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नोटबंदी के बाद भी नहीं लौटे सभी २,००० के नोट … गुम हो गए रु. १०,००० करोड़!

नोटबंदी के सात साल बाद बाजार में मौजूद नकदी में एक बड़ी गिरावट देखी जा रही है। इस नकदी में ७४,७२८ करोड़ रुपए की गिरावट आई है। जानकारों का मानना है कि यह गिरावट मुख्य रूप से आरबीआई के इस साल १९ मई को २,००० रुपए मूल्यवर्ग के नोटों को प्रचलन से वापस लेने के पैâसले के कारण है। अब सरकार के पास काफी हद तक २,००० रुपए के नोट वापस आ चुके हैं। मगर समय सीमा बढ़ाए जाने के बाद भी करीब १०,००० करोड़ रुपए मूल्य के २,००० के नोट वापस नहीं आए हैं। ऐसे में यह यक्ष प्रश्न है कि इतनी बड़ी रकम आखिर गई कहां?
देश में आए दिन काला धन पकड़ा जा रहा है। मगर इन दिनों उसमें हरे नोट यानी ५०० के नोट ही नजर आते हैं। जानकारों का अनुमान है कि १०,००० करोड़ के नोटों का न आना इस बात का संकेत हो सकता है कि इतनी बड़ी संख्या में २,००० के नोटों का काला धन होगा कि उसे बदलवा पाना संभव नहीं होगा। जितना संभव हुआ लोगों ने बदलवा लिया। सरकार द्वारा ८ नवंबर, २०१६ को नोटबंदी की घोषणा के बाद पहली बार २०२३ की अप्रैल-अक्टूबर अवधि के दौरान जनता के पास मुद्रा में साल-दर-साल २.२८ प्रतिशत की गिरावट आई। अभी भी नकदी भुगतान का पसंदीदा तरीका बनी हुई है। २० अक्टूबर, २०२३ को समाप्त पखवाड़े में चालू वित्त वर्ष में अब तक ७४,७२८ करोड़ रुपए कम होकर ३२.०१ लाख करोड़ रुपए रहा। यह गिरावट मुख्य रूप से २,००० रुपए मूल्यवर्ग के नोटों को प्रचलन से वापस लेने के पैâसले के कारण है। जब २,००० रुपए के नोटों को वापस लेने की घोषणा की गई थी, तब उनका मूल्य ३.६२ लाख करोड़ रुपए था, जबकि १०,००० करोड़ रुपए के नोट अभी भी आरबीआई के पास वापस नहीं आए हैं। हालांकि, जनता के पास नकदी अभी भी ४ नवंबर २०१६ के १७.९७ लाख करोड़ रुपए से ७८ प्रतिशत या १४.०४ लाख करोड़ रुपए अधिक है। जनता के पास नकदी २५ नवंबर, २०१६ को दर्ज की गई ९.११ लाख करोड़ रुपए से २५१ प्रतिशत अधिक है। नवंबर २०१६ में सिस्टम से ५०० रुपए और १,००० रुपए के नोटों को वापस लेने के बाद जनता के पास नकदी, जो ४ नवंबर २०१६ को १७.९७ लाख करोड़ रुपए थी, नोटबंदी के तुरंत बाद जनवरी २०१७ में घटकर ७.८ लाख करोड़ रुपए रह गई थी। जनता के पास मौजूद मुद्रा का निर्धारण बैंकों के पास मौजूद कुल मुद्रा से नकदी घटाने के बाद किया जाता है। प्रचलन में मुद्रा से तात्पर्य किसी देश के भीतर नकदी या मुद्रा से है, जिसका उपयोग उपभोक्ताओं और व्यवसायों के बीच लेनदेन करने के लिए प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। सिस्टम में नकदी लगातार बढ़ रही है, भले ही सरकार और आरबीआई ने ‘लेस वैâश सोसायटी’ पर जोर दिया, भुगतान का डिजिटलीकरण किया और विभिन्न लेनदेन में नकदी के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। नवंबर २०१६ में नोटों की अचानक वापसी ने अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया था। मांग में गिरावट आई थी, व्यवसायों को संकट का सामना करना पड़ा था और जीडीपी की वृद्धि में लगभग १.५ प्रतिशत की गिरावट आई थी। नोटबंदी के बाद कई छोटी इकाइयां बुरी तरह प्रभावित हुर्इं और उनके शटर बंद हो गए। इससे तरलता की कमी भी पैदा हो गई। एक बैंकर ने कहा, ‘जिस बात पर ध्यान देने की जरूरत है वह है मुद्रा और जीडीपी अनुपात, जो नोटबंदी के बाद कम हो गया था।’त्योहारी सीजन के दौरान नकदी की मांग अधिक रहती है, क्योंकि बड़ी संख्या में व्यापारी अभी भी एंड-टू-एंड लेनदेन के लिए नकद भुगतान पर निर्भर हैं। नकदी लेन-देन का एक प्रमुख माध्यम बनी हुई है। देश में भले ही मोदी सरकार हर शख्स का बैंक खाता खोलने का दावा करती हो, पर सच तो यह है कि अभी भी लगभग १५ करोड़ लोगों के पास बैंक खाता नहीं है।

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