मुख्यपृष्ठसंपादकीयसंपादकीय: माई-बाप सरकार कहां है? गोंदिया का आक्रोश!

संपादकीय: माई-बाप सरकार कहां है? गोंदिया का आक्रोश!

महाराष्ट्र में असल में क्या चल रहा है और क्या होनेवाला है, यह कोई बता नहीं सकता। एक महीना बीत गया है, फिर भी मंत्रिमंडल का पता नहीं है। अधर में लटकी इस अवस्था का लाभ उठाकर राज्य में महिलाओं पर अत्याचार और गुंडागर्दी उफान पर है। भंडारा जिले में एक महिला पर तीन लोगों द्वारा सामूहिक कुकर्म की घटना महाराष्ट्र को कलंकित करनेवाली है। गोंदिया जिले के गोरेगांव तहसील में रहनेवाली महिला पर अमानवीय दुष्कर्म हुआ और वह अबला अस्पताल में मृत्यु से जूझ रही है। यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ है। इस मामले में वहां की पुलिस द्वारा दिखाई गई लापरवाही और नियमों का पालन न करने की नई-नई कहानियां सामने आ रही हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री वर्तमान में अतिश्रम व थकान से बीमार हैं। साथ ही राज्य की कानून व्यवस्था को लकवा मारने जैसी ये तस्वीर है। पिछले ३५ दिनों में महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं पर यौन शोषण बढ़े हैं, उसमें दुष्कर्म का आंकड़ा बड़ा है। प्रगतिशील वगैरह कहलवाने वाले राज्य के लिए इस तरह की घटनाएं शोभा नहीं देतीं। गोंदिया की पीड़ित महिला बेहद साधारण परिवार से थी और उस पर घोड़ा-गाड़ी पर घूमनेवाले नराधमों ने हैवानों की तरह कुकर्म किया। कहा जाता है कि इस मामले को मुख्यमंत्री ने गंभीरता से लिया है। इस मामले की जांच करने के लिए महिला आईपीएस अधिकारियों की एसआईटी गठित करने की घोषणा मुख्यमंत्री ने की। इस मामले के कुछ संदिग्धों की धर-पकड़ की गई। मुख्यमंत्री पीड़िता को पांच-दस लाख रुपए की मदद भी करेंगे लेकिन क्या इससे राज्य की महिलाएं नराधमों के चंगुल से बच जाएंगी? गोंदिया की उस पीड़िता को क्या न्याय मिलेगा, यह सवाल ही है। मूलरूप से राज्य में सरकार अस्तित्व में ही नहीं है। ऐसे में कैसा न्याय और कैसा अन्याय? सरकार का पता नहीं और शिंदे-फडणवीस महामंडल ने ७५१ सरकारी आदेश जारी कर दिए। ये तमाम निर्णय व्यावहारिक दृष्टिकोण से सामने रखकर लिए जाएं लेकिन सरकारी व्यवस्था चरमरा ही गई है। मुख्यमंत्री के सम्मान और दूसरों को धमकाने में व्यस्त होने से राज्य की महिलाओं, अबलाओं को सहारा ही नहीं है। अपने गुट में लाने के लिए मुख्यमंत्री सरकारी मशीनरी को दांव पर लगा रहे हैं, ऐसी बहरी सरकारी मशीनरी के कानों में गोंदिया की अबला का करुण क्रंदन  कैसे पहुंचेगा? गोंदिया की वह अबला अमानवीय अत्याचार के कारण तड़प रही थी। उस समय मुख्यमंत्री शिंदे अपने चालीस समर्थकों के घेरे में सत्ता के बंटवारे में मशगूल थे। गोंदिया की घटना से महाराष्ट्र फिर से शर्मसार हुआ। यह किसी अन्य सरकार में हुआ होता तो भाजपा की महिला मोर्चा मुख्यमंत्री के इस्तीफे के लिए सोशल मीडिया पर कोहराम मचा देती। लेकिन अब भाजपा की महिला मोर्चा पीड़िता से मिलने तो गई, परंतु खुद की ‘वासु-सपना’ सरकार का इस्तीफा मांगने का साहस और नैतिक बल उनमें नहीं है। दिल्ली के ‘निर्भया’ कांड जैसा ही गोंदिया का सामूहिक बलात्कार कांड भयावह है। रोंगटे खड़े कर देनेवाला है। हालांकि महाराष्ट्र की महिलाओं को सुरक्षा कौन देगा? क्योंकि राज्य की जो माई-बाप सरकार ने जन्म लिया है, वो आधी-अधूरी और अपाहिज है। वह अस्तित्व में कहां है? यह सरकार खोखे पर बैठी है। उस खोखे में महाराष्ट्र की लाज और अनगिनत माताओं-बहनों का आक्रोश दबा हुआ है। गोंदिया की बहन, महाराष्ट्र को माफ कर!

प्रतीक पवार पर हमला!
गोंदिया में एक प्रकार का तो कर्जत तहसील के युवक प्रतीक पवार नामक युवक पर दूसरी तरह का हमला। प्रतीक पवार पर हमला होने से हिंदुत्व की नई-नई तुलसी माला पहननेवालों का शरीर आक्रोश से जल रहा है। मामला क्या है? ४ अगस्त को कर्जत तहसील के प्रतीक पवार पर कुछ असामाजिक तत्वों ने हमला किया। मोहम्मद पैगंबर का अपमान करनेवाली नूपुर शर्मा का समर्थन ये प्रतीक महाशय सोशल मीडिया पर कर रहे थे इसीलिए उन पर हमला हुआ। अमरावती में उमेश कोल्हे हत्याकांड ताजा ही था कि कर्जत का प्रतीक कांड हुआ। इस पर भाजपा के नवहिंदुत्व वादियों ने इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, ऐसा कहते हुए प्रतीक पवार पर हमले का मामला एनआईए को सौंपने की मांग की। राष्ट्रीय जांच एजेंसी अमरावती के कोल्हे हत्याकांड की जांच कर ही रही है। उसी में प्रतीक पवार मामले की जांच भी ‘एनआईए’ करे, यह मांग यानी शिंदे-फडणवीस महामंडल पर अविश्वास है। फिर सवाल वही है, ऐसी गुंडागर्दी करने की हिम्मत होती ही कैसे  है? उस पर उत्तर भी वही, वही और वही है। महाराष्ट्र में माई-बाप सरकार का अस्तित्व न होने से राज्य की कानून व्यवस्था का खिलवाड़ चल रहा है। यह भाजपा में घुसे नवहिंदुत्व वादियों को कहे कौन? पुलिस प्रशासन होगा भी लेकिन मालिक ही नहीं होने से सब कुछ भ्रमित है। कर्जत मामले की जांच एनआईए को दो, ऐसा कोई सुझाव दे रहा है तो उसके साथ-साथ पिछले दस-पंद्रह वर्षों में कोकण के तटीय इलाकों में संदिग्ध हत्याएं और अपहरण की जांच भी एनआईए को देना सुविधाजनक होगा। प्रतीक पवार तो असामाजिक तत्वों के हमले में बाल-बाल बच गया है। लेकिन सिंधुदुर्ग में श्रीधर नाईक से लेकर रमेश गोवेकर, सत्यविजय भिसे, अंकुश राणे की हत्या के रहस्य का घेरा बरकरार ही है। प्रतीक पवार के हमले के साथ ही इन हत्याकांडों की भी जांच हुई तो अच्छा होगा। नवहिंदुत्व वादी नेताओं ने मुद्दे को सुर्खियों में ला ही दिया है इसलिए हम लोगों के ज्ञान में वृद्धि कर रहे हैं!

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