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संपादकीय : समय कठिन है, लेकिन बीत जाएगा!

शिंदे समूह के विधायकों की मदद से भाजपा ने विधानसभा का चुनाव जीत लिया है। वर्तमान मुख्यमंत्री की तरह विधानसभा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राहुल नार्वेकर एक ऐसे गृहस्थ हैं, जो स्वयं को पहले शिवसैनिक कहा करते थे। शिवसेना, राष्ट्रवादी और अब भाजपा इस तरह से सफर करते हुए वे विधानसभा अध्यक्ष के पद तक पहुंच गए। उन्हें पता होता है कि कब और कहां पैर रखना है। भारतीय जनता पार्टी में शिवसेना या महाराष्ट्र की अस्मिता को परास्त करने की क्षमता और साहस नहीं है। शिवसेना में ही तोड़-फोड करके उनमें से किसी एक को शिवसेना के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है। इसलिए भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव जीत लिया, इस पर हमारे हैरान होने की तो कोई वजह नहीं है। राहुल नार्वेकर को १६४ विधायकों ने वोट दिया। शिवसेना के राजन साल्वी के पक्ष में १०७ वोट पड़े। शिंदे समूह के भाजपा समर्थित विधायकों ने पार्टी के व्हिप का पालन नहीं किया। इसलिए इस संबंध में उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई शुरू की जाएगी। परंतु अब यह सब टालने के लिए ही भाजपा ने कानून के जानकार व्यक्ति को विधानसभा अध्यक्ष के पद पर बैठाया है और उसे निर्देश देकर उन्हें जो चाहिए वो निर्णय लिए जाएंगे। शिंदे समूह के १६ विधायकों के पात्र-अपात्र होने से संबंधित याचिका सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन होने के दौरान इन विधायकोें को मतदान में हिस्सा लेने की अनुमति देना गैरकानूनी है लेकिन उद्धव ठाकरे द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद से महाराष्ट्र में कानून का राज नहीं बचा है। सूरत, गुवाहाटी, गोवा और मुंबई, इस तरह से लंबा प्रवास करके शिंदे गुट के विधायक मुंबई हवाई अड्डे पर पहुंचे तो सुरक्षा व्यवस्था के लिए हवाई अड्डे से कुलाबा स्थित उनके होटल तक सड़क के दोनों तरफ केंद्रीय बलों के जवान हाथ में बंदूक लिए खड़े थे। सिर्फ वायुसेना व फौज का इस्तेमाल करना ही शेष रह गया था। इतनी पुलिस कसाब की सुरक्षा के लिए भी तैनात नहीं थी। लेकिन महाराष्ट्र शहीद स्वाभिमानी ओंबले का है, शिंदे गुट के विधायकों को ये भूलना नहीं चाहिए। विधायक आए, भगवा साफा पहनकर बालासाहेब की प्रतिमा को प्रणाम करते हुए निष्ठा का नाटक किया। लेकिन उन सभी के चेहरे साफ गिरे हुए दिख रहे थे। उनका पाप उनके मन को कचोट रहा था, ऐसा उनके चेहरों से साफ प्रतीत हो रहा था। शिवसेनाप्रमुख का स्मारक चेतना और ऊर्जा का सूर्य है। ये भगवाधारी विधायक जुगनू भी नहीं थे। शिवसेना में रहने के दौरान क्या वो तेज, क्या वो रुआब, क्या वो हिम्मत, क्या वो सम्मान, क्या वो स्वाभिमान… ऐसा बहुत कुछ था। ‘कौन आया, रे कौन आया, शिवसेना का बाघ आया’ ऐसी गर्जना की जाती थी। वैसा कोई दृश्य देखने को नहीं मिला। कान टोपी की तर्ज पर भगवा साफा पहनने से कोई ‘मावला’ बन सकता है क्या? लेकिन भौचक्का हुए ये विधायक केंद्रीय सुरक्षा में आ गए और उन्होेंने विधानसभा का अध्यक्ष चुन लिया। यह चुनाव अवैध है, लोकतंत्र और नैतिकता के अनुरूप नहीं है। इस अनैतिक कार्य में हमारे महामहिम राज्यपाल का शामिल होना, इस पर किसी को हैरान नहीं होना चाहिए। इससे पहले महाविकास अघाड़ी ने विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव के लिए राज्यपाल से अनुमति मांगी थी, लेकिन १५ मार्च को मामला न्यायालय में विचाराधीन होने वगैरह का कारण बताते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया गया। फिर आघाड़ी के लिए जो नियम लगाए, वही इस बार क्यों नहीं लगाए जाने चाहिए? हालांकि, इस सवाल का जवाब मिलने की संभावना नहीं ही है। उपराष्ट्रपति पहले ही शिंदे सहित अपने समूह के १६ विधायकों को अयोग्य घोषित करने का नोटिस जारी कर चुके हैं। अर्थात मामला विचाराधीन है ही ना? विधानसभा अध्यक्ष के पद के लिए चुनाव ‘हेड काउंट’ पद्धति से किया गया, लेकिन महाविकास अघाड़ी सरकार को ऐसा करने की अनुमति नहीं थी। उस समय उन्हें गुप्त मतदान चाहिए था। ऐसे में राज्यपाल के हाथ में मौजूद संविधान की पुस्तक निश्चित तौर पर किसकी है? डॉ. आंबेडकर की या किसी और की? उनके हाथ में न्याय का तराजू सत्य का है या सूरत के बाजार का? यह सवाल महाराष्ट्र की जनता के मन में उठ ही रहा है। महाराष्ट्र में ठाकरे सरकार के जाने का अर्थात हिंदूहृदयसम्राट के विचारों की सरकार के बदलने से हमारे राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी सबसे ज्यादा खुश हैं। उनके चेहरे की खुशी ऐसी है मानो क्रांतिकारी भगत सिंह को लाहौर की सेंट्रल जेल में जब अंग्रेजों ने फांसी दी, उस समय अंग्रेजों को जो खुशी मिली होगी वैसी। नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री श्री शिंदे को राज्यपाल ने उसी खुशी के उत्साह के साथ बधाई दी। जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने, तब उन्हें ये खुशी नहीं मिली थी। कदाचित राजभवन परिसर स्थित पेड़े की दुकान बंद हो गई होगी। श्री शरद पवार जो कहते हैं, वो बातें मजेदार होने के साथ-साथ सही भी है। ‘मैं अब तक चार बार मुख्यमंत्री रह चुका हूं, लेकिन राज्यपाल ने एक बार भी पेड़ा नहीं खिलाया।’ शरद पवार का ऐसा कहना सही ही है। क्योंकि राज्यपाल तटस्थ और संविधान के संरक्षक होते हैं। मुख्यमंत्री कौन है या वह किस पार्टी से आए या गए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन पिछले दो-चार वर्षों में महाराष्ट्र के राजभवन में एक अलग ही तस्वीर नजर आ रही है। ‘ठाकरे सरकार’ के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान जब कुछ मंत्रियों ने शपथ की शुरुआत ‘शाहू, फुले और आंबेडकर का नाम लेकर की तो राज्यपाल भगत सिंह नाराज हो गए और उन्होंने ये शपथ संविधान के अनुरूप नहीं है, ऐसा कहते हुए वह मंच पर ही मंत्रियों को फटकारने लगे थे। संविधान और शपथ की वो रक्षा इस खेप के मामले में नजर नहीं आई। संविधान के तथाकथित संरक्षक ही ऐसे दोयम दर्जे का व्यवहार कर रहे हैं, तो लोग अयोग्य विधानसभा सदस्य ही क्या, बाहरी किसी भी ऐरे-गैरों को अंदर लाकर ये लोग विधानमंडल में कोई भी प्रस्ताव और चुनाव जीत सकते हैं। सिर्फ मुंह दबाए गए सिरों को ही तो गिनना है। ऐसा व्यवहार और राजनीति महाराष्ट्र में कभी नहीं हुई। शिवरात्रि को साक्षी मानकर बालासाहेब ठाकरे की शपथ लेकर यदि कोई यह पाप करता होगा तो भारतमाता उसे माफ नहीं करेगी। अब सवाल उन १२ मनोनीत विधान परिषद सदस्यों का है, जो पिछले ढाई साल से राज्यपाल की मेज पर विचाराधीन है। अब नई सरकार आई है। इसलिए उस फाइल के बदले नई फाइल लाई जाएगी और चौबीस घंटे के भीतर राज्यपाल के हस्ताक्षर से इसे मंजूरी मिल जाएगी और पेड़े खिलाने का कार्यक्रम बार-बार दोहराया जाएगा। समय बहुत ही मुश्किलों भरा आया है, यह सत्य है लेकिन यह अंधकार का समय भी बीत जाएगा!

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