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संपादकीय : कांग्रेस से डर क्यों?

देश के विपक्षी दलों की असली दिशा क्या है, ऐसा सवाल अब खड़ा हो गया है। देश के विपक्षी दलों का एक सम्मेलन तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. चंद्रशेखर राव ने अपने राज्य में आयोजित किया। इसमें अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, केरल के पिनाराई विजयन जैसे नेता शामिल हुए थे। के.सी. चंद्रशेखर राव ने राष्ट्रीय राजनीति में कूदने का पैâसला किया और उसके लिए भारत राष्ट्र समिति नामक एक नई पार्टी की स्थापना की। उन्होंने नई पार्टी बनाई लेकिन उसका प्रभाव केवल तेलंगाना में ही बड़ा है। केसीआर को राष्ट्रीय राजनीति की आस लगी और वे देश के कुछ प्रमुख विपक्षी नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं। उससे क्या होगा? मूलरूप से, केसीआर और अन्य को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनका गठबंधन वास्तव में भाजपा विरोधी है या कांग्रेस विरोधी? इन सभी को भाजपा से ज्यादा कांग्रेस पार्टी नंबर वन राजनीतिक दुश्मन लगती है और यह विचार विपक्ष के किसी भी गठबंधन को मजबूती नहीं देगा। अखिलेश, केजरीवाल, विजयन, नीतिश कुमार को किससे लड़ना है? कांग्रेस को कमजोर करके ये लोग भाजपा से वैâसे लड़ेंगे? गुजरात में ‘आप’ ने विधानसभा चुनाव लड़ा था। ऐसे में अगर सबसे ज्यादा फायदा किसी को हुआ है तो वो केवल भाजपा को। गुजरात में भाजपा की क्रांतिकारी जीत का पूरा श्रेय ‘आप’ को ही दिया जाना चाहिए। इससे पहले गोवा में भी ऐसा ही हुआ था। यह विपक्ष द्वारा समन्वय की भूमिका नहीं अपनाए जाने का यह नतीजा है। विषय केवल चुनाव का नहीं है, बल्कि देश में पनप रही तानाशाही प्रवृत्ति का है। न्यायपालिका से लेकर देश के सभी प्रमुख स्तंभों पर हमले हो रहे हैं। संविधान और अदालतों का निजीकरण हो रहा है तो विपक्ष के चेहरे दसों दिशाओं में वैâसे रह सकते हैं? उनके दो पैर हैं। रास्ता एक है, लेकिन दस सिर और दस मुखों से बोलना, विचार किया जा रहा है। राष्ट्रीय राजनीति की चाहत रखनेवाली ये सभी पार्टियां क्षेत्रीय हैं और उन्हें कांग्रेस को दूर रखना है। कांग्रेस से उन्हें डर क्यों लगता है? कांग्रेस पार्टी के सांसदों की संख्या ‘सौ’ के पार जाना जरूरी है और आज यह क्षमता केवल कांग्रेस में है। कांग्रेस का सौ का आंकड़ा पार हो गया तो दिल्ली का मौजूदा दिखावा सहज गिर जाएगा। इसका ध्यान राष्ट्रीय राजनीति में कूदने वाले सभी को रखना चाहिए। केजरीवाल की पार्टी ने पंजाब और गुजरात में कांग्रेस को नोचकर खा लिया। उसे भाजपा को नोचना चाहिए था। ऐसा हुआ होता तो वे असली राष्ट्रपुरुष साबित होते। ‘केसीआर’ के सम्मेलन में केजरीवाल, अखिलेश आदि शामिल हुए, लेकिन देश की तानाशाही प्रवृति के खिलाफ श्री राहुल गांधी की जो भारत जोड़ो यात्रा निकली है, वह दिल्ली और लखनऊ पहुंची तब इन्हीं लोगों ने उस यात्रा से पीठ फिरा ली थी। कागजी शुभकामनाएं और प्रत्यक्ष सहभागिता में फर्क होता है। राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा को लोगों का समर्थन मिल रहा है, इसका डर तो भाजपा को लगना चाहिए, भाजपा के विरोधियों को क्यों लगे? कांग्रेस पार्टी से हमारा वैचारिक मतभेद हो सकता है लेकिन जिस भाजपा से हमारा वैचारिक मतभेद नहीं था, इस भाजपा ने देश में ऐसे कौन से दीप जलाए? आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में कभी नहीं हुई, उतनी अराजकता पैâली हुई है। हिंदू विरुद्ध मुसलमान और भारत विरुद्ध पाकिस्तान यही उनका राजनीतिक कार्यक्रम है। न्यायालय विरुद्ध सरकार जैसे संघर्ष की भी चिंगारी गिर गई है। किसान बेचैन हैं, इसका फायदा विपक्ष एकजुटता के साथ नहीं उठा पा रहा है तो वैâसे चलेगा? कांग्रेस को छोड़कर या कांग्रेस को दूर रखकर विपक्षी गठबंधन करना संभव नहीं है। जो इन विचारों से सम्मेलन आयोजित करके राष्ट्रीय राजनीति में यलगार कर रहे हैं, वे एक तरह से भारतीय जनता पार्टी के लिए २०२४ का रास्ता साफ कर रहे हैं। के.सी. चंद्रशेखर राव के इरादे भले ही नेक हों, लेकिन उन्हें तटस्थ रुख अपनाना होगा। उनकी सभा में भारी भीड़ जुटी। उन्हें लगता है कि यह भीड़ यानी देश में बड़े बदलाव का संकेत है। श्री गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा में भी राज्यों-राज्यों में भारी भीड़ उमड़ रही है, लेकिन अगर भीड़ होती भी है तो उन्हें देखना होगा कि कांग्रेस पार्टी जमीन पर कितनी बची है। भीड़ से माहौल बनता है। गुजरात में ‘आप’ की सभाओं में भी बड़ी भीड़ हुई और हिमाचल प्रदेश में मोदी की सभाओं में भीड़ हुई, लेकिन परिणाम क्या आया? राहुल गांधी साढ़े चार हजार किलोमीटर की पदयात्रा कर चुके हैं। उनके भारत भ्रमण का आखिरी चरण चल रहा है। इसकी प्रशंसा राष्ट्रीय राजनीति के विपक्षी दल के कितने नेताओं ने की? राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा से भारतीय जनता पार्टी डगमगाई हुई है। यात्रा बाधित करने के लिए कोरोना का डर जताया गया, लेकिन विपक्षी दल अचंभित क्यों हुए? सभी विपक्षी दलों के लिए एकजुट होने का यही समय है। प. बंगाल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, बिहार, केरल, राजस्थान जैसे राज्यों ने ध्यान दिया तो अन्य राज्यों में भी जागरण होगा। हर कोई नई आजादी और क्रांति की मशाल जलाना चाहता है, लेकिन लोकनायक जयप्रकाश नारायण बनना आसान नहीं है। दिमाग स्थिर रखकर जमीनी सच्चाई को समझकर कदम उठाने होंगे, अगर ऐसा हुआ तभी २०२४ में निश्चित रूप से बदलाव होगा। नहीं तो सौ रसोइयों द्वारा बनाई गई सब्जी स्वादहीन जैसा हाल हो जाएगा! लोकसभा चुनाव को ४०० दिन शेष रह गए हैं, ऐसा श्री मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा है। देश के विपक्षी दलों के लिए भी यह चेतावनी है।

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