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७५ साल बाद भी हैं… मुंबई में अंग्रेज मौजूद! …१० रेलवे स्टेशनों को है देसी नामों का इंतजार

•  केंद्र सरकार के पास बरसों से पड़ा है प्रस्ताव
• सिर्फ एलफिंस्टन रोड का नाम बदलकर हुआ प्रभादेवी
• इलाहाबाद और फैजाबाद स्टेशन का नाम बदल चुका है केंद्र
सुजीत गुप्ता / मुंबई
हिंदुस्थान को स्वतंत्र हुए ७५ साल हो गए हैं। इस अवसर पर देश में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। इन ७५ वर्षों में देश में बहुत बदलाव आया लेकिन मुंबई की जनता को एक बदलाव का बरसों से इंतजार है। ७५ वर्ष बाद भी मुंबई में आज अंग्रेज मौजूद हैं। दरअसल, मुंबई के १० ऐसे प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं, जिन्हें आज भी अंग्रेजों के नाम से जाना जाता हैं। इन रेलवे स्टेशनों को देसी नामों का लंबे समय से इंतजार है। नाम बदलने का यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास बरसों से पड़ा है।
दक्षिण-मध्य मुंबई में अनेक रेलवे स्टेशन आज भी अंग्रेजों के नाम से ही जाने जाते हैं। इन स्टेशनों का नाम बदलकर उसे देसी नाम देने का प्रस्ताव राज्य विधानसभा में एकमत से मंजूर कर केंद्र सरकार के पास भेजा गया है, परंतु यह प्रस्ताव बरसों से केंद्र के पास प्रलंबित है। २०१८ में केवल पश्चिम रेलवे के एलफिंस्टन स्टेशन का नाम बदलकर प्रभादेवी किया गया। इसके लिए भी लोकसभा चुनाव क्षेत्र के सांसदों के निरंतर प्रयास के बाद यह संभव हुआ। मुंबई में अब भी ऐसे करीब १० स्टेशनों से अधिक हैं, जिन्हें अंग्रेजों के नाम से अभी भी पुकारा जाता है। मुंबई के जिन स्टेशनों का नाम बदलने का प्रस्ताव है उनमें चर्चगेट का नरीमन प्वाइंट, मरीन लाइंस का कालबादेवी, चर्नी रोड का गिरगांव, ग्रांट रोड का गांवदेवी, मुंबई सेंट्रल टर्मिनस का जगन्नाथ शंकर सेठ टर्मिनस, लोअर परेल का वरली, सैंडहर्स्ट रोड का डोंगरी, करी रोड का लालबाग, सायन का शिव और रे रोड का काला चौकी नाम देने का प्रस्ताव है।

केंद्र सरकार ने इलाहाबाद का नाम प्रयागराज, मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पंडित दीन दयाल उपाध्याय, रॉबर्ट गंज स्टेशन का सोनभद्र रेलवे स्टेशन, पैâजाबाद जंक्शन का अयोध्या वैंâट, इसी तरह राजस्थान में मियाका बड़ा रेलवे स्टेशन को महेश नगर नाम दिया गया है। इसी तरह देश के कई रेलवे स्टेशन जिनका नाम अंग्रेजों के जमाने में रखा गया था, उन्हें बदला गया है।

सरकार को अंग्रेजों के नामवाले स्टेशन का नाम बदलना चाहिए और उसकी जगह पर समाज सेवी, स्वतंत्रता सेनानी, टाटा, बिरला आदि महानुभावों का नाम रखा जाना चाहिए, ताकि उन्हें भी सम्मान मिल सके।
-राजीव सिंगल ‘समाजसेवी’

हम आजादी का ७५वां वर्ष मना रहे हैं, लेकिन आज भी हम अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम बने हुए हैं। फिर हमने ७५ साल में क्या हासिल किया? देश की आजादी में कई महापुरुषों ने अपना बलिदान दिया। अब तक उन महापुरुषों, समाज सेवकों का नाम स्टेशनों को दे दिया जाना चाहिए था लेकिन इस छोटे से काम को अभी तक सरकार ने अधूरा ही रखा है। सरकार जल्द-से-जल्द स्टेशन का नाम बदले, ताकि उनको सम्मान दिया जा सके।
-नंद कुमार देशमुख (ठाणे रेलवे प्रवासी संघ)

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