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संपादकीय :’थकी हुई’ सरकार की कहानी

हमारे देश की अर्थव्यवस्था मौजूदा वर्ष में लगभग साढ़े सात फीसदी की दर से दौड़ेगी, ऐसा केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने शनिवार को कहा और सोमवार को डॉलर की तुलना में रुपया आज तक के सबसे निचले स्तर तक गिर गया। डॉलर की तुलना में रुपए में लगभग १९ पैसों की गिरावट आई, मतलब एक डॉलर के लिए अब ८०.११ रुपए का भुगतान करना होगा। रुपए के पतझड़ के भविष्य में भी थमने के कोई संकेत नहीं हैं। फिर भी केंद्रीय वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था को लेकर एक गुलाबी तस्वीर तैयार की। अब वित्त मंत्री होने की वजह से अर्थव्यवस्था, आर्थिक विकास, रुपया, महंगाई के संदर्भ में ‘सब कितना अच्छा है’ ऐसा ही उन्हें कहना पड़ेगा यह खुला सत्य है। परंतु इस वजह से वास्तविकता बदलेगी नहीं और जनता पर पड़नेवाली महंगाई की मार भी चूकती नहीं। वित्त मंत्री जिस रविवार को कहती हैं कि आर्थिक विकास दर इस साल ही नहीं बल्कि अगले आर्थिक वर्ष में भी साढ़े सात फीसदी के आस-पास रहेगी। वही रविवार शेयर बाजार के लिए ‘ब्लैक संडे’ सिद्ध होता है, इस विरोधाभास को क्या कहा जाय? सोमवार को रुपया अब तक के ऐतिहासिक निचले स्तर तक गिरा और सेंसेक्स १,२५० अंकों तक धराशायी हो गया। इससे निवेशकों को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ। देश की वित्त मंत्री का दावा और वास्तविक स्थिति का मिलाप कैसे  किया जाय, यह सवाल ही है। अर्थात ऐसे विरोधाभासी सवाल इससे पहले भी उपस्थित होते रहे हैं। कुछ ही दिन पहले सीतारामन ने महंगाई को नियंत्रित करने में कामयाबी मिली है और देश में मंदी की आशंका नहीं है, ऐसा कहा था। मंदी की आशंका नहीं ऐसा उनका कहना एक बार समझ सकते हैं। फिर भी महंगाई नियंत्रण में लाने के दावे का क्या? उनका यह दावा और असल में भड़की महंगाई के दावानल के बीच तालमेल कैसे करोगे? कदाचित अप्रैल में देश की मुद्रास्फीति की दर ७.७९ फीसदी जितनी चिंताजनक दर्ज की गई है। इसीलिए हमारा रिजर्व बैंक भी देश में नियंत्रण से बाहर जा रही महंगाई का एहसास हो गया है और लगातार १० बार रेपो दर ‘जैसे थे’ रखनेवाले रिजर्व बैंक ने बीती दो तिमाही में इसे बदलकर कड़ी नीति के संकेत दिए हैं। फिर भी केंद्रीय वित्त मंत्री को ‘देश में महंगाई ज्यादा नहीं है’ ऐसा लगता था। अभी भी कदाचित ‘रुपए की गिरावट ज्यादा नहीं है’ ऐसा उन्हें लग सकता है क्योंकि अर्थव्यवस्था का क्या, अथवा रुपए का क्या, वर्तमान केंद्र सरकार के कार्यकाल में गिरावट ही जारी है। न अर्थव्यवस्था संभल पाई और न रुपया! कोरोना महामारी और लॉकडाउन का संकट तो बीते दो-सवा दो वर्षों से आया है। परंतु नोटबंदी की गलत आर्थिक और बाद में जीएसटी को अमल में लाने की वजह से अर्थव्यवस्था पहले ही गिर गई थी। लगातार रुपए का अवमूल्यन हो ही रहा है तथा रुपए की कीमत बरकरार रखने के लिए रिजर्व बैंक को अनमोल विदेशी मुद्रा खर्च करने की कसरत करनी पड़ रही है। इससे विदेशी मुद्रा का भंडार और कम होगा तथा रुपए की गिरावट की रफ्तार बढ़ती ही जाएगी। ऐसा यह दुष्चक्र बीते आठ वर्षों से चल रहा है। फिर भी हमारी अर्थव्यवस्था फिलहाल साढ़े सात फीसदी की रफ्तार से दौड़ रही है, ऐसा वित्त मंत्री को दिख रहा है। अब साक्षात वित्त मंत्री को दिख रहा है कहा जाय तो जनता को नहीं दिखने का सवाल ही कहां उठता है। केंद्र के सत्ताधारियों को आठ वर्षों के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था क्या अथवा रुपया क्या, सिर्फ गिरावट ही जारी है। न अर्थव्यवस्था उबर पाई न रुपया बल्कि उससे पहले ठीक-ठाक रही अर्थव्यवस्था भी थकी हुई और खनखनाता रुपया भी तंग हो गया है। हमारे देश का बोलबाला दुनिया में सिर्फ बीते आठ वर्षों में हुआ, ऐसा ढोल सत्ताधारी और उनके समर्थक लगातार पीटते हैं। परंतु सोमवार को रुपए की एक बार फिर हुई ‘न भूतो’ गिरावट और शेयर बाजार की पतझड़ हमारी ‘थकी हुई’ सरकार की असली कहानी है। नई कहानी लिखने के लिए जनता जनार्दन को ही अब शंखनाद करना होगा।

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