मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : नाहक मांझा बलि...!

संपादकीय : नाहक मांझा बलि…!

मकर संक्रांति का पर्व रविवार को देशभर में बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। तिलगुड़ के साथ पतंगबाजी करके, पतंग महोत्सव का आयोजन करके महाराष्ट्र-गुजरात सहित देशभर में जनता ने इस त्योहार का आनंद उठाया। हालांकि, पतंग उड़ाने के लिए इस्तेमाल में लाए जानेवाले नायलॉन के मांझे से महाराष्ट्र सहित विभिन्न राज्यों में जो दुर्घटनाएं हुर्इं, उसमें कइयों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस धारदार मांझे के कारण गला, गर्दन और हाथ की नसें कट जाने से कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। भिवंडी शहर के फ्लाईओवर से गुजर रहे मोटरसाइकिल सवार का गला नायलॉन के मांझे से कट गया और रक्त स्राव से उसकी मौत हो गई। नागपुर शहर में वेद नामक १० वर्षीय बालक अपने पिता के साथ बाइक से जा रहा था कि उसके गले में कटी पतंग का मांझा लिपट गया। इससे उसका गला कट गया और पिता की आंखों के सामने वेद की मौत हो गई। अकोला शहर में भी मां के साथ बाइक से जा रहे साढ़े तीन साल के बच्चे का गला ४ इंच तक कट गया। क्षण भर में वह खून से लथपथ हो गया। केवल नसीब के बलबूते और डॉक्टरों के अथक प्रयास से यह बच्चा मृत्यु के जबड़े से बाहर आ सका। संभाजीनगर में हुई प्रतियोगिता परीक्षा देकर वापस लौट रहे युवक के गले में मांझा फंस जाने से वह गंभीर रूप से घायल हो गया। पुणे में भी दोपहिया वाहन पर सवार दो पुलिसकर्मी नायलॉन मांझे की चपेट में आने से घायल हो गए। पिछले साल नागपुर में ही नायलॉन के मांझे ने एक २० वर्षीय युवक की इसी तरह बलि ली थी। बाइक चलाते समय हेलमेट में फंसा मांझा निकालते समय गले से घिस गया और युवक को जान गंवानी पड़ी।‌ गुजरात का पतंग उत्सव विश्व प्रसिद्ध है। वहां भी संक्रांति की पतंगबाजी के दौरान मांझे से गला कटने से छह लोगों की मौत हो गई। यह तो हुआ इंसानों के साथ। आसमान में उड़नेवाले पक्षियों की हर साल कितनी जान मांझे के कारण जाती है, इसकी कोई गिनती ही नहीं है। नायलॉन मांझे पर प्रतिबंध होने के बावजूद, उसकी खुलेआम बिक्री होती है और हर साल इससे होनेवाली दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। राष्ट्रीय और राज्य हरित न्यायाधिकरण के निर्णयानुसार देश में विभिन्न राज्य सरकारें नायलॉन मांझे की बिक्री और भंडारण पर प्रतिबंध लगाती हैं। संक्रांति से पहले और बाद में कुछ दिनों तक यह प्रतिबंध आदेश लागू रहता है। हालांकि, हर वर्ष लागू होनेवाले इस अस्थायी प्रतिबंध का नायलॉन मांझे की बिक्री पर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। इसका एकमात्र कारण नायलॉन के धागे के उत्पादन पर प्रतिबंध न होना है। बेशक, पतंग उड़ाने के अलावा, मछली पकड़ने के जाल या औद्योगिक उत्पादन में भी कई जगहों पर इस धागे का उपयोग किया जाता है, इसलिए प्लास्टिक से बननेवाले इस नायलॉन के धागे को बनाने वाले छोटे-बड़े असंख्य कारखाने पूरे देश में फैले हुए हैं। मांझा बेचने वाले खुदरा विक्रेताओं पर इस साल महाराष्ट्र सहित देशभर में बड़े पैमाने पर कार्रवाई की गई। करोड़ों रुपए के मांझे का स्टॉक जब्त किया गया। कई विक्रेताओं को गिरफ्तार भी किया गया, फिर भी पतंगबाजी के लिए नायलॉन के मांझे का उपयोग हुआ तो हुआ ही! चूंकि पतंग उड़ाने के अलावा अन्य जगहों पर भी इस धागे का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, इसलिए नायलॉन के धागे के उत्पादन पर सीधे प्रतिबंध लगाने का कदम सरकार नहीं उठा सकती है। इसलिए मांझा निर्माताओं के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। नायलॉन के धागे को विभिन्न रंगों और रसायनों की प्रक्रिया करके और उस पर कांच का पाउडर मिलाकर, कुछ निर्माता इस नायलॉन के धागे को जो स्वाभाविक रूप से मजबूत होता है, उसे और भी अधिक प्राणघातक बनाते हैं। देश के कारखानों के अलावा चीन में भी यह जानलेवा धारदार मांझा बड़े पैमाने पर उत्पादित किया जाता है और हमारे देश में आयात किया जाता है। धागे के उत्पादन पर अंकुश लगाने में कठिनाइयां हैं, फिर भी नायलॉन के धागों के निर्माताओं को खोजकर और चीन से बड़े पैमाने पर मांझा मंगाकर देशभर में पहुंचाने वाले उन आपूर्तिकर्ताओं को काबू में किए बगैर नायलॉन मांझे की बिक्री पर प्रतिबंध लगाना असंभव है। नायलॉन के मांझे के कारण जिन परिवार के छोटे बच्चों, युवकों की मृत्यु हुई है, उनके परिवार के सदस्यों पर संक्रांति के दिन शोक मनाने का दुर्भाग्यपूर्ण समय आया। सड़क पर चलनेवाले और दोपहिया वाहनों से यात्रा करनेवाले नायलॉन के मांझे में फंस गए और कई लोगों के जीवन की डोर असमय ही कट गई। अगर इस नाहक मांझा बलि को रोकना है तो खुदरा विक्रेताओं की बजाय निर्माताओं और आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। संक्रांति की पतंगबाजी के उत्साह को बनाए रखते हुए, ऐसा करना आसानी से संभव है।

अन्य समाचार