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संपादकीय : जो हुआ वह उचित नहीं!

विधान परिषद चुनाव में महाविकास आघाड़ी में असमंजस की तस्वीर सामने आई है। इस गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार कौन? या फिर एक-दूसरे की टांग खिंचाई करके भारतीय जनता पार्टी को खुला मैदान देना, ऐसा आघाड़ी के कुछ लोगों ने आपस में तय कर लिया है? ये चुनाव नासिक स्नातक, कोकण शिक्षक, अमरावती स्नातक, नागपुर शिक्षक और संभाजीनगर शिक्षक जैसे पांच निर्वाचन क्षेत्रों में हो रहे हैं। पांच सीटों में से महाविकास आघाड़ी की तीन सीटें और भाजपा के पास दो सीटें थीं। अगर महाविकास आघाड़ी ने समन्वय और योजना के फॉर्मूले पर काम किया होता तो इस बार वह तीन सीटों को बरकरार रखते हुए एक सीट और जीत सकती थी लेकिन अब जो है, उसे भी गंवाने का समय आ गया है। नासिक स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया है। कांग्रेस के उम्मीदवार व वर्तमान विधायक डॉ. सुधीर तांबे की अचानक मारी गई पलटी चौंकानेवाली है। कांग्रेस ने डॉ. सुधीर तांबे की उम्मीदवारी घोषित की। लेकिन डॉ. सुधीर तांबे ने पार्टी का ‘एबी’ फॉर्म होते हुए भी पार्टी की ओर से नामांकन नहीं भरा। लेकिन उसी वक्त उनके बेटे सत्यजीत तांबे ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। बेटे को विधायक बनाने की उदार मंशा से डॉ. तांबे ने यह चाल चली और इसके पीछे भारतीय जनता पार्टी का पेच है। भाजपा अब सत्यजीत तांबे को समर्थन देने की बात कर रही है। यह उदारता अचानक नहीं आई है। सत्यजीत तांबे कांग्रेस नेता बालासाहेब थोरात के भांजे हैं। यानी थोरात उनके मामा हैं। सत्यजीत तांबे महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी थे। उनकी गिनती राहुल गांधी के करीबियों में होती है। पिछले चुनाव में जब राहुल गांधी प्रचार करने नगर आए थे, तब गांधी सत्यजीत तांबे के ही घर पर ठहरे थे। इतना करीबी नाता। राहुल की भारत जोड़ो यात्रा में भी सत्यजीत तांबे शामिल हुए थे। ऐसा इंसान केवल एक विधायकी के लिए भाजपा की चाल में फंस जाए, यह समझ से परे है। सत्यजीत तांबे और डॉ. सुधीर तांबे के निर्णय से कांग्रेस की स्थिति खराब हो गई। अब नासिक स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस का उम्मीदवार नहीं है। नासिक में जो हुआ, उसका श्रेय भाजपा ले रही है। देवेंद्र फडणवीस की चाणक्य नीति के कारण नासिक में यह सब हुआ, ऐसा कहा जा रहा है। हाथ में सत्ता हो और केंद्रीय जांच एजेंसियां हों तो ऐसे पचासों चाणक्य निर्माण हो जाते हैं। इसमें राजनीतिक खेल कम और सत्ता का दुरुपयोग ज्यादा है। फिर कहा जाएगा कि महाविकास आघाड़ी की ढिलाई भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हुई। पांच सीटों पर चुनाव हो रहे हैं। क्या इस बारे में एक साथ बैठक कर कोई विस्तार से चर्चा हुई क्या? कोई नियोजन, रणनीति निर्धारित की गई क्या? तो इसका उत्तर ‘नहीं’ में देना होगा। अमरावती में कांग्रेस के पास अपना उम्मीदवार नहीं होने पर उस सीट के लिए जिद करके लड़ना, वास्तव में इसे क्या कहा जाए? आखिर में शिवसेना के जिलाप्रमुख लिंगाडे को कांग्रेस पार्टी में शामिल करके उम्मीदवारी की हल्दी लगानी पड़ी। अगर यह सीट शिवसेना के लिए छोड़ दी जाती तो लिंगाडे पूरी तैयारी के साथ चुनाव लड़ते। लिंगाड़े ने लड़ने की तैयारी कर ली थी और मतदाता पंजीकरण पर जोर लगा रखा था। नागपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस ने शिवसेना के लिए छोड़ा था लेकिन वहां अब कांग्रेस और राष्ट्रवादी ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जिससे मतभेद की तस्वीर खड़ी हो गई है। इसी नागपुर सीट में दो वर्ष पहले कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा उम्मीदवार संदीप जोशी को पराजित किया था। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा को पराजित करना कठिन नहीं है। केवल एकता की जरूरत है ये वंजारी ने साबित कर दिया। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में अब नागपुर में बहुरंगी मुकाबला होगा। एनसीपी के मौजूदा विधायक विक्रम काले संभाजीनगर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से दोबारा चुने जाएंगे। भाजपा को यहां उम्मीदवार नहीं मिला तो मूल कांग्रेस की किरण पाटील को प्रत्याशी बनाया। कोकण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में ‘शेकाप’ के मौजूदा विधायक बालाराम पाटील के खिलाफ भी भाजपा के पास कोई उम्मीदवार नहीं है, तो आयातित ज्ञानेश्वर म्हात्रे को हल्दी लगाकर खड़ा किया गया। भाजपा के पास अपने उम्मीदवार नहीं हैं। इधर-उधर के लोगों को जुटाकर खाली जगहों को भरते रहते हैं। फिर भी भाजपा कड़ी चुनौती दे रही है, ऐसी हवा बनाई जा रही है, वह केवल महाविकास आघाड़ी की ढिलाई की वजह से। नजर आ रहा है कि विधान परिषद की पांच सीटों के चुनाव को जितनी गंभीरता से लेना चाहिए था, उतना नहीं लिया गया। अमरावती और नागपुर में ये तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है। नासिक स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में ‘तांबे’ मंडली की तैयारी पहले से ही चल रही थी और पिछले महीने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में श्री फडणवीस ने ऐसा संकेत भी दिया था। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व नहीं जागा और एक विधायकी के लिए तांबे ने प्रतिष्ठा गवां दी। इस सब में फजीहत हुई महाविकास आघाड़ी की। दरअसल, महाराष्ट्र के स्नातकों और शिक्षकों को भाजपा के खिलाफ अपना गुस्सा व्यक्त करना था। भाजपा को शिक्षित वर्ग का कोई समर्थन नहीं है और सभी शिक्षित उसके पाले में नहीं आते हैं, यह दिखाने का अब अवसर मिला था, लेकिन पांसा उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। फिर भी मैदान नहीं छोड़ सकते।

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