास की ऐसी की तैसी कर इन सभी ने दल-बदल किया और अब टाटा को पुरस्कार देने के लिए आगे आए। टाटा का मुंबई-महाराष्ट्र के साथ एक भावनात्मक रिश्ता है। टाटा के पूर्वजों ने मुंबई में कई सामाजिक, मेडिकल संस्थान खड़े किए। राष्ट्रीय आपदाओं के दौरान टाटा ने खुले हाथ से मदद की। कोरोना काल में ‘पीएम केयर्स फंड’ में टाटा ने भारी योगदान दिया, लेकिन इस योगदान का कभी हिसाब-किताब सामने नहीं आया। टाटा ने मुंबई-महाराष्ट्र में उद्योगों की स्थापना की। पुणे स्थित ‘टेल्को’ यह वाहन निर्माण का कारखाना अर्थात भव्य शहर ही है। महाराष्ट्र के आर्थिक कारोबार में टाटा का बहुत कीमती योगदान है, लेकिन किसी ने दबाव डाला इसलिए टाटा अपना उद्योग बंद करके गुजरात ले गए, ऐसा कभी नहीं हुआ है। ‘उद्योगरत्न’ के रूप में टाटा का सम्मान करते समय महाराष्ट्र के फिसलते औद्योगिक क्षेत्र की चिंता शिंदे-पवार-फडणवीस सरकार को हुई क्या? महाराष्ट्र को आर्थिक रूप से कमजोर, खराब करने का कारोबार केंद्र ने चलाया है। महाराष्ट्र के कई उद्योग व आर्थिक कारोबार के केंद्रों को गुजरात में खींचकर ले जाया जा रहा है। महाराष्ट्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था व सहकार क्षेत्र को बर्बाद करने का षड्यंत्र चल रहा है। महाराष्ट्र की लूट शुरू है और इस लूट में मदद करनेवालों के हाथों टाटा को उद्योगरत्न पुरस्कार दिया गया। टाटा अर्थात विश्वास यह बतानेवालों ने ही जनमानस के बीच से अपना विश्वास गवां दिया है। पवार-शिंदे-फडणवीस यह अब जनता के विश्वास के पात्र कहलानेवाले नेतृत्व नहीं रह गए हैं। अविश्वास का जुगाड़ कर सत्ता पर आई हुई तिकड़ी हैं। रतन टाटा कभी दुनिया के झूठे दिखावे पर विश्वास नहीं करते। वे सादा जीवन जीते हैं, वे उच्च विचार के शालीन व्यक्तित्व हैं। रतन टाटा कहते हैं कि व्यवसाय का मतलब मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझना है। यही मूलमंत्र टाटा आज भी जप रहे हैं। उन्हें उद्योग में चोरी करके फायदा नहीं चाहिए, लेकिन उन्हें पुरस्कार देनेवालों का क्या? उनके हाथ चोरी-लूट में लिप्त होने के कारण उन्होंने विश्वास नष्ट करके दल-बदल किया। सत्ता यह लूटमारी करनेवाले बदमाशों का अंतिम अड्डा बन गया है। ऐसे लोगों के हाथों में रतन टाटा जैसे विश्वसनीय लोगों को पुरस्कार स्वीकार करना पड़ता है, इसे दुर्देव ही कहना पड़ेगा।

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