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नदियां भी होती हैं उदास!

हृदयनारायण दीक्षित 

शब्द आत्म अभिव्यक्ति के उपकरण होते हैं। वे मन की बात कहने के माध्यम हैं। प्रत्येक शब्द का गर्भ होता है। इस गर्भ में शब्द का अर्थ छिपा होता है। शब्द अपने स्थान के अनुसार भी अर्थ बदलते रहते हैं। शब्द मुस्कुराते हैं। कभी-कभी वे संकोची भी जान पड़ते हैं और कभी-कभी अपने अर्थ के प्रभाव में सबको आच्छादित भी करते हैं। शब्दों की अपनी महिमा है। प्रकृति सृष्टि का अपना संसार है। प्रकृति की अभिव्यक्ति सांसारिक रूपों में होती है। समृद्ध भाषाओं में प्रकृति की प्रत्येक अभिव्यक्ति के लिए अलग-अलग शब्द हैं। कहना कठिन है कि शब्द के भीतर सारा संसार समाया हुआ है या संसार के भीतर सारे शब्द समाए हुए हैं। शब्द संसार के सभी रूपों के प्रतिनिधि हैं। शब्द हंसते हुए दुख और विषाद को कम भी करते हैं। हर्ष और विषाद भी शब्दों के माध्यम से प्रकट होते हैं। शब्द ज्ञानकोष के आज्ञाकारी जान पड़ते हैं। दुनिया का सारा ज्ञान विज्ञान शब्दों में प्रकट हुआ है। इस तरह हमारे सामने दो संसार प्रकट होते हैं। एक संसार रूपों का और दूसरा संसार शब्दों का। कदाचित इसीलिए व्यास जी ने शब्द को ब्रह्म कहा। संस्कृत में ब्रह्म का अर्थ है सतत् विस्त-रमानता। जो प्रतिपल विकसित हो रहा है, सतत् विस्तारशील है, वही ब्रह्म है। वही शब्द है।
भारतीय संस्कृति का प्रचार व प्रसार संस्कृत की प्रचुर भाषा संपदा में हुआ। शब्द सरस्वती तट पर स्तुतिरूपा था। शब्द मंत्र था। शब्द मुद मोद प्रमोद का वाहक बना। चतुर्दिक शब्द। सामने शब्द, पीछे शब्द, दांए शब्द, बांए शब्द। शब्द आकाश का गुण है। शब्द आकाश में था। मंत्र रूप में परम व्योम में था। संप्रति शब्द सामर्थ्य घटी है। चर्चित राजनेता भी शब्द और अपशब्द का भेद नहीं करते। कुछ शील-अश्लील में भी फर्क नहीं करते। समाज का वातावरण बिगड़ता है। सुंदर शब्दों की तुलना में असुंदर शब्द प्रभावी होते जाते हैं। बुरा शब्द अच्छे शब्द को धकियाता है। अच्छा शब्द रिरियाते हुए धक्का खाकर पीछे चला जाता है। इंग्लैंड के अर्थशास्त्री ग्रेशम ने कहा था, ‘खोटे सिक्के अच्छे सिक्कों को चलन से बाहर कर देते हैं।’
अस्तित्व की तरह शब्द संसार भी लगातार विस्तीर्ण हो रहा है। पहले शब्दों की संख्या कम थी। धीरे-धीरे बढ़ती गई। अब विभिन्न भाषाओं में लाखों शब्द हैं। शब्द की जन्म तिथि का पता लगाना कठिन है। आदिम मनुष्य के पास भाषा नहीं थी और न ही समझ में आने वाली बोली। उस समय मनुष्य ने स्वयं को व्यक्त करने की इच्छा की। अनुमान है कि संकेतों से मनुष्य ने अपने मित्रों के बीच अपना भाव व्यक्त किया होगा। ऊंगली से संकेत करना, हाथों को हृदय पर रखना, मन की बात रखने के लिए कंधे उचकाना आधुनिक काल में बॉडी लैंग्वेज कहा जाता है। तो भी हाव-भाव के माध्यम से पूरा अर्थ प्रकट करना कठिन था। तब मनुष्य का ध्यान प्रकृति के अंतर्संगीत की तरफ गया होगा। कुछ ध्वनिमूलक संकेतों से बात आगे बढ़ी होगी। चार्ल्स डारविन ने ऐसे तथ्यों की ओर संकेत किया है। ध्वनियों के संयोजन से संगीत का जन्म हुआ होगा और शब्दों के संयोजन से गीतों का जन्म। दुनिया के सारे गीत शब्दों से बनते हैं और संगीत ध्वनि संयोजन से। इसीलिए संगीत का अर्थ नहीं होता और गीत का अर्थ होता है।

जहां-जहां अर्थ वहां-वहां शब्द। अथर्ववेद के एक सुंदर मंत्र में सरिताओं से कहा गया है, ‘हे सरिताओं आप नाद करते हुए बहती हैं इसलिए आप का नाम नदी पड़ा है।’ पहले जल प्रवाह फिर जल प्रवाह की ध्वनि और उसका नाद फिर जल तरंग की अनुभूति और फिर नदी। मनुष्य की तरह नदियां भी प्रसन्न या उदास होती हैं। मनुष्य नदियों को प्रसन्न बहते हुए देखते हैं। शब्द भी प्रसन्न होते हैं। शब्द प्रसन्नता के इस प्रवाह से काव्य का जन्म होता है। यहां भी शब्द की महत्ता है। दुनिया का सारा ज्ञान-विज्ञान और दर्शन शब्द के माध्यम से सार्वजानिक संपदा बना है। शब्द वस्तुत: वाणी के अंश होते हैं। वाणी वाक्य है। शब्दों के अर्थपूर्ण संयोजन से वाक्य बनते हैं। वाक्य शक्ति हैं और वाणी उसका प्रकट रूप। कुछ शब्द स्वयं पूर्ण होते हैं। शब्द ब्रह्म हैं और उपनिषदों में ब्रह्म रस बताया गया है। रसो वै सह। कुछ शब्द नीरस भी होते हैं, लेकिन अपने मूल स्वभाव से नीरस नहीं होते। उन्हें रसपूर्ण या नीरस बनाना शब्द प्रयोगकर्ता पर निर्भर है। सामान्यत: अर्थ और नाम ज्ञान के मौलिक आधार हैं। सभी रूप प्रकृति की अभिव्यक्ति हैं। उनका नामकरण मनुष्य का कौशल है। ऋग्वेद के ज्ञानसूक्त में कहा गया है कि, ‘पहले रूपों के नाम रखे गए। विद्वानों ने सार- असार को अलग किया।‘

सभी नाम शब्द हैं लेकिन सभी शब्द नाम नहीं हैं। शतपथ ब्राह्मण के रचनाकार ने वाणी को विराट कहा था। शब्द की देह अक्षर है। अक्षर अविनाशी है। इसलिए शब्द भी अमर हैं, लेकिन शब्द भी मनुष्य की तरह बूढ़े होते हैं। अथर्ववेद में मधुर शब्दों की इच्छा व्यक्त की गई है। ऋषि की प्रार्थना है कि ‘हमारी जिव्हा का अग्रभाग मधुर हो। मध्य भाग मधुर हो। वाणी मधुर हो। हम तेजस्वी वाणी भी मधुरता के साथ बोलें।‘ गाली भी शब्दों से बनती है। संभवत: हिंसक उपायों से बचने के लिए कुछ समझदार विद्वानों ने शब्द को गाली बनाया था। शब्द बोलना आसान है। शब्द से गाली बनाना कठिन है। गालियां प्राय: संबंधित व्यक्ति के लिए नहीं होती। वे उसकी माता या बहन के विरुद्ध होती हैं। संबंधित व्यक्ति अपनी माता व बहन की आत्मीयता में कुपित होते हैं। लेकिन भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में विवाह आदि मांगलिक कार्यक्रमों में महिलाएं वर पक्ष को गलियां देती हैं। ये गलियां उत्तेजित नहीं करतीं। वातावरण को सरस करती हैं। दोनों पक्ष शब्दरस, शब्द मोद व शब्दलीला का आनंद लेते हैं। गाली वाले शब्द आनंद आपूरित करते हैं। शब्द आनंददाता हैं। ज्ञानवाहक हैं। दर्शन के साधक हैं। सामाजिक एकता का माध्यम हैं। भाषाविद मोलिनीविसी ने १९२३ में कहा था, ‘भाषा सामाजिक संगठन का काम करती है।’ जर्मन भाषाविद सामरलेट ने यही बात दोहराई।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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