मुख्यपृष्ठस्तंभसियासतनामा: चुनावी चोट का इलाज

सियासतनामा: चुनावी चोट का इलाज

सलमान सैयद। सारे अनुमानों और संभावनाओं को दरकिनार कर आखिर योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की कमान संभाल ली। दोबारा सरकार बनाने के बाद कई चुनौतियों से निपट पाना इस बार योगी के लिए आसान भी नहीं होगा। योगी पर ठाकुरवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। वे ब्राह्मण विरोधी हैं, इस बात के सबूत के तौर पर विकास दुबे का एनकाउंटर और बाहुबली धनंजय सिंह का जेल से बाहर होना सबसे ज्यादा प्रचारित किया जाता है। ऐसे में इस नकारात्मक छवि को तोड़ने के लिए योगी और भाजपा को ब्राह्मण समाज के एक नेता की जरूरत थी, जो फिलहाल ब्रजेश पाठक पर जाकर थम गई है। केशव प्रसाद मौर्या के साथ पाठक को भी उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। मुस्लिम समाज से पिछड़े समाज के नेता दानिश आजाद को भी मंत्रिमंडल में जगह मिली है। ब्राह्मण और पिछड़े मुस्लिम समाज को साधने की यह सारी कवायद बता रही है कि गत चुनाव में पहले से पिछड़ गए योगी को चोट गहरी लगी है। शायद इसीलिए जातीय समीकरण साधकर उसका इलाज किया जा रहा है।

केजरीवाल का बढ़ता दायरा
क्या अरविंद केजरीवाल मोदी का नया पर्याय बनकर उभर रहे हैं? सियासी गलियारों में चल रही इस चर्चा को इसलिए भी बड़े चाव से सुना और बोला जा रहा है क्योंकि केजरीवाल ने दिल्ली के बाद पंजाब के रूप में दूसरा सूबा भी फतह कर लिया है। भाजपा और कांग्रेस के बाद एकमात्र केजरीवाल ही हैं, जो दो राज्यों में अपनी खुद की बहुमत वाली सरकार बनाने में कामयाब हुए हैं। गोवा चुनाव में भी दो सीटें जीतकर आप ने अपना दायरा बढ़ाया है। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने के लिए आप को चार या अधिक राज्यों में कम से कम ६ प्रतिशत वोट शेयर की जरूरत होगी। आप ने अब तक तीन राज्यों में यह उपलब्धि हासिल कर ली है। पिछले दिनों ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर उनका बयान, पीएम सहित भाजपा पर किया गया उनका करारा प्रहार और आत्मविश्वास से भरी बॉडी लैंग्वेज इस बात की तरफ इशारा कर रही है कि केजरीवाल अपने लिए नई राष्ट्रीय भूमिका तय करने में लग गए हैं। यह महज वक्ती सियासी उबाल है या इसके दूरगामी नतीजे निकलेंगे, अभी कहना जल्दबाजी है लेकिन बंदे ने भाजपा की नींद तो उड़ा दी है।

नतमस्तक हुए नीतीश
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में बिहार के सीएम नीतीश कुमार का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विशिष्ट मुद्रा में अभिवादन करना चर्चा का विषय बन गया है। कभी बिहार में नीतीश की तूती बोलती थी। वे लालू के साथी रह चुके थे लेकिन उनके साथ कब उनका मतभेद हुआ, कब वे लालू के खिलाफ हुए, कब वे फिर लालू के साथ आए और फिर कब छिटक गए। यह बिहार की जनता के लिए किसी अबूझ पहेली से कम नहीं है। किसी दौर में वह साथ रहकर भी बिहार की राजनीति में भाजपा पर पूरी तरह हावी रहे। मुस्लिम वोटों के प्रेम में गठबंधन की राजनीति के बावजूद नीतीश ने नरेंद्र मोदी को बिहार में प्रचार करने से दूर रखकर अपनी धौंस जमाई थी। मोदी से नफरत की यहां तक की इंतेहा थी कि एक बार तो उन्होंने गुजरात सरकार द्वारा बाढ़ राहत के तौर पर भेजे गए पांच करोड़ की सहायता राशि भी वापस कर दी थी। लेकिन अपनी कुर्सी और अपने हित को लेकर अब वे इतना लाचार हो गए हैं कि मोदी के सामने इस कदर नतमस्तक हो गए कि बस चरण छूना ही बाकी रह गया था।

नेतागिरी पूरी फिल्मी है
कुछ सफल-असफल फिल्म और टीवी कलाकारों का साथ पाकर भाजपा फूले नहीं समाती। अब तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी फिल्म प्रचारक की भूमिका में आ गए हैं। इतिहास की पुस्तकें बेमानी होती जा रही हैं। भाजपा का आईटी सेल व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के जरिए ऐसी-ऐसी जानकारियां परोसता है कि बस भगवान ही बचाए। राज्यपाल तक ‘गुरु-शिष्य’ वाली ऐसी बात बोल देते हैं कि लोग दांतों तले उंगलियां दबा लें। फिल्मी चस्का ऐसा चढ़ा कि अब टीम भावना सीखने के लिए भी फिल्मों का सहारा लिया जा रहा है। हरियाणा में नगर परिषद और पालिका चुनाव के लिए भाजपा की तरफ से अपने कार्यकर्ताओं को ‘चक दे इंडिया’ और ‘लगान’ जैसी फिल्में दिखाने की बात की जा रही है। फिल्म ‘केसरी’ का प्रस्ताव भी आया मगर माना गया कि केसरी बेशक टीम भावना को प्रदर्शित करनेवाली अच्छी फिल्म है लेकिन फिल्म का अंत दुखद है इसलिए उसे रिजेक्ट कर दिया गया। कोई बताएगा कि कथित तौर पर देशद्रोही घोषित किए गए दो खानों की फिल्म देखना किस देशभक्ति की श्रेणी में आता है?

(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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