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इथेनॉल ने किया ऑमलेट पर वार!

ईंधन निर्माताओं ने बढ़ाई टूटे अनाज की खरीद
मुर्गियों के चारे में आई भारी कमी
सोयाबीन और मक्के पर आयात शुल्क घटाने की हुई मांग

सरकार चाहे आंकड़ों में कुछ भी बाजीगरी करे पर हिंदुस्थान में महंगाई एक बार जो बढ़ती है तो फिर वह कम होने का नाम ही नहीं लेती। साग, सब्जियों से लेकर खाने-पीने की हर चीज महंगी होती जा रही है। अब इसी कड़ी में प्रोटीन का सबसे सस्ता व सुलभ खाद्य पदार्थ अंडा भी जुड़ गया है। ऐसे में आपके प्लेट का ऑमलेट आपकी जेब ज्यादा ढीली करनेवाला है। यह सारी करामात इथेनॉल की है। इसी इथेनॉल ने ऑमलेट पर वार किया है। इथेनॉल के लिए चीनी मिलों पर रोक लगने के बाद र्इंधन निर्माता टूटे अनाज की खरीदारी कर रहे हैं। ऐसे में मुर्गियों के चारे पर
महंगाई की मार पड़ी है और इसकी कीमतों में प्रति अंडे एक रुपए का उछाल आया है। पोल्ट्री उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अभी तो शुरुआत है। चारे की जिस तरीके से कमी है और मक्के व सोयाबीन के अलावा टूटे चावल की कीमतों में आई तेजी से संकट और बढ़ने वाला है। ऐसे में ‘संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे’ के सामने मुश्किल आनेवाली है और इसकी कीमतें जल्द ही १०० रुपए दर्जन से ऊपर जा सकती हैं।
देश में मक्के व सोयाबीन का आयात किया जा रहा है। मुर्गियों के चारे के रूप में इसका इस्तेमाल होता है। मक्का पर करीब ५० फीसदी और सोयाबीन पर करीब २० फीसदी आयात शुल्क है। अब पोल्ट्री उद्योग केंद्र सरकार से मक्का और सोयाबीन पर आयात शुल्क कम करने का अनुरोध करने जा रहा है। असल में टूटा चावल और मक्का पोल्ट्री फीड के मुख्य घटक हैं। अब उद्योग को डर है कि आने वाले महीनों में मक्का और टूटे चावल की कीमतें बढ़ेंगी क्योंकि इथेनॉल के लिए इन दो कच्चे माल के डायवर्जन की उम्मीद है। इथेनॉल के लिए गन्ने के रस के उपयोग पर प्रतिबंध के कारण इसकी आशंका है। ‘सीएलएफएमए’ ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सुरेश देवड़ा कहते हैं, ‘हम केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मक्का और सोयाबीन पर आयात शुल्क कम करने का अनुरोध करने जा रहे हैं।’ सोयाबीन की फसल लगभग ३० फीसदी खराब हो गई है। चूंकि सरकार इथेनॉल के लिए मक्का के उपयोग को बढ़ावा देने की योजना बना रही है, इसलिए पोल्ट्री उद्योग को चारे के लिए मक्का प्राप्त करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।’ एक चावल व्यापारी, राजेश जैन पहाड़िया के अनुसार, ‘पिछले छह महीनों में टूटे हुए चावल की कीमतें २२ से बढ़कर २६ रुपए किलोग्राम हो गई हैं।’ पोल्ट्री और इथेनॉल दोनों उद्योग तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि मक्के के उत्पादन में पिछले पांच वर्षों में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। उद्योग जगत ने दावा किया है कि टूटे हुए चावल की उपलब्धता काफी कम हो गई है। बता दें कि मक्का, टूटे चावल आदि अनाज पोल्ट्री फीड के प्रमुख तत्व हैं, जो उत्पादन लागत का ६५ फीसदी हिस्सा हैं। पिछले छह महीनों के दौरान, टूटा हुआ चावल मक्के की तुलना में अधिक महंगा हो गया है। इसकी उपलब्धता भी काफी कम हो गई है। अनियमित मानसून के कारण कर्नाटक, तेलंगाना में मक्के का उत्पादन काफी कम होने वाला है। टूटे हुए चावल की मांग के साथ, इथेनॉल उद्योग में मक्के की मांग बढ़ने वाली है। एफसीआई स्टॉक से इथेनॉल के लिए चावल की उपलब्धता सीमित रहने वाली है, जिसके कारण पहले से ही डिस्टिलरीज से मक्के की मांग बढ़ गई है। पोल्ट्री और डिस्टिलरीज के बीच मक्के के लिए प्रतिस्पर्धा से मक्के की कीमतों में वृद्धि होगी। हालांकि, मक्के के आयात से कीमतों को नियंत्रण में रखने और आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

पोल्ट्री कंपनियों ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर पोल्ट्री उद्योग के लिए आयात शुल्क में कटौती की मांग की। मक्का और सोयाबीन का इस्तेमाल मुर्गियों के चारे के लिए होता है। देश में मक्का, और सोयाबीन की कमी है और आयातित अनाज महंगा पड़ रहा है।’

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