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संपादकीय : रणभूमि तैयार है! …चलो शिवतीर्थ!

आज विजयादशमी! बेहद ही बड़ा आनंद और मांगलिक पर्व। साढ़े तीन मुहूर्त में से एक। हालांकि इस पवित्र मुहूर्त को कुछ दुष्ट लोगों ने महाराष्ट्र, मराठी एकजुटता को तोड़ने के लिए चुना है। हिंदुत्व की वङ्कामूठ शिवसेना को कमजोर करने के लिए कुछ लोगों ने आज का मुहूर्त चुना है, फिर भी शिवसेना यह कमजोर लोगों का संगठन नहीं है। शिवसेना यानी महाराष्ट्र की शिवशक्ति है। यह शिवशक्ति पिछले ५६ वर्षों से शिवतीर्थ पर सीमोल्लंघन के लिए उफान लेती रहती है। कई लहरें और कपट-साजिश को टक्कर देते हुए शिवतीर्थ पर ये सीमोल्लंघन शुरू ही रहा है। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने दशहरे का ही दिन क्यों चुना? उसका विशेष महत्व है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने इसी दिन दसमुख वाले रावण का वध किया था। देवी दुर्गा ने दस दिन के घनघोर युद्ध के बाद इसी दिन महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसी दिन सभी अमांगलिक बातों, कपट-साजिश का नाश होता है इसलिए विजयादशमी को हमारी हिंदू संस्कृति में विशेष महत्व है। इस बार का दशहरा भी ऐसे रावणों, महिषासुरों का नाश करेगा। आज के दिन रावण मारा गया। रावण ने खुद को देवता समझने की बड़ी भूल की थी। उसी अहंकार ने उसकी बलि ले ली। महाराष्ट्र और देश में वर्तमान में अहंकार का बवंडर मंडरा रहा है। महाराष्ट्र में आज सब कुछ बिखरा हुआ है। एक राज्य गया और दूसरा आया यानी सब कुछ ठीक हो गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता। बहुमत वाली सरकार को पैसा और धमकी देकर गिराना यह पुणे के चांदनी चौक के पुल गिराने जैसा सहज है। ऐसा कुछ लोगों को लगता है। लेकिन महाराष्ट्र की नई सरकार महाराष्ट्र को तबाह करने के लिए ही बनी है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले ने पद पर बैठते ही घोषित किया, ‘उचित समय आते ही विदर्भ को स्वतंत्र राज्य करेंगे।’ यानी देश के अन्य नए राज्य निर्माण होंगे तब विदर्भ को नोचेंगे, ऐसा मंसूबा भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष का है और उस पर सत्ता में बैठा ‘मिंधे’ गुट चुप बैठा है। महाराष्ट्र की अखंडता, महाराष्ट्र से मुंबई की नाल तोड़नी होगी तो पहले शिवसेना की वङ्कामूठ तोड़नी होगी। इसके सिवाय महाराष्ट्र से मुंबई को नोचा नहीं जा सकता। यह पता होने के कारण ही एक निर्धारित साजिश के तहत मुंबई-महाराष्ट्र की घटना तेजी से घट रही है। महाराष्ट्र के उद्योग खींचकर-भगाकर गुजरात ले जाया जा रहा है। एक ‘वेदांता’ ही नहीं तो ‘ड्रग्स पार्क’ से लेकर कई परियोजनाएं उद्योगपतियों को बहला-फुसलाकर लालच देकर ले जाना, इसे कौन-सा लक्षण माना जाए? महाराष्ट्र के युवाओं का लगभग पांच लाख रोजगार इससे डूब गया। प्रधानमंत्री मोदी इस समय गुजरात के चुनाव में फंसे हुए हैं। इसलिए उन्हें गुजरात के अलावा कुछ नहीं दिख रहा। गुजरात को बदनाम करने और इस राज्य में आ रहे निवेश को रोकने का षड्यंत्र कुछ लोगों ने रचा है, ऐसा बयान हमारे प्रधानमंत्री करें, इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा। वे पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं। वे जितना गुजरात के हैं उतना महाराष्ट्र के भी हैं। हम इस सिद्धांत का पालन करते हैं। गुजरात के ‘शाह’ मुंबई को कब्जे में करने की भाषा बोलते हैं। उससे पहले शिवसेना को ‘पटक देंगे’ जैसी झुंडशाही भाषा वे बोलते थे। इस ‘पटक’बाजी को ‘दफन’ करके शिवसेना आज खड़ी है। गुजरात से हमारा झगड़ा नहीं है। गुजरात महाराष्ट्र का जुड़वां भाई है। सवा सौ वर्ष पहले नर्मदा शंकर नाम के कवि हुए थे। उन्होंने ‘जय जय गर्वी गुजरात’ काव्य लिखा। यह उचित है। उस ‘गर्वी गुजरात’ का संरक्षण ‘बाबरी’ दंगे के बाद शिवसेना ने किया। एक हिंदुत्व के तौर पर शिवसेना ने अपने कर्तव्य को पूरा किया। लेकिन उस भाई के सिर में विष घोलने का काम पिछले कुछ समय से चल रहा है। वह महाराष्ट्र और गुजरात के लिए ही नहीं, बल्कि देश के लिए भी खतरनाक है, इसे दिल्लीश्वरों को ध्यान रखना चाहिए। पूरे देश का माहौल एक दबाव और तनाव में है। ‘पीएफआई’ जैसे आतंकवादी विचारों के संगठनों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, यह अच्छा है। इस तरह के विषधारियों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। ऐसी कार्रवाइयां राष्ट्रहित के लिए जरूरी होती हैं। लेकिन कश्मीर घाटी का आतंकवाद जैसे थे वैसा ही है। वहां के कश्मीरी पंडितों का आक्रोश दिल्ली को बेचैन नहीं कर पाया इसका दुख है। ‘पीएफआई’ से भी भयंकर आतंकवाद ‘ईडी’, ‘सीबीआई’ जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों ने चला रखा है। राजनीतिक विरोधियों की आवाज दबाने के लिए इन एजेंसियों का गैर इस्तेमाल किया जा रहा है, तब देश में कानून का राज है, ऐसा कतई कहा नहीं जा सकता। राजनीतिक विरोधी भयग्रस्त रहें, यह लोकतंत्र के लक्षण नहीं हैं। वहां रूस के पुतिन ने युद्ध करके यूक्रेन के तीन प्रांतों को रूस से मिला लिया है और हमारे यहां पाक अधिकृत कश्मीर को हासिल करके अखंड हिंदुस्थान का निर्माण करने की केवल बातें ही शुरू हैं। बातों और आश्वासनों के अलावा लोगों के नसीब में दूसरा कुछ दिखाई नहीं दे रहा। रुपए की कीमत मिट्टी में मिल गई, महंगाई बढ़ी, बेरोजगारी बढ़ ही रही है, किसान आत्महत्याएं कर ही रहे हैं और उसका समाधान क्या तो इसके आगे ‘हैलो’ बोलने की बजाय ‘वंदे मातरम’ बोलें! यह मातृभूमि हमारी ही है। इस मातृभूमि के आगे हम सदैव नतमस्तक हैं। लेकिन यह भूमि सही अर्थों में सुजलाम-सुफलाम कब होगी? चीन केवल लद्दाख की सीमा पर ही नहीं, तो अरुणाचल में भी घुस गया है। उसे सबक कब सिखाएंगे? ‘वंदे मातरम’ का यही सही अर्थ है। महाराष्ट्र को तोड़कर, कमजोर करके ‘वंदे मातरम’ की गर्जना वैâसे की जा सकती है? आज महाराष्ट्र में पूरी तरह से गैर कानूनी सरकार को सत्ता पर लादा गया है। शिवसेना जैसे कट्टर हिंदुत्ववादी, महाराष्ट्र स्वाभिमानी संगठन को तोड़ डालना और उसके लिए गद्दारों को बल देना इसी हेतु से सभी राजनीति चल रही है। मुंबई उन्हें जीतना नहीं, बल्कि निगलना है। उनकी भाषा वैसी ही है। सेनापति बापट ने एक मराठी में मंत्र दिया था-
‘महाराष्ट्र मेले तरी राष्ट्र मेले
मराठ्याविना राष्ट्रगाडा न चाले…’
इस काव्य में थोड़ा बदलाव करके प्रबोधनकार ठाकरे ने कहा था-
‘महाराष्ट्र मेले तरी राष्ट्र मेले
मुंबई गेली तरी महाराष्ट्र मेला!!’
आज भाजपा के कदम उसी दिशा में पड़ रहे हैं। दशहरा सम्मेलन के लिए शिवसेना को शिवाजी पार्क यानी बालासाहेब का शिवतीर्थ न मिले इसके लिए साजिश रची गई। आखिरकार, न्यायालय ने न्याय दिया। जिस शिवाजी पार्क से शिवसेनाप्रमुख ने हिंदुत्व, मराठी अस्मिता का बिगुल फूंका, महाराष्ट्र को जगाया, एक शक्तिशाली संगठन खड़ा किया। उसी शिवतीर्थ पर शिवसेना विरुद्ध मराठी लोगों को लड़ाने का पाप भाजपा की कमलाबाई ने किया। हालांकि अब शिवसेना के अगले संघर्ष के नए पर्व की शुरुआत फिर एक बार शिवाजी पार्क की इस रणभूमि से हो रही है। यह बड़े संयोग की बात है क्योंकि महाराष्ट्र का भविष्य जहां निर्माण हुआ वह इसी रण मैदान पर, इसी रण क्षेत्र पर। संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई इसी मैदान पर शुरू हुई और इसी मैदान पर पूरी हुई। शिवसेना के हर बिगुल को बालासाहेब ने इसी मैदान पर फूंका। अब शिवसेना की नई लड़ाई की शुरुआत यहीं से हो रही है। आज शिवतीर्थ पर विचारों का सीमोल्लंघन होगा। किसी को कितना भी अपशकुन करने दो, महाराष्ट्र में शिवसेना का ही भगवा लहराता रहेगा। आज मुंबई पर शिवसेना का राज है। तुम्हारी छाती पर बैठकर फिर मुंबई जीतेंगे ही। अगले चुनाव में कमलाबाई की ऐसी गति होगी कि भाजपा महाराष्ट्र के इतिहास से नष्ट दिखाई देगी। अगली पीढ़ी को पता भी नहीं चलेगा कि भाजपा नाम की एक पार्टी महाराष्ट्र में थी और वह महाराष्ट्र की जड़ों पर आई थी। महाराष्ट्र के कोने-कोने से सच्चा शिवसैनिक चलते, दौड़ते, मिले उस वाहन से शिवतीर्थ की ओर निकला है। रणभूमि तैयार हो रही है। ‘खोके’ वालों का अधर्म इस निष्ठा के आगे वैâसे टिकेगा? जहां धर्म वहां जय! शिवतीर्थ की रणभूमि पर धर्म है! इसलिए जय निश्चित है!
जय हिंद! जय महाराष्ट्र!! वंदे मातरम!!!

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