मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : कुश्ती जीती; मस्ती उतरी!

संपादकीय : कुश्ती जीती; मस्ती उतरी!

केंद्र सरकार ने आखिरकार नवनिर्वाचित राष्ट्रीय कुश्ती महासंघ को भंग कर दिया है। देर ही सही, लेकिन मोदी सरकार को ये सद्बुद्धि आ गई ये महत्वपूर्ण बात है। पिछले साल से राष्ट्रीय महासंघ, उसके विवादास्पद नए-पूर्व अध्यक्ष और ओलंपिक पदक विजेता पहलवानों के बीच संघर्ष शुरू है। साक्षी मलिक, बजरंग पुनिया समेत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम ऊंचा करने वाले अन्य पहलवान एक साल से महासंघ के पूर्व अध्यक्ष सांसद बृजभूषण की मनमानी के खिलाफ लड़ रहे हैं, महिला पहलवानों के यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। उन्होंने पीड़ित पहलवानों को न्याय दिलाने के लिए हरसंभव विरोध प्रदर्शन किया, लेकिन मोदी सरकार के कानों के परदे जरा भी नहीं कांपे। पिछले साल दिल्ली के ‘जंतर-मंतर’ पर महिला पहलवानों के विरोध प्रदर्शन को दिल्ली पुलिस ने जबरन उखाड़कर रख दिया था। आधी रात को घुसकर पुलिस ने बल प्रयोग कर पहलवानों को उठाया और उनके आंदोलन को दबाने की कोशिश की। यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार के आशीर्वाद और उनके आदेश के चलते ही दिल्ली पुलिस ने यह कार्रवाई की थी। लेकिन इतना सब होने के बावजूद पहलवानों की लड़ाई जारी रही। बीच के दौर में विवादास्पद अध्यक्ष बृजभूषण के अपने पद से हटने से ऐसा लगने लगा कि मामला कुछ हद तक शांत हो गया है, लेकिन हाल ही में हुए कुश्ती संघ के चुनाव में अध्यक्ष पद की माला संजय सिंह के गले में प़ड़ते ही पहलवानों के आंदोलन की दबी हुई भाप उभर कर बाहर आ गई। क्योंकि संजय सिंह बृजभूषण के करीबी तो थे ही, साथ ही उतने ही विवादास्पद भी थे। कुश्ती महासंघ में हुआ यह बदलाव न्याय की लड़ाई लड़ रहे पहलवानों के लिए ‘पंत गए, राव लड़े’ जैसा ही था। इसलिए उनके गुस्से की चिंगारी का फिर से भड़कना अपेक्षित ही था और वह भड़की भी। ओलंपिक पदक विजेता साक्षी मलिक ने कुश्ती से संन्यास की घोषणा की। बजरंग पुनिया ने ‘पद्मश्री’ अवॉर्ड सीधे प्रधानमंत्री आवास के बाहर सड़क पर रखकर विरोध जताया। पहलवान वीरेंद्र सिंह ने भी ‘पद्मश्री’ लौटाने का एलान किया। राष्ट्रीय कुश्ती महासंघ के विवाद की धूल का फिर से आंखों में जाना आगामी लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में मोदी सरकार वैâसे बर्दाश्त कर सकती थी? पिछले एक साल से पहलवानों की आपत्तियों और उनके आंदोलन को लेकर भले ही केंद्र सरकार नींद में रहने का नाटक करती रही। विवादास्पद बृजभूषण पर रखा उनका वरदहस्त कायम ही रहा। लेकिन अब लोकसभा चुनाव के सिर पर होने के चलते यह विवाद महंगा पड़ेगा, इसका एहसास होते ही मोदी सरकार की नींद खुल गई और राष्ट्रीय कुश्ती महासंघ के नवनिर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह को बर्खास्त करने का निर्णय लिया गया, यह स्पष्ट है। लोकसभा चुनाव होने में कुछ समय और होता तो शायद मोदी सरकार पहलवानों के आंदोलन को लेकर ‘आंखें मूंदकर सोए रहना’ जारी रखती। पहलवानों को भी न्याय के लिए अपना संघर्ष जारी रखना पड़ता। शायद कुछ और पहलवानों को अपना करियर दांव पर लगाना पड़ता। उन्हें उनके पुरस्कार और पदकों को प्रधानमंत्री के निवास स्थान के बाहर सड़कों पर रखने की तैयारी करनी पड़ती। हालांकि, राष्ट्रीय कुश्ती महासंघ को नए पदाधिकारियों सहित भंग कर देने से पहलवानों को फिलहाल पूर्ण न्याय तो नहीं, लेकिन राहत जरूर मिली है। बेशक, पहलवान और कुश्ती प्रेमी इतने पर ही नहीं ठहर सकते। बर्खास्तगी का डंडा चलने के बाद आरोपियों के घेरे में आए महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण की कमर झुक गई है, उनका दबदबा कम हो गया है और अकड़ भी उतर गई है। इसे हिंदुस्थानी कुश्ती के लिए एक शुभ संकेत कहा जा सकता है। राष्ट्रीय कुश्ती महासंघ की बर्खास्तगी पहलवानों के संघर्ष की पहली जीत है। बेशक, एक साल तक सोने का नाटक करने वाली मोदी सरकार लोकसभा चुनाव के कारण जाग गई है। ऐसे में अब मोदी सरकार के थोड़े कांपते हुए कान के परदे फिर से बहरे न हो जाएं, इसके लिए पहलवानों को अब हुंकार देते-नगाड़े बजाते रहना होगा। फिलहाल राष्ट्रीय कुश्ती महासंघ में कुश्ती जीत गई है और मस्ती उतर गई है, बस इतना ही!

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