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संपादकीय : तोड़ा-फोड़ा और लोढ़ा! …मोदी का अनर्थशास्त्र

कार्यवाहक प्रधानमंत्री मोदी फिलहाल विकास, जनकल्याण, गरीबी हटाने की बात करने लगे हैं। उनकी बातें सतही हैं, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। मोदी ने २०१४ में जब देश की कमान संभाली, तब देश पर ४९ लाख करोड़ का कर्ज था। २०२४ में कर्ज का आंकड़ा २०५ लाख करोड़ तक पहुंच गया, लेकिन इस कर्ज के बदले देश को क्या मिला? देश का एक बड़ा वर्ग गरीबी, बेरोजगारी से जूझ रहा है और मोदी की महंगाई दूर करने की घोषणा विफल हो गई है। २०१४ में आटा २० रुपए किलो था, अब ४० रुपए किलो है। दाल ८० रुपए किलो से २१० रुपए पर पहुंच गई है। दूध ३० रुपए लीटर था, अब ६६ रुपए लीटर हो गया। तेल ५२ रुपए लीटर से १५० रुपए लीटर हो गया। पेट्रोल ६६ रुपए से ९७ रुपए, डीजल ५२ रुपए से ९० रुपए, रसोई गैस ४१० रुपए से १,२०० रुपए पर पहुंच गई है। ये है मोदी का विकास। जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो डॉलर के मुकाबले रुपया ५८ पर था, लेकिन अब डॉलर के मुकाबले रुपया ८५ पर आ गया है। यह एक तरह से देश की गिरावट है, मंदी है। इस मंदी पर सवार होकर मोदी अब अगले पंद्रह-पच्चीस साल के वादे करके वोट मांग रहे हैं। मोदी पूरी तरह असफल प्रधानमंत्री हैं। उनके द्वारा निर्मित विकास का गुजरात मॉडल एक बुलबुला है। मोदी ने ८५ करोड़ गरीबों को प्रति व्यक्ति ५ किलो मुफ्त राशन देने का फैसला किया। यह गरीबों को बिना काम दिए निठल्ला बनाने का एक तरीका है। इसका मतलब है कि १४० करोड़ के देश में ८५ करोड़ लोग भूखे और गरीब हैं और मोदी उन्हें परजीवी बना रहे हैं। एक तरफ ‘आत्मनिर्भर भारत’ की बात करना और दूसरी तरफ उन ८५ करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देना और बदले में अनाज की बोरियों पर अपनी तस्वीर छपवाना। आज भी देश में ३५ करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। मोदी अपनी इस विफलता के बारे में कुछ भी बोलते नजर नहीं आते। मोदी के पास कोई सामाजिक चेतना नहीं है। उनके पास कोई राष्ट्रीय विचार नहीं है। सत्ता पाने और बनाए रखने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति राष्ट्रहित नहीं है। मोदी को अर्थशास्त्र बिल्कुल समझ नहीं आता। मोदी व्यापारी हैं, वे ऐसा खुद कहते हैं, लेकिन पेढ़ी पर बैठकर खुद की कमाई गिनना और देश को आर्थिक दिशा देना दोनों अलग-अलग बातें हैं। अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी ने जो मनमौजीपना दिखाया है, वह धक्कादायक है। एक बार मोदी के मन में आया तो वह अचानक टीवी मीडिया पर दिखे और उन्होंने नोटबंदी का फैसला सुना दिया। मोदी ने घोषणा की कि उन्होंने कालाबाजारी और कालेधनवालों की कमर तोड़ने के लिए यह क्रांतिकारी कदम उठाया है। उस फैसले से हंगामा मच गया। छोटे व्यापारी टूट गए। बैंकों के सामने कतारें लग गईं। उन कतारों में कई लोगों की मौत हो गई, लेकिन क्या इससे काला धन नष्ट हो गया? बिल्कुल नहीं। सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश बी. वी. नागरत्ना ने पुरजोर तरीके से कहा कि मोदी की नोटबंदी कालेधन को सफेद करने का खेल था। नोटबंदी के बाद ९८ फीसदी नोट वापस आ गए। देश की कुल ‘करेंसी’ में ५०० और १,००० के नोटों की हिस्सेदारी ८६ फीसदी थी। उन्होंने इसे बंद कर दिया। बाद में उनमें से ९८ फीसदी नोट वापस आ गए। तो सारा काला धन इस तरीके से सफेद कर लिया गया। नोटबंदी के पैâसले से आम दुकानदारों और छोटे व्यापारियों को नुकसान हुआ। कई उद्योग दिवालिया हो गए और लाखों लोगों की नौकरियां चली गर्इं। मोदी का कहना था, ‘नोटबंदी से नकली नोटों पर लगाम लगेगी और आतंकियों को होने वाली आर्थिक मदद रुकेगी।’ हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। मोदी सरकार ने टैक्स टेररिज्म का इस्तेमाल कर उद्योग-व्यापार को भारी नुकसान पहुंचाया है। केंद्र सरकार ने ‘एक देश, एक कर’ की नीति लागू कर लोगों की गर्दन पर ‘जीएसटी’ नामक राक्षस बैठा दिया। जीएसटी के नाम पर लूट एक तरह का टैक्स टेररिज्म है। जीएसटी के कारण राज्यों की वित्तीय स्वतंत्रता, संघीय व्यवस्था पर प्रहार हुआ है। राज्यों को केंद्र का गुलाम बना दिया गया। राज्यों के पैसों को मोदी सरकार खुलेआम फिजूल खर्च कर रही है। जीएसटी का इस्तेमाल व्यापारियों और छोटे उद्योगों को परेशान करने के लिए किया गया और यह अर्थव्यवस्था के अच्छे स्वास्थ्य का संकेत नहीं है। दबाव डालकर रिजर्व बैंक से मनमाना पैâसला करवाने वाली मोदी सरकार देश के आर्थिक ढांचे को ध्वस्त कर रही है। मोदी राज में रिजर्व बैंक की स्वायत्तता खत्म हो गई। नोटबंदी जैसे निर्णय लेते वक्त रिजर्व बैंक को पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया। मोदी ने मुट्ठीभर उद्योगपतियों के १६ लाख करोड़ रुपए का बैंक बकाया एक झटके में माफ कर दिया। यह फैसला अर्थव्यवस्था को कमजोर करने वाला था। १६ लाख करोड़ कोई छोटा आंकड़ा नहीं है, लेकिन मोदी ने उद्योगपतियों का कर्ज माफ कर दिया। किसानों के कर्ज माफी पर वे बोलने को तैयार नहीं। यदि उद्योगपतियों ने देश की अर्थव्यवस्था डुबो दी तो मोदी उन्हें संभाल लेते हैं लेकिन किसानों को वही मोदी भीख मांगने पर मजबूर कर देते हैं। मोदी को अर्थशास्त्र नहीं आता। इसलिए वे आर्थिक विषयों पर फैसले तुगलकी तरीके से लेते हैं। निर्मला सीतारमण जैसी रीढ़हीन महिला को उन्होंने देश का वित्तमंत्री बना दिया। उस महिला के पति परकला प्रभाकर एक आर्थिक विशेषज्ञ हैं और उनका मानना ​​है कि मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है। मोदी किसानों के माल की कीमत की गारंटी नहीं दे सके। प्याज, दूध, कपास, सब्जियां, अंगूर, अनाज का कोई दाम नहीं है। लेकिन मोदी के उद्योगपति मित्र गौतम अडानी के वित्तीय लाभ के लिए सारे नियम ताक पर रख दिए जाते हैं। धारावी, मुंबई के साल्ट पैन फील्ड, बांद्रा रिक्लेमेशन की जमीनें अडानी को लगभग-लगभग कौड़ियों के दाम दे दी गर्इं। मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। मोदी ने उस मुंबई के महत्व को कम करने की नीति बनाई। यह सोच देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक है, लेकिन मोदी पेढ़ी के व्यापारी हैं। देश की अर्थव्यवस्था उनकी समझ से परे है। इसलिए अर्थव्यवस्था पर जबरन कब्जा कर देश को लूटने का युद्ध स्तर पर प्रयास जारी है। पैसे और अर्थव्यवस्था का एकाधिकार ही मोदी का अर्थशास्त्र है। ‘पैसों के जोर पर दलों को तोड़ा और चुनावी खर्च के लिए अडानी, लोढा’ कुल मिलाकर ऐसी ही तस्वीर है। फोड़ा-तोड़ा और लोढा! भाजपा का यह चरित्र अब उजागर हो गया है। वसूली रैकेट चलाने वाली केंद्रीय जांच एजेंसियां ​​मौजूदा अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गई हैं। फिर भी अगर किसी को लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था सही दिशा में आगे बढ़ रही है तो उन्हें हमारा साष्टांग दंडवत।

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