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संपादकीय: सत्य जीता; लेकिन संसद की सीढ़ियों पर खड़ा

राहुल गांधी ने २०१९ के लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी उपनाम को लेकर टिप्पणी की। यह समस्त मोदी समाज का अपमान है, ऐसा कहते हुए गुजरात के एक भाजपाई पदाधिकारी पूर्णेश मोदी ने सूरत कोर्ट में राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया। सूरत की अदालत गुजरात की धरती पर होने के कारण वहां अलग क्या होगा? एक उपनाम पर टिप्पणी किए जाने के कारण राहुल गांधी को दो साल की सजा सुना दी गई। यह सजा सुनाए जाते ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राहुल गांधी को लोकसभा से तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया और सरकार ने राहुल गांधी को दिल्ली स्थित उनके आवास से बेदखल कर दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी को दी गई सजा पर रोक लगा दी है। इसे ७२ घंटे बीत जाने के बाद भी लोकसभा अध्यक्ष ने राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता बहाल नहीं की है। लोकसभा अध्यक्ष का कहना है, ‘सुप्रीम कोर्ट के पैâसले का अध्ययन चल रहा है। सत्य की जीत हुई है, इसका अध्ययन करने में इतना समय क्यों लग रहा है? इस मामले में ऐसा कौन सा शोध किया जाना है और पढ़ाई करके पीएचडी की कौन सी डिग्री हासिल करनी है? सुप्रीम कोर्ट द्वारा राहुल गांधी के संदर्भ में दिया गया निर्णय नियम और कानून के गहन अध्ययन के बाद ही दिया गया था, लेकिन इस पैâसले से हमारे शासकों की प्रतिशोध की राजनीति का राजफाश हो गया है। केंद्र सरकार ने जल्दबाजी में राहुल गांधी को संसद से निष्कासित कर दिया। क्योंकि राहुल गांधी ने राफेल और अडानी मामले में सवाल पूछकर सरकार के पसीने छुड़ा दिए थे। राहुल गांधी ने ४,००० किलोमीटर लंबी ‘भारत जोड़ो’ पदयात्रा की। इस पदयात्रा से राहुल की लोकप्रियता बढ़ी और उन्हें देश के नेता के रूप में मान्यता मिली। राहुल गांधी पर किया गया हर वार मोदी-शाह पर ही उल्टा पड़ा। राहुल गांधी वर्ष २०२४ में मोदी को कड़ी टक्कर देंगे। आज देश के माहौल से ऐसा साफ दिख रहा है कि वर्ष २०२४ में दिल्ली की जुल्मी सरकार उखाड़ फेंकी जाएगी। ऐसे समय में राहुल गांधी संसद में न रहें और उन्हें अगला लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका न मिले, इसलिए मानहानि के मुकदमे में अधिकतम दो साल की सजा देने का प्रावधान किया गया। ‘मोदी उपनाम वाले सभी लोग चोर वैâसे हैं?’ ऐसा प्रश्न श्री राहुल गांधी ने कर्नाटक के कोलार में एक जनसभा में पूछा था। राहुल गांधी ने नीरव मोदी, ललित मोदी का जिक्र किया। प्रधानमंत्री मोदी अपने भ्रष्ट दोस्तों की ही जेबें भर रहे हैं, ऐसा राहुल गांधी ने आरोप लगाया था। ये तीर आर-पार हो गया और एक पूर्णेश मोदी को आगे करके राहुल गांधी पर मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी के वकीलों ने पूर्णेश मोदी के झूठ का पर्दाफाश किया। वकील ने साबित कर दिया कि इन सज्जन का नाम मोदी नहीं है बल्कि उन्होंने इसे दत्तक लिया है और वे ‘मोध वणिक’ समुदाय से हैं। ऐसे कई मामलों में सुप्रीम कोर्ट सत्तारूढ़ दल की बखिया उधेड़ चुका है। राहुल गांधी को अधिकतम सजा देने की वजह न सूरत की अदालत, न ही गुजरात हाई कोर्ट ने। सौ पन्नों में पैâसला सुनाया, लेकिन इतनी बड़ी सजा का कारण नहीं बताया गया। कोर्ट का मकसद सिर्फ राहुल गांधी की सांसदी को खत्म करना था और सुप्रीम कोर्ट ने इसी पर उंगली उठाई है। राहुल गांधी को अब सुप्रीम कोर्ट ने न्याय दिया है, लेकिन न्यायदेवता न्यायपत्र लेकर संसद की सीढ़ियों पर खड़े हैं और लोकसभा अध्यक्ष बिरला उस पैâसले का अध्ययन करने जा रहे हैं। सूरत कोर्ट के पैâसले को अमल में लाते समय किसी तरह का अध्ययन किया जाना चाहिए, ऐसा जरूरी नहीं समझा गया। राहुल गांधी की सांसदी रद्द करने के समय इन सभी के चेहरों पर एक विकृत आनंद साफ झलक रहा था। मानो कोई बड़े शिकार करने जैसा आविर्भाव था। संसद सोमवार से फिर शुरू होगी। मणिपुर को लेकर अविश्वास प्रस्ताव सहित कई मुद्दों पर लोकसभा में चर्चा होगी। इस चर्चा में राहुल गांधी हिस्सा न ले सकें, इसलिए ही सुप्रीम कोर्ट के पैâसले और सत्य को संसद की सीढ़ियों पर रोककर रखा गया है। इन्हीं सीढ़ियों पर माथा टेककर संसद में प्रवेश करने का नाटक श्री मोदी ने नौ साल पहले किया था। लेकिन जब से संसद में मोदी राज आया है, न्याय, सत्य, विवेक और संविधान हर रोज परास्त हो रहे हैं। गुजरात की धरती से सत्य, न्याय और नैतिकता का दमन किया जा रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने धृतराष्ट्र का रुख नहीं अपनाया है। राहुल गांधी का न्याय सत्य की जीत है। व्यथा इतनी ही है कि जीते हुए सत्य को संसद की सीढ़ियों पर असहाय खड़ा कर दिया गया है।

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