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संपादकीय : हां, मोदी जा रहे हैं!

महाराष्ट्र में मतदान खत्म हो गया है। पांचवें चरण के लिए देशभर की ४९ सीटों पर मतदान हुए, इसमें महाराष्ट्र की १३ सीटें शामिल हैं। मुंबई, ठाणे, भिवंडी, कल्याण, डोंबिवली, पालघर, धुले, डिंडोरी, नासिक जैसे महत्वपूर्ण इलाकों के नतीजे ‘ईवीएम’ में बंद हो गए। इस दिन आम जनता ही मतदाता राजा होती है। इस राजा को खरीदने के प्रयोग भी अंत तक जारी रहे। कहा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी और उसकी दो अन्य फर्जी कंपनियों ने एकेक निर्वाचन क्षेत्र में सौ-सौ करोड़ रुपए का खेल खेला। उससे पहले बारामती में भी यही खेल खेला गया। लोगों को भ्रष्ट बनाकर चुनाव जीतने का यह तरीका देश के लिए खतरनाक है। बताया जा रहा है कि बारामती में अजीत पवार के घर के नौकरों को भी नकदी देकर मतदान के लिए भेजा गया। अगर यही हाल है तो हम लोकतंत्र और आजादी की माला क्यों जपते रहें? मोदी युग लोकतंत्र के लिए सबसे अशुभ समय साबित हुआ। मोदी और उनके लोगों ने एक बार फिर दिखा दिया है कि लोकतंत्र, चुनाव और जीत पैसे की ताकत से खरीदी जा सकती है। लोगों की बुनियादी स्वतंत्रताएं जैसे विचार की स्वतंत्रता, अधिकारों की स्वतंत्रता, संचार की स्वतंत्रता और संगठन की स्वतंत्रता को संसद में बहुमत द्वारा नहीं छीना जा सकता है। इन स्वतंत्रताओं का होना लोकतंत्र की पहचान है। मोदी दोबारा सत्ता चाहते हैं, संविधान को पूरी तरह से बदलने के लिए। शायद वे एक नई संविधान समिति बनाएंगे, जिसमें हेमंत बिस्वा सरमा, अजीत पवार, एकनाथ शिंदे सदस्य होंगे और भाजपा के ही किसी एक वकील को संविधान समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर नया संविधान लिखवा लेंगे; लेकिन अनुच्छेद ३६८ में कहा गया है कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति असीमित नहीं है। संविधान ने संसद का निर्माण किया है। इसलिए संविधान का अधिकार संसद से ऊपर है और हां, जनता का अधिकार संविधान से ऊपर है। इसलिए संविधान को आसानी से नहीं बदला जा सकता और लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे। देश की जनता इस तरह की गुलामी कभी भी स्वीकार नहीं करेगी। पिछले दस वर्षों में लोकतंत्र और संविधान का पतन हो गया है। प्रधानमंत्री तानाशाह ही बन गए। जहां जनता संप्रभु है, वहां प्रधानमंत्री संप्रभु बन गए। सत्ता का केंद्रीकरण, अधिकारों का केंद्रीकरण, सिर्फ एक ही व्यक्ति की जय जयकार, मत स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, राजनीतिक विरोधियों और अदालतों का दमन, नागरिकों में आतंक, ये सब किसके लक्षण हैं? तानाशाह का यही तो आहार होता है। लोकतंत्र में कोई नेता ऐसे सार्वभौमिक अधिकार की मांग नहीं करता। विचारों पर प्रतिबंध और सत्ता के केंद्रीकरण से ही तानाशाही पनपती है। मोदी और उनकी पार्टी को सामान्यत: ४३ फीसदी वोट मिलते हैं। इसमें गुजरात और उत्तर प्रदेश राज्यों की बड़ी हिस्सेदारी है। कई राज्य तो ऐसे हैं, जो मोदी के अस्तित्व को मानने को तैयार ही नहीं हैं। ऐसे समय में यह मान लेना कितना उचित होगा कि ४३ प्रतिशत मतदाताओं का मतलब पूरा देश है? जब से मोदी का उदय हुआ है, देश में लाचारी और लालच का तांडव शुरू है। हिंदू-मुस्लिम झगड़े लगाकर चुनावों की दिशा बदलना, जगह-जगह रामध्वज फहराकर लोगों को अंधभक्त बनाना और इसका विरोध करने वालों को जेल में पहुंचाना इस तरह का दमनकारी कार्यक्रम पिछले १० वर्षों से चलाया जा रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने यह खबर पैâलाकर क्या हासिल किया कि मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है? कोई भी समझदार व्यक्ति भारत की जनसंख्या वृद्धि का समर्थन नहीं करेगा। जनसंख्या वृद्धि की समस्या बहुत गंभीर है और हमें इसका निर्णायक समाधान करना होगा। तो मोदी ने अपने दस साल के कार्यकाल में जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्या किया? यह समस्या सिर्फ हिंदू-मुसलमान कह देने से हल नहीं होगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ विद्वानों का कहना है कि मुसलमानों की आबादी को चुनौती देने के लिए हिंदुओं को परिवार नियोजन नहीं करना चाहिए और बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करने चाहिए, यह कैसा हिंदुत्व है? इसके उलट यह हिंदू धर्म का अपमान है। मोदी और उनकी पार्टी लोकतंत्र का गला घोंटकर शासन करती रही, जबकि देश में हालात बिगड़ते गए और आर्थिक अराजकता पैâल गई। मोदी ने तानाशाही, कट्टरता, भ्रष्टाचार, मक्कार और दल-बदल जैसी विकृत चीजों का खुले तौर पर समर्थन किया। इसलिए प्रधानमंत्री के मामले में उनकी तुलना नेहरू, गांधी, मनमोहन सिंह, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी से कभी नहीं की जाएगी। मोदी ने लोगों को डर के साये में रखा। लोग मूर्ख हैं और मूर्ख ही रहेंगे यह मानते हुए सत्ता का भोग किया। इस चुनाव ने यह दर्शा दिया कि लोग मूर्ख नहीं हैं, देश में तानाशाही के खिलाफ निडर होकर मतदान करने की तस्वीर देखने को मिली। तानाशाह मोदी जा रहे हैं। इस बाबत महाराष्ट्र ने पहल की। मर्द मर्‍हाठी जनता का अभिनंदन!

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