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संपादकीय : फिर गिरा रुपया …देश की तौहीन!

हमारा देश शीघ्र आर्थिक महाशक्ति के तौर पर पहचाना जाएगा, ऐसी गर्जना केंद्र की सत्ताधारी पार्टी की ओर से बार-बार की जाती है। अगर वास्तव में ऐसा होगा तो उसका स्वागत ही है। हम महाशक्ति बनेंगे तब बनेंगे, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रुपए की जिस तरह से भयानक गिरावट जारी है, इससे देश की प्रतिष्ठा धूल में मिल रही है। ये प्रतिष्ठा और देश की साख बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार क्या कर रही है? आर्थिक महाशक्ति बाद में देखेंगे लेकिन इस समय गिर रहे रुपए को वैâसे संभाला जाए, ये सरकार देशवासियों को बताए। शुक्रवार को तो डॉलर की तुलना में रुपया ८२.३३ के निचले स्तर को छू गया। अमेरिकी डॉलर की तुलना में हिंदुस्थानी रुपए में पिछले साल भर में तकरीबन १० प्रतिशत की गिरावट आई है। गुरुवार को ५५ पैसे रुपए का अवमूल्यन होने के बाद शुक्रवार को भी रुपए में और गिरावट हुई। बाजार खुला तब डॉलर की तुलना में ८१.८९ दर थी और रुपए का पारा ८२.३३ तक नीचे आ गया। रुपए की ये गिरावट वैश्विक स्तर पर हिंदुस्थान की प्रतिष्ठा धूमिल करनेवाली तो है ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरे की घंटी है। रुपया पहले बीमार हो गया, समय पर अच्छा इलाज नहीं हुआ इसलिए उसकी बीमारी बढ़ती गई, फिर भी सरकार की नींद नहीं टूटी। अब तो आईसीयू में पहुंचा रुपया बिस्तर पर सो गया है। फिर भी सरकार उदासीन बनी हुई है। रुपए की इस नाजुक स्थिति को ढंकने के लिए देश की अर्थव्यवस्था किस तरह से मजबूत हो रही है। ब्रिटेन को पीछे छोड़कर हम वैâसे तीसरे क्रमांक की अर्थव्यवस्था बन रहे हैं और आर्थिक महाशक्ति होने की दिशा में उड़ान भर रहे हैं, ऐसी सुंदर काल्पनिक तस्वीर सरकार की ओर से रंगी जा रही है। तथापि सरकार की ओर से अर्थव्यवस्था को लेकर किए जा रहे दावे और प्रत्यक्ष में अर्थव्यवस्था की विकट स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई देते हुए भी आर्थिक महाशक्ति का स्वप्नरंजन यानी केवल खोखली बातें हैं। सिर्फ रुपए का रिकॉर्ड अवमूल्यन ही अब चिंता का विषय नहीं है। उसके साथ देश में बढ़ती गरीबी और बेरोजगारी के बढ़ते संकट की गंभीर चुनौतियां सरकार के सामने खड़ी हैं। देश के मुट्ठीभर धनाढ्यों की संपत्ति तेजी से बढ़ रही है और मध्यमवर्गीयों व गरीबों की स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है। यदि इस पर विपक्ष ने सरकार से पूछा या आलोचना की तो उन्हें या तो देशद्रोही ठहराया जाता है या फिर ईडी, सीबीआई जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों को पीछे लगाकर जवाब पूछनेवालों का मुंह बंद करने का प्रयास किया जाता है। ऐसी कार्रवाइयों से देश के मसले खत्म नहीं होंगे। अब तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने गिरती अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी सरकार को जो खड़े बोल सुनाए वह देश की अर्थव्यवस्था की गंभीर स्थिति को सामने लानेवाला ही है। देश के २० करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं। २३ करोड़ लोगों की रोजाना आय ३७५ रुपए से भी कम है। बेरोजगारी की दर ७.६ फीसदी हो गई है। ऐसी आंकड़ेवारी होसबाले ने एक कार्यक्रम में पेश की। राष्ट्रीय आय की २० प्रतिशत आय देश के एक फीसदी अमीरों के पास है, तो देश की ५० प्रतिशत यानी आधी जनसंख्या के हिस्से में केवल १३ प्रतिशत आय आती है। अमीरों और गरीबों की भीषण खाई की वास्तविकता को प्रस्तुत करते हुए होसबाले ने सीधा सवाल पूछा कि क्या यह स्थिति उचित है। इस स्थिति के लिए सरकार की अकार्यक्षमता उतनी ही जिम्मेदार है, ऐसी सीधी आलोचना भी की। विपक्ष की टिप्पणी में राजनीति ढूंढ़नेवाली सरकार कम-से-कम हमारी मातृसंस्था क्या कह रही है उस पर भी तो ध्यान दे। देश कोई भी हो, उस देश की ‘मुद्रा’ कितनी मजबूत है, इसी पर उस देश की प्रतिष्ठा विश्व स्तर पर निर्धारित होती है। यह अटल सत्य है। कांग्रेस के कार्यकाल में रुपए की दर डॉलर की तुलना में ६७ से ६८ पर पहुंची तो उन दिनों भाजपा ने संसद में सरकार पर तीखा हमला बोला। ‘रुपया केवल कागज का टुकड़ा नहीं है, उस पर देश की प्रतिष्ठा तय होती है’, ऐसा बयान भाजपा की दिवंगत नेता सुषमा स्वराज ने उन दिनों संसद में दिया था। सुषमा स्वराज ने सच्चाई बयां की थी। आज तो रुपया रोज गिर रहा है और विश्व स्तर पर रोज देश की प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है। इसे रोकने के लिए क्या सरकार कुछ करेगी?

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