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भाजपा शासित राज्यों में सूख रहा है रोजगार, सुस्त हुआ कारोबार!

• गुजरात, हिमाचल प्रदेश और असम की स्थिति है खराब
• इन राज्यों से लोगों का हुआ है पलायन
• ‘ईपीएफओ’ के डेटा से हुआ खुलासा
सामना संवाददाता / मुंबई
विकास के मुद्दे पर भाजपा पूरे देश में ‘गुजरात मॉडल’ का ढोल पीटती रहती है। मगर देखा जाए तो यह सिर्फ छलावा है। क्योंकि अगर सचमुच में वहां पर विकास हुआ होता तो वहां पर्याप्त मात्रा में रोजगार उत्पन्न होता रहता और वहां के लोगों को इसके लिए बाहर पलायन नहीं करना पड़ता। न सिर्फ गुजरात, बल्कि भाजपा के एक बड़बोले मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के राज्य असम की भी यही कहानी है। एक अन्य भाजपा शासित राज्य हिमाचल प्रदेश में भी रोजगार की हालत दयनीय है। इन तीनों ही राज्यों पर भाजपा काफी गर्व करती है, पर ‘ईपीएफओ’ के जो आंकड़े आए हैं, उससे पता चलता है कि इन भाजपा शासित राज्यों में कारोबार काफी सुस्त है, जिससे वहां रोजगार के अवसर सूख रहे हैं। इस वजह से वहां लोगों का पलायन भी दूसरे राज्यों में हो रहा है।

बता दें कि २२ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से ६ ने इस बार सितंबर तिमाही में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में युवाओं के लिए कम औपचारिक नौकरियां सृजित की हैं। ‘ईपीएफओ’ (कर्मचारी भविष्य निधि संगठन) द्वारा जारी आंकड़े के अध्ययन करने पर यह जानकारी सामने आई है। इन ६ राज्यों में से ३ राज्य भाजपा द्वारा शासित हैं। ये हैं गुजरात, असम और हिमाचल प्रदेश। इसके अलावा ३ अन्य राज्य हैं पंजाब, राजस्थान व झारखंड। इनमें पंजाब में ‘आप’ की, राजस्थान में कांग्रेस व झारखंड में झामुमो की सरकारें हैं।
‘ईपीएफओ’ के आंकड़े बताते हैं कि गुजरात में इस बार नए रोजगार ‘माइनस’ में है। आंकड़ों के अनुसार यह -३.४ फीसदी है। असम में यह -३.७ फीसदी और हिमाचल प्रदेश की स्थिति -१०.३ फीसदी के साथ सबसे खराब रही। बाकी के राज्यों में पंजाब (-१२.४ फीसदी), झारखंड (-७.२ फीसदी) और राजस्थान (-१.१ फीसदी) हैं। विशेषज्ञों के अनुसार राज्यों ने वित्त वर्ष २२-२३ की दूसरी तिमाही में पिछले साल की तुलना में ‘ईपीएफओ’ सदस्यों की संख्या में गिरावट दर्ज की है। विश्लेषण में असम को छोड़कर उत्तर-पूर्वी राज्यों को शामिल नहीं किया गया था। १८-२८ आयु वर्ग के सदस्यों को श्रम बाजार में पहली बार काम करनेवाले के रूप में देखा जाता है, इस प्रकार यह नौकरी बाजार की मजबूती को दर्शाती है।
टीमलीज सर्विसेज की सह-संस्थापक और कार्यकारी निदेशक रितुपर्णा चक्रवर्ती ने कहा कि ‘ईपीएफओ’ सदस्यों में युवाओं की कम संख्या का कारण इन राज्यों से इनका पलायन है (घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों)। उन्होंने कहा, ‘इन राज्यों के युवा अपने पलायन के बाद काफी अधिक कमाने के लिए खड़े हैं। भले ही उन्हें इन राज्यों के बाहर अनौपचारिक नौकरियां मिली हों।’ इस सूची में देश के अन्य राज्यों की हालत बेहतर दिखाई गई है। हालांकि, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इकोनॉमिक एंड सोशल प्लानिंग के प्रोफेसर हिमांशु कहते हैं कि ‘ईपीएफओ’ ग्राहकों की संख्या इन राज्यों में औपचारिक रोजगार की स्थिति को बिल्कुल प्रतिबिंबित नहीं करती है, क्योंकि एक मौजूदा कर्मचारी भी ईपीएफओ की सदस्यता ले सकता है। हाल के वर्षों में, सरकार ने औपचारिकता बढ़ाने के लिए फर्मों को प्रोत्साहन प्रदान किया, जिसके परिणामस्वरूप ईपीएफओ सदस्यता में वृद्धि हुई।’

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